संसाधन (Resources) वह सब कुछ है जो मानव की आवश्यकताओं को पूरा करता है। हवा, जल, भूमि, खनिज, वन, ऊर्जा और जानवर सभी संसाधन हैं। परंतु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कोई भी वस्तु अपने आप में संसाधन नहीं है, बल्कि जब मनुष्य उसे उपयोग करना सीखता है और उसका मूल्य समझता है, तब वह संसाधन बनती है। उदाहरण के लिए, पत्थर सदियों से मौजूद था, परंतु मनुष्य ने उसे औजार बनाना सीखा तब वह संसाधन बना। इस अध्याय में हम संसाधनों के प्रकार, विकास और संसाधन संरक्षण को समझेंगे।
संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि कई संसाधन सीमित हैं। यदि हम संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग करेंगे, तो वे समाप्त हो जाएँगे और आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ नहीं बचेगा। इसलिए सतत विकास (Sustainable Development) की अवधारणा महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकताओं की रक्षा करना। संसाधन संरक्षण इसी सतत विकास का आधार है।
संसाधनों को उनकी उत्पत्ति के आधार पर दो प्रकारों में बाँटा जाता है। पहला है जैव संसाधन (Biotic), जो जीवित प्राणियों से प्राप्त होते हैं, जैसे वन, वन्य जीव, मछली और खेती। दूसरा है अजैव संसाधन (Abiotic), जो निर्जीव वस्तुओं से प्राप्त होते हैं, जैसे भूमि, जल, खनिज, पहाड़ और धातु। यह वर्गीकरण संसाधनों की प्रकृति को समझने में मदद करता है।
संसाधनों को उनकी समाप्ति की क्षमता के आधार पर भी बाँटा जाता है। नवीकरणीय संसाधन (Renewable) वे हैं जिन्हें पुनः प्राप्त या पुनर्जीवित किया जा सकता है, जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल और वन। गैर-नवीकरणीय संसाधन (Non-renewable) वे हैं जो एक बार समाप्त हो जाने पर वापस नहीं आते, जैसे कोयला, पेट्रोलियम और खनिज। इनके अलावा संसाधनों को स्वामित्व (व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय) के आधार पर और विकास की अवस्था (संभावित, विकसित, भंडार, स्टॉक) के आधार पर भी बाँटा जाता है।
संसाधन विकास का अर्थ है संसाधनों का नियोजित उपयोग करना ताकि वे लंबे समय तक उपलब्ध रहें। संसाधनों का विकास करते समय कई कारकों को ध्यान में रखना पड़ता है, जैसे तकनीक, संस्कृति और समय। जिस क्षेत्र में तकनीक उन्नत होती है, वहाँ संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है। संसाधन विकास में नियोजन सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिना योजना के संसाधनों का उपयोग अव्यवस्थित और हानिकारक हो सकता है।
संसाधन नियोजन (Resource Planning) भारत जैसे बड़े देश में अत्यंत आवश्यक है। संसाधन नियोजन की तीन प्रक्रियाएँ हैं - पहली, संसाधनों की पहचान और सूची बनाना; दूसरी, उपयुक्त तकनीक का निर्माण करना; तीसरी, संसाधनों की जाँच और मूल्यांकन करना। भारत में संसाधन नियोजन के लिए विभिन्न स्तरों पर कार्य होता है, जिसमें केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारें शामिल हैं। पंचवर्षीय योजनाओं में संसाधन नियोजन पर विशेष ध्यान दिया गया है।
भूमि भारत का सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है, क्योंकि कृषि, उद्योग और बस्तियाँ सभी भूमि पर निर्भर हैं। भारत में भूमि का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है, जैसे कृषि, वन, चारागाह, बस्तियाँ और उद्योग। भारत की कुल भूमि में वन क्षेत्र का अनुपात वांछित 33 प्रतिशत से कम है। भूमि का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है, क्योंकि भूमि सीमित है और बढ़ाई नहीं जा सकती।
भारत में भूमि संसाधनों की समस्या यह है कि भूमि निम्नीकरण (land degradation) तेजी से बढ़ रहा है। वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, गलत कृषि विधियाँ, खनन और औद्योगिक अपशिष्ट भूमि को बंजर बना रहे हैं। भूमि निम्नीकरण को रोकने के लिए वृक्षारोपण, मिश्रित खेती, सीढ़ीदार खेती और जैविक खाद के उपयोग जैसे उपाय आवश्यक हैं। भूमि संरक्षण ही भूमि संसाधनों का सतत विकास सुनिश्चित करता है।
मृदा (Soil) भूमि की ऊपरी परत है, जो पौधों के उगने के लिए आवश्यक है। मृदा का निर्माण लाखों वर्षों में चट्टानों के टूटने से होता है, जिसमें जलवायु, वनस्पति और जीवों की भूमिका होती है। भारत में कई प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं, जिनमें मुख्य हैं - जलोढ़ मृदा, काली मृदा, लाल मृदा, लैटेराइट मृदा, शुष्क मृदा और जलमग्न मृदा। प्रत्येक मृदा की अपनी विशेषताएँ होती हैं और अलग-अलग फसलों के लिए उपयुक्त होती है।
जलोढ़ मृदा नदियों द्वारा लाई गई सबसे उपजाऊ मृदा है, जो उत्तर भारत के मैदानों में पाई जाती है। काली मृदा ज्वालामुखी चट्टानों से बनी है और कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है, इसलिए इसे काली कपास मृदा भी कहा जाता है। लाल मृदा दक्कन के पठार पर पाई जाती है। मृदा अपरदन (soil erosion) मृदा की सबसे बड़ी समस्या है, जिसमें हवा और पानी उपजाऊ मृदा को बहा ले जाते हैं। मृदा संरक्षण के लिए वृक्षारोपण, सीढ़ीदार खेती और पट्टीदार खेती जैसे उपाय आवश्यक हैं।
सतत विकास की अवधारणा यह सिखाती है कि संसाधनों का उपयोग ऐसे करें कि आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकताएँ भी पूरी हो सकें। संसाधनों का अत्यधिक दोहन, प्रदूषण और पर्यावरण निम्नीकरण सतत विकास की बाधाएँ हैं। संसाधन संरक्षण के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग, पुनर्चक्रण (recycling), जल संरक्षण और वन संरक्षण जैसे उपाय आवश्यक हैं।
भारत में संसाधन संरक्षण के लिए कई कानून बनाए गए हैं, जैसे वन संरक्षण अधिनियम 1980 और जल प्रदूषण निवारण अधिनियम 1974। सतत विकास के लिए सामुदायिक भागीदारी भी आवश्यक है। जब स्थानीय समुदाय संसाधनों की रक्षा में भाग लेते हैं, तो संसाधनों का संरक्षण बेहतर होता है। सतत विकास ही मानवता के भविष्य की सुरक्षा का मार्ग है, क्योंकि संसाधन सीमित हैं और इन्हें संरक्षित करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
| वर्गीकरण | प्रकार | उदाहरण |
|---|---|---|
| उत्पत्ति | जैव / अजैव | वन / खनिज |
| समाप्ति | नवीकरणीय / गैर-नवीकरणीय | सौर ऊर्जा / कोयला |
| स्वामित्व | व्यक्तिगत, सामुदायिक | घर / तालाब |
| विकास अवस्था | संभावित, विकसित | भंडार, स्टॉक |
| मृदा | विशेषता | उपयुक्त फसल |
|---|---|---|
| जलोढ़ मृदा | सबसे उपजाऊ | गेहूँ, चावल |
| काली मृदा | ज्वालामुखी, नमी धारक | कपास |
| लाल मृदा | लोहे से युक्त | बाजरा, दालें |
| लैटेराइट मृदा | अम्लीय | चाय, कॉफी |
संसाधन मानव विकास का आधार हैं, परंतु ये सीमित हैं, इसलिए इनका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। संसाधनों को उत्पत्ति, समाप्ति, स्वामित्व और विकास अवस्था के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। संसाधन नियोजन के माध्यम से संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है। भूमि और मृदा भारत के सबसे महत्वपूर्ण संसाधन हैं, जिनका संरक्षण आवश्यक है। सतत विकास की अवधारणा हमें सिखाती है कि वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करना चाहिए। संसाधनों का संरक्षण ही हमारे और आने वाली पीढ़ियों के समृद्ध भविष्य की कुंजी है।