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अक्सर हम औद्योगीकरण (Industrialisation) को कारखानों के विकास के साथ जोड़ते हैं। जब हम औद्योगिक उत्पादन की बात करते हैं, तो हमारा मतलब कारखानों में होने वाले उत्पादन से होता है, और औद्योगिक श्रमिकों से हमारा तात्पर्य कारखानों में काम करने वाले मजदूरों से होता है। लेकिन इंग्लैंड और यूरोप में कारखाने स्थापित होने से बहुत पहले ही अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन हो रहा था। यह उत्पादन कारखानों पर आधारित नहीं था। कई इतिहासकार औद्योगीकरण के इस प्रारंभिक चरण को प्रोटो-इंडस्ट्रियलाइजेशन (Proto-industrialisation) कहते हैं।
इंग्लैंड में सबसे पहले कारखाने 1730 के दशक में स्थापित हुए, लेकिन 18वीं सदी के अंत तक ही कारखानों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई। - औद्योगिक क्रांति का पहला प्रतीक कपास (Cotton) था। 19वीं सदी के अंत में कपास के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। - 18वीं सदी में कई ऐसे आविष्कार हुए (जैसे रिचर्ड आर्कराइट द्वारा कॉटन मिल का निर्माण) जिन्होंने उत्पादन प्रक्रिया की दक्षता बढ़ा दी। - कारखाने (Mill) के भीतर, सभी प्रक्रियाएं एक छत के नीचे और एक ही प्रबंधन के अंतर्गत आ गईं। इससे उत्पादन की गुणवत्ता पर नज़र रखना और श्रमिकों पर नियंत्रण रखना आसान हो गया, जो ग्रामीण इलाकों में काम करते समय संभव नहीं था।
औद्योगीकरण की प्रक्रिया कितनी तेज़ थी? क्या इसका मतलब केवल सूती कपड़ा उद्योगों का विकास था? 1. प्रमुख उद्योग: 1840 के दशक तक सूती कपड़ा उद्योग औद्योगीकरण के पहले चरण में सबसे अग्रणी क्षेत्र था। इसके बाद, लोहे और स्टील उद्योग ने गति पकड़ी क्योंकि रेलवे का विस्तार हो रहा था। 2. पारंपरिक उद्योगों का अस्तित्व: नए कारखाने पारंपरिक उद्योगों को आसानी से विस्थापित नहीं कर सके। 19वीं सदी के अंत में भी, तकनीकी रूप से उन्नत औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले कुल कार्यबल का 20 प्रतिशत से भी कम हिस्सा था। वस्त्र उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा अभी भी कारखानों के बाहर, घरों में हो रहा था। 3. तकनीकी परिवर्तन की धीमी गति: तकनीकी परिवर्तन बहुत धीरे-धीरे हुए। नई तकनीकें महंगी थीं और मशीनें अक्सर खराब हो जाती थीं, और उनकी मरम्मत महँगी होती थी। वे उतनी प्रभावी नहीं थीं जितना उनके आविष्कारक दावा करते थे। उदाहरण के लिए, भाप का इंजन (Steam Engine) जेम्स वाट द्वारा सुधारा गया, लेकिन इसे उद्योगों में बहुत धीरे-धीरे अपनाया गया।
विक्टोरियन इंग्लैंड (Victorian England) में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी। काम की तलाश में गरीब किसान बड़ी संख्या में शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। - क्योंकि श्रम प्रचुर मात्रा में था, इसलिए मज़दूरी कम थी। - उद्योगपति मशीनों को लगाने के इच्छुक नहीं थे, क्योंकि मशीनों के लिए बड़े पूंजी निवेश की आवश्यकता होती थी, जबकि हाथ से काम करने वाले मजदूर सस्ते में मिल जाते थे। - कई उद्योगों में, काम मौसमी (Seasonal) होता था (जैसे गैस वर्क्स या ब्रुअरीज)। ऐसे उद्योगों में मिल मालिक मशीनों की बजाय हाथ के श्रम को प्राथमिकता देते थे, जिन्हें केवल काम के सीज़न के दौरान ही काम पर रखा जाता था। - विविधता: कई उत्पाद केवल हाथ से ही बनाए जा सकते थे। मशीनें एक जैसी, मानकीकृत वस्तुएँ बड़ी मात्रा में बनाती थीं। लेकिन बाज़ार में अक्सर जटिल डिज़ाइन और विशिष्ट आकारों वाली वस्तुओं की मांग होती थी, जिसके लिए मानव कौशल की आवश्यकता थी। - उच्च वर्ग (कुलीन और पूंजीपति) हाथ से बनी वस्तुओं को प्राथमिकता देते थे क्योंकि वे परिष्करण (refinement) और वर्ग (class) का प्रतीक मानी जाती थीं।
श्रम की बहुतायत का मतलब था श्रमिकों के लिए भयानक जीवन स्थितियां। - शहरों में काम मिलना मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता था कि कारखाने में आपका कोई परिचित या रिश्तेदार है या नहीं। - अधिकांश श्रमिकों को काम खोजने से पहले हफ्तों तक इंतजार करना पड़ता था, पुलों के नीचे या रैन बसेरों (Night shelters) में सोना पड़ता था। - मज़दूरी बहुत कम थी और काम मौसमी होने के कारण साल के कई महीने श्रमिक बेरोजगार रहते थे। - मशीनों के आने से श्रमिकों को अपनी नौकरी जाने का डर सताने लगा। जब कपड़ा उद्योग में स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) मशीन पेश की गई, तो हाथ से ऊन कातने वाली महिलाओं ने इन नई मशीनों पर हमला कर दिया और उन्हें तोड़ दिया।
मशीन युग से पहले, अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार में भारत के रेशमी और सूती वस्त्रों का दबदबा था। - अरमेनियाई और फ़ारसी व्यापारी पंजाब से अफगानिस्तान, पूर्वी फारस और मध्य एशिया तक माल ले जाते थे। - सूरत (गुजरात), मसूलीपट्टनम (कोरोमंडल तट), और हुगली (बंगाल) के बंदरगाह इस व्यापार के मुख्य केंद्र थे। - लेकिन 1750 के दशक तक, भारतीय व्यापारियों द्वारा नियंत्रित यह नेटवर्क टूटने लगा। यूरोपीय कंपनियों (जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी) ने धीरे-धीरे सत्ता हासिल कर ली और सूरत और हुगली जैसे पुराने बंदरगाहों का पतन हो गया। उनके स्थान पर बंबई (Mumbai) और कलकत्ता (Kolkata) नए बंदरगाहों के रूप में उभरे।
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के बाद, उन्होंने भारतीय कपड़ा व्यापार पर एकाधिकार (Monopoly) स्थापित कर लिया। - कंपनी ने मौजूदा व्यापारियों और दलालों को खत्म करने और बुनकरों पर अधिक सीधा नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की। उन्होंने बुनकरों की निगरानी के लिए वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त किए जिन्हें गुमाश्ता (Gomasthas) कहा जाता था। - कंपनी ने बुनकरों को अन्य खरीदारों के साथ व्यापार करने से रोक दिया। उन्हें कच्चे माल के लिए अग्रिम ऋण (Advances) दिया जाता था और उन्हें अपना तैयार कपड़ा केवल गुमाश्ता को ही सौंपना पड़ता था। - पहले, व्यापारी गांवों में रहते थे और बुनकरों के साथ उनके अच्छे संबंध थे। लेकिन नए गुमाश्ता बाहरी लोग थे जो पुलिस के साथ आते थे और समय पर माल न देने पर बुनकरों को पीटते थे।
19वीं सदी की शुरुआत में, भारत से कपड़ा निर्यात में भारी गिरावट आई। - इंग्लैंड में कपास उद्योगों के विकास के कारण, ब्रिटिश उद्योगपतियों ने सरकार पर आयात शुल्क लगाने का दबाव डाला ताकि ब्रिटेन में भारतीय कपड़ों को प्रतिस्पर्धा से बाहर किया जा सके। - साथ ही, उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में ब्रिटिश कारखानों के निर्मित सामानों को बेचने के लिए मजबूर किया। - भारत में बुनकरों को अब दो समस्याओं का सामना करना पड़ा: (1) उनका निर्यात बाज़ार ढह गया था, और (2) स्थानीय बाज़ार मशीन-निर्मित ब्रिटिश (मैनचेस्टर) कपड़ों से भर गया था जो बहुत सस्ते थे।
भारत में पहली सूती कपड़ा मिल 1854 में बंबई में स्थापित की गई थी। इसके बाद 1855 में बंगाल में पहली जूट मिल लगी। कानपुर में 1860 के दशक में एल्गिन मिल शुरू हुई, और अहमदाबाद में भी उसी अवधि में सूती मिलें स्थापित हुईं।
जैसे-जैसे कारखानों का विस्तार हुआ, श्रमिकों की मांग बढ़ी। - अधिकांश औद्योगिक श्रमिक आस-पास के ग्रामीण जिलों से आते थे। जो किसान ग्रामीण इलाकों में काम नहीं ढूंढ पाते थे, वे शहरों की ओर पलायन कर गए। - उदाहरण के लिए, बंबई की सूती मिलों के अधिकांश मजदूर पास के रत्नागिरी जिले से आए थे। कानपुर की मिलों में काम करने वाले कानपुर जिले के ही गांवों से आते थे। - मिल मालिकों ने नए कर्मचारियों की भर्ती के लिए एक जॉबर (Jobber) को नियुक्त किया। जॉबर आमतौर पर एक पुराना और विश्वसनीय कर्मचारी होता था। वह अपने गांव से लोगों को लाता था, उन्हें नौकरी का भरोसा देता था, और शहर में बसने में उनकी मदद करता था।
भारत में यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियों की रुचि मुख्य रूप से चाय, कॉफी, जूट, और खनन में थी—वे उत्पाद जो मुख्य रूप से निर्यात के लिए आवश्यक थे, भारत में बिक्री के लिए नहीं। - जब भारतीय व्यवसायियों ने उद्योग स्थापित करना शुरू किया, तो उन्होंने मैनचेस्टर के सामानों के साथ प्रतिस्पर्धा करने से परहेज किया। इसलिए उन्होंने (कपड़े के बजाय) धागा (Yarn) बनाने की मिलें लगाईं। - लेकिन बीसवीं सदी के पहले दशक (स्वदेशी आंदोलन) तक, भारतीय उद्योगपतियों ने धागे के बजाय कपड़ा बनाना शुरू कर दिया। - प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में औद्योगिक उत्पादन में तेज़ी से वृद्धि हुई क्योंकि ब्रिटिश मिलें सेना की ज़रूरतों को पूरा करने में व्यस्त थीं और भारत में मैनचेस्टर का आयात कम हो गया था। भारतीय कारखानों को सेना के लिए जूट के बैग, वर्दी के लिए कपड़ा, तंबू और चमड़े के जूते बनाने के लिए कहा गया।
नए उत्पादों के लिए बाज़ार कैसे बनाया गया? इसका एक मुख्य तरीका विज्ञापन (Advertisements) था। - ब्रिटिश निर्माताओं ने भारतीय बाज़ारों पर कब्ज़ा करने के लिए अपने कपड़े के बंडलों पर लेबल (Labels) लगाना शुरू किया। - जब भारतीय खरीदार लेबल पर 'मेड इन मैनचेस्टर' (Made in Manchester) देखते थे, तो उन्हें कपड़ा खरीदने में आत्मविश्वास महसूस होता था। - इन लेबलों पर अक्सर भारतीय देवी-देवताओं (Indian Gods and Goddesses) की तस्वीरें छपी होती थीं। देवताओं की छवियों का उपयोग यह दिखाने के लिए किया जाता था कि विदेशी उत्पाद को ईश्वरीय स्वीकृति प्राप्त है। कृष्ण या सरस्वती की छवि का उद्देश्य एक विदेशी उत्पाद को भारतीयों के लिए परिचित बनाना था। - कैलेंडर (Calendars) का भी उपयोग किया जाता था क्योंकि इन्हें उन लोगों द्वारा भी पढ़ा (या देखा) जा सकता था जो पढ़ना नहीं जानते थे।