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1. परिचय

रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि देव द्वारा रचित 'सवैया और कवित्त' में श्रीकृष्ण के बाल रूप और उनकी मनोहर मूर्ति का सजीव चित्रण मिलता है। इनमें कृष्ण की बाल लीलाओं का वात्सल्य पूर्ण वर्णन तथा राधा-कृष्ण के श्रृंगार का मधुर चित्रण है। देव की भाषा-शैली वीर और श्रृंगार दोनों रसों में अपनी विशेष छाप रखती है।

देव 'श्रृंगार रस के सम्राट' माने जाते हैं। उनकी कविता में मुख्यतः कृष्ण की बाल लीला और राधा-कृष्ण की प्रेम लीला का काव्य-सौंदर्य निहित है। उनके पदों में शब्द-चित्रों की सजीवता, भावों की गहराई और प्रतीकों की मधुरता एक साथ मिलती है।

2. कवि परिचय

देव का जन्म सन् 1673 ई. के आसपास इटावा जिले के 'संभरा' नामक गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम द्विजदेव था। देव रीतिकाल के अंतिम चरण के महत्वपूर्ण कवि थे और इन्होंने ब्रजभाषा में काव्य रचना की।

3. पाठ-सारांश

पाठ में संकलित देव के सवैया और कवित्त में मुख्यतः दो विषय हैं:

सवैया

पहले सवैये में श्रीकृष्ण का बाल रूप वर्णित है। माता यशोदा कृष्ण को दूध पिलाना चाहती हैं, परंतु कृष्ण माखन खाने की जिद करते हैं। बालकृष्ण की यह मनोहर चेष्टा माँ के स्नेह और बालक के मासूम अनुराग को दर्शाती है। कवि देव इस बाल लीला का वात्सल्य पूर्ण चित्रण करते हैं।

कवित्त

कवित्त में कृष्ण के रूप-सौंदर्य का वर्णन है। कवि देव कृष्ण की मूर्ति का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उनके शरीर में सूर्य की कांति और चंद्रमा की शीतलता दोनों विद्यमान हैं। उनकी आँखें कमल के समान सुंदर हैं और उनके मुख की मुस्कान अमृत के समान मीठी है। यह वर्णन श्रृंगार और भक्ति के संगम को प्रकट करता है।

देव की यह मूर्ति-चित्रण शैली उन्हें रीतिकाल के अन्य कवियों से अलग करती है, क्योंकि वे रूपक और उपमा के माध्यम से दृश्यात्मक चित्र उकेरते हैं।

4. पात्र

5. मूलभाव एवं संदेश

मूल भाव कृष्ण के प्रति आत्मीय प्रेम और उनकी लीलाओं का सौंदर्य-चित्रण है। बाल लीला के माध्यम से कवि वात्सल्य भाव का उद्बोधन करते हैं। संदेश है कि परमात्मा से प्रेम बाल स्नेह की तरह सरल और निश्छल होना चाहिए।

6. साहित्यिक तत्व

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: देव की रचनाएँ एवं विशेषताएँ

क्रम विषय विवरण
1 काल रीतिकाल
2 भाषा ब्रजभाषा
3 प्रमुख रस श्रृंगार, वात्सल्य
4 प्रमुख रचनाएँ देवस्वरूपा, अष्टयाम
5 छंद सवैया, कवित्त
6 मुख्य पात्र कृष्ण, यशोदा, राधा

तालिका 2: सवैया और कवित्त की तुलना

विशेषता सवैया कवित्त
मुख्य भाव वात्सल्य (बाल लीला) श्रृंगार (रूप सौंदर्य)
प्रमुख दृश्य माखन की जिद मनमोहक मूर्ति
रस वात्सल्य श्रृंगार

माइंड मैप

graph TD A["देव - सवैया और कवित्त"] --> B["कवि: रीतिकाल, ब्रजभाषा"] A --> C["सवैया: वात्सल्य रस"] A --> D["कवित्त: श्रृंगार रस"] A --> E["मुख्य पात्र: कृष्ण, यशोदा, राधा"] C --> F["बाल लीला: माखन की जिद"] D --> G["रूप-सौंदर्य: कमल नयन, मधुर मुस्कान"] A --> H["शैली: मूर्ति-निर्माण"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

देव के काव्य के प्रमुख तत्व वात्सल्य रस बालकृष्ण की माखन लीला श्रृंगार रस कृष्ण के रूप का मधुर वर्णन मूर्ति-निर्माण शैली शब्दों से साकार चित्र ब्रजभाषा और छंद सवैया और कवित्त आत्मीय प्रेम का अद्भुत चित्रण भक्ति और सौंदर्य का संगम Golden Rule: प्रेम की अभिव्यक्ति सरल और निश्छल होनी चाहिए
कृष्ण के रूप-सौंदर्य के अंग सूर्य कांति चंद्र शीतलता कमल नयन मधुर मुस्कान अमृत समान मीठी मनमोहक मूर्ति भक्त और कवि का प्रेम वात्सल्य और श्रृंगार का अद्भुत समन्वय स्वर्ण नियम: सौंदर्य केवल दृश्य नहीं, अनुभव है

सामान्य गलतियाँ

  1. छात्र देव को भक्तिकाल का कवि मान लेते हैं, जबकि वे रीतिकाल के कवि हैं।
  2. देव का पूरा नाम 'देवदत्त' या केवल 'देव' लिखने में भ्रम होता है; उन्हें 'देव' कहकर लिखना चाहिए।
  3. सवैया और कवित्त दोनों को एक ही रस का उदाहरण मान लेना गलत है।
  4. यशोदा को कृष्ण की बहन बता देना सामान्य भूल है; वे उनकी माता थीं।
  5. राधा-कृष्ण का श्रृंगार भी वात्सल्य से अलग लिखना चाहिए।
  6. देव की रचना 'अष्टयाम' को तुलसी की रचना समझ लेना गलत है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. कवि परिचय में काल, भाषा और प्रमुख रचनाओं का उल्लेख अवश्य करें।
  2. सवैया और कवित्त के मूल भाव को दो-तीन वाक्यों में स्पष्ट करें।
  3. वात्सल्य और श्रृंगार रस के उदाहरण पाठ से उद्धृत करें।
  4. रस, अलंकार, भाषा और छंद को अलग-अलग शीर्षक में लिखें।
  5. परीक्षा में मूर्ति-चित्रण शैली का विशेष उल्लेख करना अंक बढ़ाता है।

निष्कर्ष

देव के सवैया और कवित्त रीतिकालीन श्रृंगार और वात्सल्य काव्य का उत्कृष्ट नमूना हैं। उनकी मूर्ति-निर्माण शैली शब्दों को साकार बना देती है। कृष्ण की बाल लीला और रूप-सौंदर्य के वर्णन के माध्यम से देव ने भक्ति, प्रेम और सौंदर्य का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया है, जो हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।