वन और वन्य जीव प्रकृति की अमूल्य धरोहर हैं। वन केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि यह संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं। वन जलवायु को संतुलित करते हैं, वायु को शुद्ध करते हैं, मृदा को बचाते हैं और हजारों जीवों को आश्रय देते हैं। वन्य जीव वनों के अभिन्न अंग हैं, जो खाद्य श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस अध्याय में हम भारत के वन और वन्य जीव संसाधनों, उनके क्षरण और संरक्षण के प्रयासों को समझेंगे।
भारत विश्व के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले देशों में से एक है। यहाँ जंगली जानवरों, पक्षियों, सरीसृपों और पौधों की हजारों प्रजातियाँ पाई जाती हैं। परंतु बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण वन और वन्य जीव संसाधनों पर संकट बढ़ रहा है। वनों की कटाई और वन्य जीवों के शिकार ने पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ दिया है, जिसके कारण संरक्षण के प्रयास आवश्यक हो गए हैं।
जैव विविधता का अर्थ है पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के जीवों और पौधों की विविधता। भारत में पौधों की लगभग 47,000 प्रजातियाँ, जानवरों की हजारों प्रजातियाँ और पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियाँ पाई जाती हैं। भारत की जैव विविधता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दुर्लभ और स्थानिक (endemic) प्रजातियाँ भी शामिल हैं, जो केवल भारत में ही पाई जाती हैं।
पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) में सभी जीव आपस में जुड़े होते हैं। खाद्य श्रृंखला के माध्यम से जीव एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। यदि किसी एक प्रजाति का अंत हो जाए, तो पूरी खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है। वन पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षक हैं, क्योंकि वे विभिन्न प्रजातियों को आश्रय और भोजन प्रदान करते हैं। जैव विविधता का संरक्षण पारिस्थितिक संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
भारत में वनों का वितरण असमान है। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 24 प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित है। घने वन पूर्वोत्तर भारत, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट और मध्य भारत में पाए जाते हैं। राजस्थान और गुजरात जैसे शुष्क क्षेत्रों में वन कम हैं। भारत के वनों को विभिन्न प्रकारों में बाँटा गया है, जैसे उष्णकटिबंधीय वर्षा वन, उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन, उष्णकटिबंधीय कंटीली वन और पर्वतीय वन।
उष्णकटिबंधीय वर्षा वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ अत्यधिक वर्षा होती है, जैसे पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर भारत। पर्णपाती वन (मानसूनी वन) भारत के सबसे व्यापक वन हैं, जिनमें सागौन, साल जैसे महत्वपूर्ण पेड़ पाए जाते हैं। कंटीली वन शुष्क क्षेत्रों में पाए जाते हैं। प्रत्येक प्रकार के वन में अलग-अलग वन्य जीव पाए जाते हैं, और इन सभी का संरक्षण आवश्यक है।
वन्य जीव वन पारिस्थितिक तंत्र के महत्वपूर्ण घटक हैं। भारत में बाघ, शेर, तेंदुआ, हाथी, गैंडा, हिरण, बंदर और सैकड़ों प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं। बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है और मोर राष्ट्रीय पक्षी है। वन्य जीव खाद्य श्रृंखला का हिस्सा होते हैं और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं। हाथी वनों के विस्तार में मदद करते हैं, क्योंकि वे बीजों का प्रसार करते हैं।
वन्य जीवों का आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व है। वन्य जीव पर्यटन से रोजगार मिलता है, और उनके संरक्षण से पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है। परंतु वन्य जीवों की कई प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं। शिकार, अवैध व्यापार, वनों की कटाई और निवास स्थान का नष्ट होना इनके लिए खतरे हैं। बाघ और गैंडा जैसी प्रजातियाँ विशेष रूप से संकट में हैं।
वन एवं वन्य जीव संसाधनों का क्षरण एक गंभीर समस्या है। वनों की कटाई का सबसे बड़ा कारण है कृषि का विस्तार, जिसमें वनों को साफ करके खेती की जाती है। इसके अलावा शहरीकरण, औद्योगीकरण, सड़क निर्माण और बाँध निर्माण के कारण भी वन नष्ट हो रहे हैं। अवैध लकड़ी कटाई (illegal logging) वनों के क्षरण को और बढ़ाती है। इन कारणों से भारत के वन क्षेत्र में लगातार कमी आई है।
वन्य जीवों के क्षरण के कारण अलग हैं। शिकार और अवैध वन्य जीव व्यापार वन्य जीवों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। जानवरों की हड्डियाँ, चमड़ा, दाँत और अंगों का व्यापार होता है, जिसके लिए जानवर मारे जाते हैं। निवास स्थान का नष्ट होना भी वन्य जीवों के लिए घातक है, क्योंकि जब जंगल कटते हैं, तो जानवरों के रहने और भोजन के स्थान समाप्त हो जाते हैं। इन सभी कारणों से वन्य जीवों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है।
वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए भारत में कई कदम उठाए गए हैं। वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अंतर्गत बिना अनुमति के वनों की कटाई पर रोक लगाई गई। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत वन्य जीवों के शिकार और व्यापार पर प्रतिबंध लगाया गया। इसी अधिनियम के तहत राष्ट्रीय उद्यानों और वन्य जीव अभयारण्यों की स्थापना की गई। भारत में 100 से अधिक राष्ट्रीय उद्यान और 500 से अधिक अभयारण्य हैं।
संरक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण है सामुदायिक भागीदारी। स्थानीय समुदायों को वनों की रक्षा में शामिल किया गया है। संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management) के अंतर्गत गाँव वाले वनों की रक्षा करते हैं और बदले में वन उत्पादों का उपयोग करते हैं। चिपको आंदोलन वन संरक्षण का ऐतिहासिक उदाहरण है, जिसमें लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें गले लगाया। प्रोजेक्ट टाइगर 1973 से बाघों के संरक्षण के लिए चलाया जा रहा है। इन प्रयासों से वन्य जीवों की संख्या में सुधार हुआ है।
| वन प्रकार | जलवायु | उदाहरण |
|---|---|---|
| उष्णकटिबंधीय वर्षा वन | अत्यधिक वर्षा | पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर |
| पर्णपाती वन | मानसूनी | सागौन, साल |
| कंटीली वन | शुष्क | राजस्थान |
| पर्वतीय वन | ठंडी | हिमालय |
| उपाय | वर्ष | विवरण |
|---|---|---|
| वन्य जीव संरक्षण अधिनियम | 1972 | शिकार पर प्रतिबंध |
| वन संरक्षण अधिनियम | 1980 | वन कटाई पर रोक |
| प्रोजेक्ट टाइगर | 1973 | बाघ संरक्षण |
वन एवं वन्य जीव भारत की सबसे मूल्यवान प्राकृतिक संपदा हैं। ये न केवल पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि मानव जीवन के लिए भी आवश्यक हैं। भारत में जैव विविधता समृद्ध है, परंतु वनों की कटाई, शिकार और निवास स्थानों के नष्ट होने से वन्य जीवों पर संकट है। वन संरक्षण अधिनियम, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, राष्ट्रीय उद्यान और प्रोजेक्ट टाइगर जैसे प्रयासों ने संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। संरक्षण तभी सफल होगा जब स्थानीय समुदाय भी इसमें भाग लेंगे। वनों और वन्य जीवों की रक्षा ही धरती पर जीवन की रक्षा है।