रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि देव द्वारा रचित 'सवैया और कवित्त' में श्रीकृष्ण के बाल रूप और उनकी मनोहर मूर्ति का सजीव चित्रण मिलता है। इनमें कृष्ण की बाल लीलाओं का वात्सल्य पूर्ण वर्णन तथा राधा-कृष्ण के श्रृंगार का मधुर चित्रण है। देव की भाषा-शैली वीर और श्रृंगार दोनों रसों में अपनी विशेष छाप रखती है।
देव 'श्रृंगार रस के सम्राट' माने जाते हैं। उनकी कविता में मुख्यतः कृष्ण की बाल लीला और राधा-कृष्ण की प्रेम लीला का काव्य-सौंदर्य निहित है। उनके पदों में शब्द-चित्रों की सजीवता, भावों की गहराई और प्रतीकों की मधुरता एक साथ मिलती है।
2. कवि परिचय
देव का जन्म सन् 1673 ई. के आसपास इटावा जिले के 'संभरा' नामक गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम द्विजदेव था। देव रीतिकाल के अंतिम चरण के महत्वपूर्ण कवि थे और इन्होंने ब्रजभाषा में काव्य रचना की।
देव ने कई राजाओं के आश्रय में रहकर काव्य रचना की, जिनमें बूंदी, जयपुर और रीवा के दरबार प्रमुख हैं।
इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं: 'देवस्वरूपा', 'देवसुरभी', 'अष्टयाम', 'काव्यरसकल्पद्रुम', 'सवैया' आदि।
देव मुख्यतः श्रृंगार रस के कवि हैं, परंतु उन्होंने वात्सल्य, भक्ति और नीति विषयक रचनाएँ भी की हैं।
इनकी शैली में मुख्यतः 'रुबाई', 'सवैया' और 'कवित्त' छंदों का प्रयोग मिलता है।
देव की कविता में मूर्ति-निर्माण की अद्भुत क्षमता है; वे शब्दों से साकार चित्र उकेर देते हैं।
3. पाठ-सारांश
पाठ में संकलित देव के सवैया और कवित्त में मुख्यतः दो विषय हैं:
सवैया
पहले सवैये में श्रीकृष्ण का बाल रूप वर्णित है। माता यशोदा कृष्ण को दूध पिलाना चाहती हैं, परंतु कृष्ण माखन खाने की जिद करते हैं। बालकृष्ण की यह मनोहर चेष्टा माँ के स्नेह और बालक के मासूम अनुराग को दर्शाती है। कवि देव इस बाल लीला का वात्सल्य पूर्ण चित्रण करते हैं।
कवित्त
कवित्त में कृष्ण के रूप-सौंदर्य का वर्णन है। कवि देव कृष्ण की मूर्ति का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उनके शरीर में सूर्य की कांति और चंद्रमा की शीतलता दोनों विद्यमान हैं। उनकी आँखें कमल के समान सुंदर हैं और उनके मुख की मुस्कान अमृत के समान मीठी है। यह वर्णन श्रृंगार और भक्ति के संगम को प्रकट करता है।
देव की यह मूर्ति-चित्रण शैली उन्हें रीतिकाल के अन्य कवियों से अलग करती है, क्योंकि वे रूपक और उपमा के माध्यम से दृश्यात्मक चित्र उकेरते हैं।
4. पात्र
श्रीकृष्ण: बाल रूप में माखन के लिए जिद्दी, रूप-सौंदर्य में मनमोहक।
माता यशोदा: वात्सल्य भाव से परिपूर्ण, कृष्ण को दूध पिलाने का प्रयास करती हैं।
राधा: कवित्त में कृष्ण के प्रति अनुराग व्यक्त करती हैं (श्रृंगार प्रसंग)।
5. मूलभाव एवं संदेश
मूल भाव कृष्ण के प्रति आत्मीय प्रेम और उनकी लीलाओं का सौंदर्य-चित्रण है। बाल लीला के माध्यम से कवि वात्सल्य भाव का उद्बोधन करते हैं। संदेश है कि परमात्मा से प्रेम बाल स्नेह की तरह सरल और निश्छल होना चाहिए।
बालकृष्ण की जिद और माँ का स्नेह साधारण घर के प्रसंग को दिव्य भाव देना दर्शाता है।
कृष्ण के रूप-सौंदर्य के वर्णन से भक्त और कवि दोनों का लक्ष्य एक ही है - प्रभु के प्रति अनुराग।
6. साहित्यिक तत्व
रस: वात्सल्य रस (सवैया) और श्रृंगार रस (कवित्त)।
भाषा: ब्रजभाषा, जो मधुर, लयात्मक और चित्रात्मक है।
अलंकार: उपमा, रूपक, अनुप्रास और उत्प्रेक्षा का सुंदर प्रयोग।
छंद: सवैया और कवित्त का विशेष प्रयोग।
शैली: मूर्ति-निर्माण शैली, जिसमें प्रत्येक पंक्ति एक दृश्य प्रस्तुत करती है।
त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ
तालिका 1: देव की रचनाएँ एवं विशेषताएँ
क्रम
विषय
विवरण
1
काल
रीतिकाल
2
भाषा
ब्रजभाषा
3
प्रमुख रस
श्रृंगार, वात्सल्य
4
प्रमुख रचनाएँ
देवस्वरूपा, अष्टयाम
5
छंद
सवैया, कवित्त
6
मुख्य पात्र
कृष्ण, यशोदा, राधा
तालिका 2: सवैया और कवित्त की तुलना
विशेषता
सवैया
कवित्त
मुख्य भाव
वात्सल्य (बाल लीला)
श्रृंगार (रूप सौंदर्य)
प्रमुख दृश्य
माखन की जिद
मनमोहक मूर्ति
रस
वात्सल्य
श्रृंगार
माइंड मैप
graph TD
A["देव - सवैया और कवित्त"] --> B["कवि: रीतिकाल, ब्रजभाषा"]
A --> C["सवैया: वात्सल्य रस"]
A --> D["कवित्त: श्रृंगार रस"]
A --> E["मुख्य पात्र: कृष्ण, यशोदा, राधा"]
C --> F["बाल लीला: माखन की जिद"]
D --> G["रूप-सौंदर्य: कमल नयन, मधुर मुस्कान"]
A --> H["शैली: मूर्ति-निर्माण"]
महत्वपूर्ण आरेख (SVG)
सामान्य गलतियाँ
छात्र देव को भक्तिकाल का कवि मान लेते हैं, जबकि वे रीतिकाल के कवि हैं।
देव का पूरा नाम 'देवदत्त' या केवल 'देव' लिखने में भ्रम होता है; उन्हें 'देव' कहकर लिखना चाहिए।
सवैया और कवित्त दोनों को एक ही रस का उदाहरण मान लेना गलत है।
यशोदा को कृष्ण की बहन बता देना सामान्य भूल है; वे उनकी माता थीं।
राधा-कृष्ण का श्रृंगार भी वात्सल्य से अलग लिखना चाहिए।
देव की रचना 'अष्टयाम' को तुलसी की रचना समझ लेना गलत है।
परीक्षा युक्तियाँ
कवि परिचय में काल, भाषा और प्रमुख रचनाओं का उल्लेख अवश्य करें।
सवैया और कवित्त के मूल भाव को दो-तीन वाक्यों में स्पष्ट करें।
वात्सल्य और श्रृंगार रस के उदाहरण पाठ से उद्धृत करें।
रस, अलंकार, भाषा और छंद को अलग-अलग शीर्षक में लिखें।
परीक्षा में मूर्ति-चित्रण शैली का विशेष उल्लेख करना अंक बढ़ाता है।
निष्कर्ष
देव के सवैया और कवित्त रीतिकालीन श्रृंगार और वात्सल्य काव्य का उत्कृष्ट नमूना हैं। उनकी मूर्ति-निर्माण शैली शब्दों को साकार बना देती है। कृष्ण की बाल लीला और रूप-सौंदर्य के वर्णन के माध्यम से देव ने भक्ति, प्रेम और सौंदर्य का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया है, जो हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।