मुद्रा (Money) आधुनिक अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। इसके बिना वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान करना अत्यंत कठिन होता। मुद्रा विनिमय का माध्यम है, जो किसी वस्तु या सेवा के बदले में दी जाती है। इस अध्याय में हम मुद्रा के इतिहास, उसके कार्य, बैंकों की भूमिका और साख (credit) की व्यवस्था को समझेंगे। मुद्रा और साख भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, क्योंकि इनके बिना आर्थिक लेन-देन संभव नहीं।
मुद्रा के आविष्कार से पहले वस्तु विनिमय प्रणाली (barter system) प्रचलित थी, जिसमें वस्तुओं का सीधे आदान-प्रदान होता था। परंतु वस्तु विनिमय में कई कठिनाइयाँ थीं, जैसे आवश्यकताओं का दोहरा संयोग (double coincidence of wants) आवश्यक था। मुद्रा के आविष्कार ने इन कठिनाइयों को दूर किया। मुद्रा को सबसे पहले सोने, चाँदी जैसी धातुओं के रूप में प्रयोग किया गया, बाद में कागजी मुद्रा आई और अब डिजिटल मुद्रा का युग है।
मुद्रा के मुख्य रूप हैं - नकद मुद्रा और माँग जमा। नकद मुद्रा में करेंसी नोट और सिक्के शामिल हैं। भारत में करेंसी नोट जारी करने का अधिकार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के पास है। माँग जमा (demand deposits) वह जमा राशि है जो लोग बैंकों में रखते हैं और जिसे जरूरत के समय निकाला जा सकता है। चेक माँग जमा से भुगतान का एक माध्यम है।
मुद्रा के तीन प्रमुख कार्य होते हैं। पहला, मुद्रा विनिमय का माध्यम है - इससे वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान आसान होता है। दूसरा, मुद्रा मूल्य का मापक है - इससे विभिन्न वस्तुओं के मूल्यों की तुलना की जा सकती है। तीसरा, मुद्रा मूल्य का संचय साधन है - लोग अपनी बचत को मुद्रा के रूप में संचित कर सकते हैं। ये कार्य मुद्रा को अर्थव्यवस्था में अपरिहार्य बनाते हैं।
बैंक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लोग अपनी बचत बैंकों में जमा करते हैं, और बैंक इन जमाओं का उपयोग ऋण देने के लिए करते हैं। बैंक किसानों, व्यापारियों, उद्यमियों और उपभोक्ताओं को साख (credit) प्रदान करते हैं। बैंकों की यह गतिविधि अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति को बढ़ाती है और विकास को गति देती है। बैंक इसलिए अर्थव्यवस्था का इंजन कहलाते हैं।
बैंकों का मुख्य कार्य जनता से जमा स्वीकार करना और आवश्यकतानुसार ऋण प्रदान करना है। बैंक जमाकर्ताओं को ब्याज देते हैं और ऋण लेने वालों से ब्याज लेते हैं। जमा और ऋण की ब्याज दरों के अंतर से बैंक लाभ कमाते हैं। बैंक जमा राशि का केवल एक भाग ही अपने पास रखते हैं और शेष को ऋण के रूप में देते हैं। यही कारण है कि बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा सृजन का कार्य करते हैं।
साख का अर्थ है ऋण प्राप्त करना। जब कोई व्यक्ति या संस्था किसी से पैसा उधार लेती है, तो उसे साख कहा जाता है। साख के दो पक्ष होते हैं - ऋणदाता (जो पैसा देता है) और ऋणी (जो पैसा लेता है)। साख लेने के लिए ऋणी को कुछ गारंटी (collateral) देनी होती है, जैसे भूमि, भवन, जमा राशि या कोई अन्य संपत्ति। गारंटी के आधार पर ऋणदाता विश्वास करता है कि ऋण वापस मिलेगा।
साख के कई रूप हैं। पहला, संगठित क्षेत्रक का साख, जिसमें बैंक और सहकारी समितियाँ शामिल हैं। यह साख रिजर्व बैंक द्वारा नियंत्रित होती है और इसकी ब्याज दरें नियमित होती हैं। दूसरा, असंगठित क्षेत्रक का साख, जिसमें साहूकार, महाजन और स्थानीय साहूकार शामिल हैं। इस साख की ब्याज दरें अधिक होती हैं और इसका शोषणकारी प्रभाव हो सकता है। गरीब किसान अक्सर साहूकारों से कर्ज लेकर फँस जाते हैं।
साख की शर्तों में ब्याज दर, ऋण की राशि, अवधि और गारंटी शामिल होती हैं। ये शर्तें तय करती हैं कि ऋण कितना लाभकारी या बोझिल होगा। कम ब्याज दर पर लिया गया ऋण उत्पादक कार्यों में मदद करता है, जबकि उच्च ब्याज दर पर लिया गया ऋण कर्ज में डुबो सकता है। इसलिए ऋण लेने से पहले शर्तों को ध्यान से समझना आवश्यक है।
ऋण में जोखिम भी होता है। यदि ऋणी समय पर ऋण नहीं चुका पाता, तो उसकी गारंटी (संपत्ति) जब्त की जा सकती है। इसलिए गरीब और कमजोर वर्गों के लिए उचित दर पर साख प्राप्त करना कठिन होता है। बैंक गरीबों को ऋण देने में हिचकते हैं, क्योंकि गारंटी की कमी होती है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार ने स्वयं सहायता समूहों (SHG), सहकारी बैंकों और ग्रामीण बैंकों को बढ़ावा दिया है।
ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों को साख उपलब्ध कराने के लिए स्वयं सहायता समूह (Self-Help Groups) महत्वपूर्ण साधन बने हैं। इन समूहों में गाँव की महिलाएँ शामिल होती हैं, जो छोटी-छोटी राशि की बचत करती हैं और आपस में पैसा जमा करती हैं। इस जमा राशि से समूह की सदस्यों को छोटे ऋण दिए जाते हैं। स्वयं सहायता समूह गरीबों को बैंक ऋण दिलाने में भी मदद करते हैं।
स्वयं सहायता समूहों के कई लाभ हैं। पहला, इनसे महिलाएँ आर्थिक रूप से सशक्त होती हैं। दूसरा, इनसे गरीबों को साहूकारों की उच्च ब्याज दरों से मुक्ति मिलती है। तीसरा, इनसे गाँवों में बचत की आदत बढ़ती है। चौथा, इनसे बैंकों को विश्वास होता है कि गरीब भी ऋण चुका सकते हैं। स्वयं सहायता समूह समावेशी विकास का महत्वपूर्ण साधन हैं, जो गरीबों को वित्तीय प्रणाली से जोड़ते हैं।
| कार्य | विवरण |
|---|---|
| विनिमय का माध्यम | वस्तुओं का आदान-प्रदान आसान |
| मूल्य का मापक | वस्तुओं के मूल्यों की तुलना |
| मूल्य का संचय | बचत को संचित करना |
| भुगतान का साधन | देरी से भुगतान |
| विशेषता | संगठित | असंगठित |
|---|---|---|
| स्रोत | बैंक, सहकारी समितियाँ | साहूकार, महाजन |
| ब्याज दर | नियमित, कम | अधिक, मनमानी |
| नियंत्रण | RBI द्वारा | कोई नियंत्रण नहीं |
मुद्रा और साख भारतीय अर्थव्यवस्था की जीवन-रेखा हैं। मुद्रा ने वस्तु विनिमय की कठिनाइयों को दूर करके लेन-देन को आसान बनाया है। बैंक जमा और ऋण की व्यवस्था के माध्यम से अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ाते हैं और विकास को गति देते हैं। साख की व्यवस्था में संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रक शामिल हैं, परंतु गरीबों के लिए असंगठित साख (साहूकार) शोषणकारी हो सकती है। स्वयं सहायता समूहों जैसे साधन गरीबों को उचित दर पर साख उपलब्ध कराकर उन्हें वित्तीय प्रणाली से जोड़ते हैं। इस प्रकार मुद्रा और साख का सही उपयोग ही समावेशी और स्थायी विकास की कुंजी है।