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जब हम 'वैश्वीकरण' (Globalization) की बात करते हैं, तो हम अक्सर एक ऐसी आर्थिक प्रणाली का उल्लेख करते हैं जो पिछले लगभग 50 वर्षों में उभरी है। लेकिन भूमंडलीकृत विश्व बनने का इतिहास बहुत पुराना है—यह व्यापार, प्रवास (migration), काम की तलाश में लोगों की आवाजाही, और पूंजी की आवाजाही का एक लंबा इतिहास है।
प्राचीन काल से ही, यात्री, व्यापारी, पुजारी और तीर्थयात्री ज्ञान, अवसर, और आध्यात्मिक शांति की तलाश में, या उत्पीड़न से बचने के लिए विशाल दूरियां तय करते रहे हैं। वे अपने साथ सामान, पैसा, मूल्य, विचार, आविष्कार, और यहाँ तक कि बीमारियां भी ले गए। - उदाहरण के लिए, 3000 ईसा पूर्व से ही तटीय व्यापार ने सिंधु घाटी की सभ्यता को वर्तमान पश्चिमी एशिया से जोड़ा था। - 1000 से अधिक वर्षों तक, मालदीव में पाई जाने वाली कौड़ियाँ (Cowries, जिन्हें पैसे के रूप में इस्तेमाल किया जाता था) चीन और पूर्वी अफ्रीका तक पहुँचती थीं।
रेशम मार्ग (Silk Routes) पूर्व-आधुनिक दुनिया में दुनिया के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने वाले व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों का सबसे अच्छा उदाहरण हैं। - 'सिल्क मार्ग' नाम पश्चिम की ओर जाने वाले चीनी रेशम के महत्व को दर्शाता है। - ये मार्ग ज़मीन और समुद्र दोनों से होकर गुज़रते थे, जो एशिया के विशाल क्षेत्रों को एक साथ जोड़ते थे, और एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से भी जोड़ते थे। - चीन से रेशम और बर्तन इन्हीं रास्तों से जाते थे; भारत और दक्षिण पूर्व एशिया से वस्त्र और मसाले जाते थे। बदले में, यूरोप से कीमती धातुएँ—सोना और चांदी—एशिया आती थीं। - व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान हमेशा साथ-साथ चलते थे। प्रारंभिक ईसाई मिशनरी और मुस्लिम प्रचारक इन्हीं रास्तों से एशिया आए। इससे भी बहुत पहले, पूर्वी भारत में उभरा बौद्ध धर्म (Buddhism) सिल्क रूट की विभिन्न शाखाओं के माध्यम से कई दिशाओं में फैल गया था।
भोजन सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कई उदाहरण पेश करता है। जब भी व्यापारी और यात्री नई जगहों पर जाते थे, वे नई फसलें लेकर जाते थे। - ऐसा माना जाता है कि नूडल्स चीन से पश्चिम की ओर गए और वहाँ जाकर स्पैगेटी (Spaghetti) बन गए। या, शायद अरब व्यापारी 5वीं सदी में सिसिली (इटली का एक द्वीप) में पास्ता ले गए। - आलू (Potato): कई आम खाद्य पदार्थ जैसे आलू, सोया, मूंगफली, मक्का, टमाटर, मिर्च, और शकरकंद हमारे पूर्वजों को लगभग पांच सदी पहले तक नहीं पता थे। ये खाद्य पदार्थ यूरोप और एशिया में तब आए जब क्रिस्टोफर कोलंबस ने गलती से अमेरिका (जिसमें उत्तरी, दक्षिणी अमेरिका और कैरिबियन शामिल हैं) की खोज कर ली थी। वास्तव में, हमारे कई सामान्य खाद्य पदार्थ अमेरिका के मूल निवासियों (अमेरिकन इंडियंस) से आए हैं। - यूरोप के गरीब लोगों के लिए आलू का आना जीवनरक्षक साबित हुआ। उन्होंने बेहतर खाना शुरू कर दिया और उनका जीवनकाल बढ़ गया। आयरलैंड के गरीब किसान आलू पर इतने निर्भर हो गए थे कि जब 1840 के दशक के मध्य में किसी बीमारी से आलू की फसल नष्ट हो गई, तो सैकड़ों हजारों लोग भुखमरी से मर गए (इसे आयरिश आलू अकाल कहा जाता है)।
16वीं शताब्दी में यूरोपीय नाविकों ने एशिया के लिए एक समुद्री मार्ग खोज लिया और सफलतापूर्वक अमेरिका तक भी पहुँच गए। - सदियों से अमेरिका दुनिया से कटा हुआ था। लेकिन 16वीं शताब्दी से इसकी विशाल भूमि, प्रचुर मात्रा में फसलें और खनिजों ने हर दिशा में व्यापार और जीवन को बदल दिया। - बीमारी का हथियार: पुर्तगाली और स्पेनिश विजय केवल सैन्य शक्ति का परिणाम नहीं थी। उनके पास जो सबसे शक्तिशाली हथियार था, वह कोई पारंपरिक सैन्य हथियार नहीं था। यह चेचक (Smallpox) जैसे कीटाणु थे जिन्हें वे अपने साथ ले गए थे। - क्योंकि अमेरिका के मूल निवासी लाखों वर्षों से दुनिया के बाकी हिस्सों से कटे हुए थे, इसलिए उनके शरीर में यूरोप से आने वाली बीमारियों के खिलाफ कोई प्रतिरक्षा (Immunity) नहीं थी। चेचक उनके लिए एक विनाशकारी हत्यारा साबित हुआ, जिसने पूरे समुदायों को मिटा दिया और विजय का मार्ग प्रशस्त किया।
19वीं सदी में दुनिया तेज़ी से बदल रही थी। अर्थशास्त्रियों ने इस अवधि में तीन प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों या 'प्रवाह' (Flows) की पहचान की है: 1. व्यापार का प्रवाह (Flow of Trade): इसमें मुख्य रूप से वस्तुओं का व्यापार (जैसे कपड़ा या गेहूँ) शामिल था। 2. श्रम का प्रवाह (Flow of Labor): रोजगार की तलाश में लोगों का पलायन। 3. पूंजी का प्रवाह (Flow of Capital): अल्पकालिक या दीर्घकालिक निवेश के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों में पूंजी का निवेश।
19वीं सदी के औद्योगीकरण के कारण यूरोप, विशेष रूप से ब्रिटेन में जनसंख्या तेजी से बढ़ी। - भोजन की मांग बढ़ने के कारण, ब्रिटेन में कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ गईं। - जमींदारों के दबाव में, ब्रिटिश सरकार ने मक्का के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया—इन कानूनों को कॉर्न लॉ (Corn Laws) के रूप में जाना जाता था। - भोजन की उच्च कीमतों से परेशान होकर, उद्योगपतियों और शहरवासियों ने कॉर्न लॉ को समाप्त करने के लिए सरकार को मजबूर किया। - कॉर्न लॉ के हटने के बाद, भोजन को ब्रिटेन में उस कीमत से भी सस्ता आयात किया जा सकता था जिस कीमत पर वह ब्रिटेन में उत्पादित होता था। ब्रिटिश कृषि आयातित खाद्य पदार्थों का मुकाबला नहीं कर सकी। - इसके परिणामस्वरूप, दुनिया भर में (पूर्वी यूरोप, रूस, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में) ब्रिटेन की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए ज़मीनें साफ़ की गईं और भोजन का उत्पादन बढ़ाया गया।
इस दौर में रेलवे, भाप के जहाज (Steamships) और टेलीग्राफ जैसे महत्वपूर्ण आविष्कार हुए। - परिवहन में सुधार का मतलब था कि कृषि उत्पाद बहुत दूर के बाज़ारों में तेज़ी से और सस्ते में पहुँचाए जा सकते थे। - रेफ्रिजरेटेड जहाज़ (Refrigerated ships): इसका एक बड़ा उदाहरण मांस का व्यापार है। 1870 के दशक तक, जानवरों को ज़िंदा अमेरिका से यूरोप ले जाया जाता था और फिर वहाँ उनका वध किया जाता था। लेकिन ज़िंदा जानवर जहाज़ों पर बहुत जगह घेरते थे और कई रास्ते में ही मर जाते थे। रेफ्रिजरेटेड जहाजों के विकास से अब जानवरों का वध उनके प्रारंभिक बिंदु (अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड) पर ही किया जा सकता था और उन्हें जमे हुए मांस (Frozen meat) के रूप में यूरोप ले जाया जाने लगा। इससे शिपिंग की लागत कम हुई और यूरोप में गरीबों को सस्ता और विविध भोजन मिला।
व्यापार के विस्तार का एक काला पक्ष भी था। दुनिया के कई हिस्सों में, व्यापार के विस्तार का अर्थ था स्वतंत्रता और आजीविका का नुकसान। - 19वीं सदी के अंत में यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका और एशिया के बड़े हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया। - अफ्रीका का विभाजन: 1885 में, बड़ी यूरोपीय शक्तियां अफ्रीका के नक्शे पर लकीरें खींचकर इसे आपस में बांटने के लिए बर्लिन में मिलीं। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम और बाद में अमेरिका ने अफ्रीका के विशाल क्षेत्रों को अपने उपनिवेशों में बदल दिया।
अफ्रीका में, 1890 के दशक में फैलने वाली एक बीमारी 'रिंडरपेस्ट' (Rinderpest) ने लोगों की आजीविका और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव डाला। - अफ्रीका में प्रचुर मात्रा में भूमि थी और आबादी कम थी। लोग अपनी ज़मीन और पशुधन पर निर्भर थे और वे मजदूरी के लिए काम करने के इच्छुक नहीं थे। - 1880 के दशक के अंत में, ब्रिटिश सोमालीलैंड पर हमला करने वाले इतालवी सैनिकों को खिलाने के लिए ब्रिटिश एशिया से आयातित घोड़ों के माध्यम से रिंडरपेस्ट अफ्रीका पहुंचा। - यह बीमारी जंगल की आग की तरह पूरे अफ्रीका में फैल गई और इसने 90% अफ्रीकी मवेशियों को मार डाला। मवेशियों के नष्ट होने से अफ्रीकियों की आजीविका छिन गई और उन्हें मजबूरन यूरोपीय खदानों और बागानों में मजदूरी करने के लिए विवश होना पड़ा।
19वीं सदी में भारत से लाखों मजदूरों को बागानों, खदानों और दुनिया भर में सड़क निर्माण परियोजनाओं में काम करने के लिए ले जाया गया। - इन मजदूरों को एक अनुबंध (Contract) के तहत काम पर रखा जाता था। अनुबंध में यह शर्त होती थी कि वे 5 साल काम करने के बाद भारत लौट सकते हैं। इन अनुबंधित मजदूरों को गिरमिटिया मजदूर (Indentured labour) कहा जाता था। - अधिकांश भारतीय मजदूर वर्तमान पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखे क्षेत्रों से आए थे। - भारतीय मजदूरों का मुख्य गंतव्य कैरेबियाई द्वीप (त्रिनिदाद, गुयाना और सूरीनाम), मॉरीशस और फिजी थे। - इसे अक्सर 'दासता की नई प्रणाली' (New system of slavery) के रूप में वर्णित किया गया, क्योंकि काम की स्थिति बहुत कठोर थी और मजदूरों के पास लगभग कोई कानूनी अधिकार नहीं थे।
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुँचाया।
अमेरिका में, 1920 के दशक में अर्थव्यवस्था ने तेज़ वृद्धि का अनुभव किया। - इस वृद्धि का एक महत्वपूर्ण पहलू बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) था। कार निर्माता हेनरी फोर्ड बड़े पैमाने पर उत्पादन के प्रणेता थे। उन्होंने शिकागो के बूचड़खाने (Slaughterhouse) की असेंबली लाइन को कार निर्माण के लिए अपनाया। - 'फोर्ड टी-मॉडल' (Ford T-Model) दुनिया की पहली बड़े पैमाने पर उत्पादित कार थी। - बड़े पैमाने पर उत्पादन ने कीमतों को कम कर दिया, जिससे अमेरिका में रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन, रेडियो आदि जैसे उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं की भारी मांग पैदा हुई (जो अक्सर क्रेडिट या किस्तों पर खरीदे जाते थे)।
1929 में दुनिया एक विनाशकारी आर्थिक संकट में डूब गई। इसे महामंदी कहा जाता है। - यह 1930 के दशक के मध्य तक जारी रहा। इस दौरान दुनिया के अधिकांश हिस्सों में उत्पादन, रोजगार, आय और व्यापार में भारी गिरावट देखी गई। - कारण: 1. कृषि अति-उत्पादन (Agricultural overproduction): कृषि उत्पादों की कीमतें गिर गईं, और किसानों ने अपनी आय बनाए रखने के लिए उत्पादन और बढ़ा दिया, जिससे बाज़ार में उत्पादों की भरमार हो गई और कीमतें और भी नीचे गिर गईं। 2. अमेरिका द्वारा ऋण वापस लेना: 1920 के दशक के मध्य में, कई देशों ने अपनी निवेश जरूरतों को अमेरिकी ऋण के माध्यम से पूरा किया था। लेकिन जब संकट के संकेत मिले, तो अमेरिकी उधारदाताओं ने अपना पैसा वापस लेना शुरू कर दिया। - परिणाम: अमेरिकी बैंक दिवालिया हो गए। उन्होंने ऋण वापस मांगना शुरू किया, लेकिन लोग चुका नहीं पाए। लाखों लोग बेरोजगार हो गए। अमेरिका का यह संकट जल्द ही पूरी दुनिया में फैल गया।
द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) ने और भी अधिक मृत्यु और विनाश का कारण बना। - युद्ध के बाद, वैश्विक अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए दो प्रमुख सबक सीखे गए: 1. बड़े पैमाने पर उत्पादन तब तक कायम नहीं रखा जा सकता जब तक बड़े पैमाने पर उपभोग न हो, और इसके लिए स्थिर आय (Steady income) की आवश्यकता होती है। आय केवल तभी स्थिर हो सकती है जब रोजगार स्थिर हो (Full employment)। 2. दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ आर्थिक संबंधों (पूंजी, माल और श्रम के प्रवाह) को विनियमित करने के लिए सरकार का हस्तक्षेप आवश्यक है।
जुलाई 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर के ब्रेटन वुड्स (Bretton Woods) में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक और वित्तीय सम्मेलन में एक रूपरेखा पर सहमति बनी। - इस सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की स्थापना की गई ताकि सदस्य देशों के बाहरी घाटे और अधिशेष (Surpluses and deficits) को प्रबंधित किया जा सके। - युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण के वित्तपोषण के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (जिसे लोकप्रिय रूप से विश्व बैंक / World Bank के रूप में जाना जाता है) की स्थापना की गई। - IMF और विश्व बैंक को ब्रेटन वुड्स ट्विन्स (Bretton Woods Twins) कहा जाता है। इन दोनों संस्थानों ने 1947 में अपना वित्तीय संचालन शुरू किया। इनमें निर्णय लेने का अधिकार पश्चिमी औद्योगिक देशों, विशेष रूप से अमेरिका के पास है (अमेरिका के पास IMF और विश्व बैंक के निर्णयों पर वीटो का अधिकार है)।