जल पृथ्वी पर जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। इसके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। भारत में जल संसाधन समृद्ध हैं, परंतु उनका वितरण असमान है। कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होती है, जबकि कुछ क्षेत्र सूखे से पीड़ित रहते हैं। जल का उपयोग कृषि, उद्योग, घरेलू कार्यों और बिजली उत्पादन में किया जाता है। इस अध्याय में हम भारत के जल संसाधनों, जल की समस्याओं और जल संरक्षण के उपायों को समझेंगे।
भारत में जल के प्रमुख स्रोत हैं - नदियाँ, झीलें, तालाब, भूजल और हिमनद। हिमालय की नदियाँ वर्ष भर जल प्रदान करती हैं, जबकि प्रायद्वीपीय नदियाँ वर्षा पर निर्भर होती हैं। भारत में वर्षा का वितरण अत्यंत असमान है। पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर भारत में अत्यधिक वर्षा होती है, जबकि राजस्थान और गुजरात जैसे क्षेत्र शुष्क रहते हैं। इस असमान वितरण के कारण जल प्रबंधन अत्यंत चुनौतीपूर्ण है।
भारत के जल संसाधनों का अनुमान नदियों और भूजल के आधार पर लगाया जाता है। भारत में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 120 सेंटीमीटर है। भारत की नदियों का कुल वार्षिक प्रवाह लगभग 1869 घन किलोमीटर है, परंतु इसका केवल एक छोटा भाग ही उपयोग में आता है। भूजल भारत के जल संसाधनों का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो कुओं और ट्यूबवेलों से निकाला जाता है।
जल की उपलब्धता में क्षेत्रीय असमानता एक गंभीर समस्या है। जबकि गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान जल से समृद्ध है, राजस्थान और दक्कन के कुछ भाग जल की कमी से जूझते हैं। जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता भी घट रही है, क्योंकि जनसंख्या बढ़ रही है। जल की कमी कृषि उत्पादन, पेयजल आपूर्ति और औद्योगिक विकास को प्रभावित कर रही है। जल संकट से निपटने के लिए जल का संरक्षण और नियोजित उपयोग आवश्यक है।
भारत में नदियों के जल का उपयोग कई उद्देश्यों के लिए करने हेतु बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ (Multi-purpose River Projects) बनाई गई हैं। ये परियोजनाएँ एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति करती हैं, जैसे सिंचाई, बिजली उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, पेयजल आपूर्ति और जल परिवहन। दामोदर घाटी परियोजना और भाखड़ा-नांगल परियोजना भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएँ हैं।
बहुउद्देशीय परियोजनाओं के कई लाभ हैं। इनसे सिंचाई का विस्तार होता है और कृषि उत्पादन बढ़ता है। जल विद्युत उत्पादन से बिजली मिलती है, जो उद्योगों और घरों के लिए आवश्यक है। बाँधों के कारण बाढ़ का नियंत्रण होता है। परंतु इन परियोजनाओं के कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हैं, जैसे बड़ी संख्या में लोगों का विस्थापन और वनों का नष्ट होना। इसलिए बाँध निर्माण में पर्यावरणीय पहलुओं का ध्यान रखना आवश्यक है।
भारत में जल की कई गंभीर समस्याएँ हैं। पहली समस्या है जल की कमी, जो कई क्षेत्रों में गंभीर रूप ले चुकी है। दूसरी समस्या है जल प्रदूषण, जिसमें नदियों, झीलों और भूजल को गंदा कर दिया जाता है। औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि रसायन और घरेलू कचरा जल को प्रदूषित करते हैं। गंगा और यमुना जैसी नदियाँ गंभीर रूप से प्रदूषित हैं। तीसरी समस्या है भूजल का अत्यधिक दोहन, जिससे भूजल स्तर घट रहा है।
भूजल का अत्यधिक दोहन सबसे गंभीर समस्या है, क्योंकि पंजाब और हरियाणा जैसे कृषि प्रधान राज्यों में भूजल तेजी से नीचे जा रहा है। इसके कारण कुओं और ट्यूबवेलों की गहराई बढ़ती जा रही है। वर्षा के पानी को संग्रहित न करना और वनों की कटाई भी जल की कमी को बढ़ाती है। इन समस्याओं के समाधान के लिए जल संरक्षण और जल प्रबंधन की नई नीतियाँ आवश्यक हैं।
जल संरक्षण के कई उपाय हैं। सबसे महत्वपूर्ण उपाय है वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting), जिसमें वर्षा के पानी को संग्रहित करके भूजल को भरा जाता है। छतों, खेतों और तालाबों से वर्षा जल एकत्र किया जाता है। राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन की पारंपरिक प्रणाली 'टाँका' और 'जोहड़' प्रचलित है। इन प्रणालियों ने सदियों से जल की कमी का सामना किया है।
जल संरक्षण के अन्य उपायों में तालाबों की सफाई और पुनर्निर्माण, भूमि में जल अवशोषण बढ़ाना, और सिंचाई की आधुनिक विधियाँ शामिल हैं। बूंद-बूंद सिंचाई (drip irrigation) और फव्वारा सिंचाई से पानी की बचत होती है। फसलों की पानी के अनुसार किस्में चुनना और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना भी जल बचाता है। जल संरक्षण में जनजागरूकता सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि तभी लोग जल का विवेकपूर्ण उपयोग करेंगे।
भारत में जल प्रबंधन के लिए सामुदायिक प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। स्थानीय समुदायों ने जल संरक्षण के लिए कई सफल प्रयोग किए हैं। राजस्थान के अलवर जिले में तरुण भारत संघ ने 'जोहड़' पुनर्जीवित करके कई गाँवों को पानी उपलब्ध कराया। महाराष्ट्र के रालीगाँव में अन्ना हजारे ने जल संचयन के माध्यम से गाँव का सूखा समाप्त किया। ये उदाहरण बताते हैं कि सामुदायिक भागीदारी से जल संकट का समाधान संभव है।
जल प्रबंधन के लिए केंद्र और राज्य सरकारें भी कार्य कर रही हैं। राष्ट्रीय जल नीति 2002 बनाई गई है, जो जल के नियोजित उपयोग पर जोर देती है। 'नमामि गंगे' परियोजना गंगा नदी की सफाई के लिए चलाई जा रही है। जल की बचत के लिए बूंद-बूंद को बचाना आवश्यक है। जल संरक्षण का सबसे बड़ा सिद्धांत यह है कि जल की एक-एक बूंद अनमोल है, इसलिए इसका विवेकपूर्ण उपयोग ही सतत विकास की कुंजी है।
| स्रोत | विवरण |
|---|---|
| नदियाँ | हिमालय की और प्रायद्वीपीय |
| झीलें और तालाब | प्राकृतिक और मानव निर्मित |
| भूजल | कुओं और ट्यूबवेलों से |
| हिमनद | हिमालय में बर्फ के रूप में |
| उपाय | विवरण |
|---|---|
| वर्षा जल संचयन | वर्षा जल का संग्रहण |
| बूंद-बूंद सिंचाई | कम पानी में खेती |
| तालाब पुनर्निर्माण | पुराने जल स्रोतों की सफाई |
| वन संरक्षण | जल अवशोषण बढ़ाना |
जल संसाधन भारत के लिए जीवनरेखा हैं, परंतु इनका वितरण असमान है और संकट बढ़ रहा है। जल की कमी, प्रदूषण और भूजल का अत्यधिक दोहन भारत की प्रमुख समस्याएँ हैं। बहुउद्देशीय परियोजनाओं ने सिंचाई और बिजली में मदद की है, परंतु इनके पर्यावरणीय प्रभाव भी हैं। जल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन, बूंद-बूंद सिंचाई और तालाबों के पुनर्निर्माण जैसे उपाय आवश्यक हैं। सबसे महत्वपूर्ण है सामुदायिक भागीदारी और जनजागरूकता, जो रालीगाँव जैसे उदाहरणों से सिद्ध हुई है। जल का विवेकपूर्ण उपयोग ही भविष्य की पीढ़ियों के लिए जल की उपलब्धता सुनिश्चित करेगा।