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भारत में राष्ट्रवाद — अध्ययन नोट्स

विस्तृत सिद्धांत, सूत्र, आरेख और स्मृति सहायक।

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1. प्रस्तावना (Introduction)

यूरोप की तरह, भारत में भी आधुनिक राष्ट्रवाद का विकास उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन (Anti-colonial movement) के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ था। औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ संघर्ष के दौरान लोगों ने एकता की खोज की। उत्पीड़न और दमन के साझा अनुभव ने विभिन्न समूहों को एक साथ बाँध दिया। लेकिन प्रत्येक वर्ग और समूह ने उपनिवेशवाद के प्रभावों को अलग-अलग तरीके से महसूस किया, उनके अनुभव अलग थे, और स्वतंत्रता की उनकी धारणाएं भी हमेशा एक जैसी नहीं थीं। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इन समूहों को एक आंदोलन के भीतर एकजुट करने का प्रयास किया।


2. प्रथम विश्व युद्ध, खिलाफत और असहयोग (The First World War, Khilafat and Non-Cooperation)

1919 के बाद के वर्षों में, राष्ट्रीय आंदोलन नए क्षेत्रों में फैल गया, इसमें नए सामाजिक समूह शामिल हुए, और संघर्ष के नए तरीके विकसित हुए। - प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव: युद्ध ने एक नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी। इसने रक्षा व्यय में भारी वृद्धि की, जिसे युद्ध ऋणों और बढ़ते करों (custom duties) के माध्यम से पूरा किया गया। आयकर (Income tax) पेश किया गया। 1913 और 1918 के बीच कीमतें दोगुनी हो गईं, जिससे आम लोगों के लिए अत्यधिक कठिनाइयाँ पैदा हुईं। - गाँवों से सैनिकों की जबरन भर्ती (Forced recruitment) से ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक गुस्सा फैल गया। - 1918-19 और 1920-21 में भारत के कई हिस्सों में फसलें खराब हो गईं, जिसके परिणामस्वरूप भोजन की भारी कमी हो गई। इसके साथ ही इन्फ्लूएंजा महामारी फैल गई। 1921 की जनगणना के अनुसार, अकाल और महामारी के कारण 12 से 13 मिलियन लोग मारे गए।

सत्याग्रह का विचार (The Idea of Satyagraha)

महात्मा गांधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। वहाँ उन्होंने एक नए तरीके के जन आंदोलन के माध्यम से नस्लवादी शासन का सफलतापूर्वक मुकाबला किया था, जिसे वे सत्याग्रह कहते थे। - सत्याग्रह के विचार ने सत्य की शक्ति और सत्य की खोज की आवश्यकता पर बल दिया। - इसका सुझाव था कि यदि कारण सच्चा है, यदि संघर्ष अन्याय के खिलाफ है, तो उत्पीड़क से लड़ने के लिए शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है। - भारत में गांधीजी ने कई स्थानों पर सत्याग्रह आंदोलन सफलतापूर्वक आयोजित किए: - 1917: चंपारण (बिहार) - दमनकारी बागान प्रणाली के खिलाफ किसानों को प्रेरित करने के लिए। - 1917: खेड़ा (गुजरात) - फसल खराब होने और प्लेग महामारी से प्रभावित किसानों का समर्थन करने के लिए (लगान में छूट की मांग)। - 1918: अहमदाबाद - सूती कपड़ा मिल मजदूरों के बीच सत्याग्रह आंदोलन।

रॉलेट एक्ट (The Rowlatt Act, 1919)

इस सफलता से उत्साहित होकर, गांधीजी ने 1919 में प्रस्तावित रॉलेट एक्ट के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह शुरू करने का फैसला किया। - इस अधिनियम को इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के माध्यम से जल्दबाजी में पारित किया गया था, बावजूद इसके कि भारतीय सदस्यों ने इसका कड़ा विरोध किया था। - इसने सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को दबाने के लिए भारी शक्तियां दीं, और राजनीतिक कैदियों को बिना मुकदमे के दो साल तक हिरासत में रखने की अनुमति दी।

जलियांवाला बाग हत्याकांड: - 13 अप्रैल 1919 को कुख्यात जलियांवाला बाग की घटना हुई। - अमृतसर के जलियांवाला बाग मैदान में भारी भीड़ जमा हुई थी; कुछ लोग बैसाखी के वार्षिक मेले में भाग लेने आए थे और कुछ सरकार के नए दमनकारी उपायों का विरोध करने आए थे। - जनरल डायर (General Dyer) ने क्षेत्र में प्रवेश किया, निकास द्वारों को बंद कर दिया और भीड़ पर गोलियां चला दीं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। उसका घोषित उद्देश्य सत्याग्रहियों के मन में 'आतंक और विस्मय' की भावना पैदा करना था।

खिलाफत और असहयोग आंदोलन (Khilafat and Non-Cooperation)

रॉलेट सत्याग्रह मुख्य रूप से शहरों और कस्बों तक ही सीमित था। गांधीजी को लगा कि भारत में एक व्यापक जन आंदोलन शुरू करने की आवश्यकता है, लेकिन उनका मानना था कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक साथ लाए बिना ऐसा कोई आंदोलन आयोजित नहीं किया जा सकता। - खिलाफत का मुद्दा: प्रथम विश्व युद्ध में ओटोमन तुर्की की हार हुई थी। अफवाहें थीं कि ओटोमन सम्राट—इस्लामिक विश्व के आध्यात्मिक प्रमुख (खलीफा)—पर एक कठोर शांति संधि थोपी जा रही थी। - खलीफा की लौकिक शक्तियों की रक्षा के लिए, मार्च 1919 में बॉम्बे में एक खिलाफत समिति (Khilafat Committee) का गठन किया गया था। - मुहम्मद अली और शौकत अली जैसे युवा मुस्लिम नेताओं ने इस मुद्दे पर संयुक्त जन कार्रवाई की संभावना के बारे में महात्मा गांधी के साथ चर्चा शुरू की। - कलकत्ता अधिवेशन (सितंबर 1920) में, गांधीजी ने अन्य नेताओं को खिलाफत और स्वराज्य (Swaraj) के समर्थन में एक असहयोग आंदोलन शुरू करने की आवश्यकता के बारे में आश्वस्त किया।

असहयोग क्यों? (Why Non-Cooperation?) अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज (Hind Swaraj, 1909) में, महात्मा गांधी ने घोषणा की थी कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से स्थापित हुआ था और केवल इसी सहयोग के कारण जीवित रहा है। यदि भारतीय सहयोग करने से इंकार कर दें, तो भारत में ब्रिटिश शासन एक वर्ष के भीतर ढह जाएगा और स्वराज्य की स्थापना हो जाएगी।

आंदोलन कैसे आगे बढ़ा? 1. सरकार द्वारा दी गई उपाधियों का समर्पण। 2. सिविल सेवाओं, सेना, पुलिस, अदालतों और विधान परिषदों का बहिष्कार (Boycott)। 3. स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।


3. आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ (Differing Strands within the Movement)

असहयोग-खिलाफत आंदोलन जनवरी 1921 में शुरू हुआ। विभिन्न सामाजिक समूहों ने इसमें भाग लिया, लेकिन 'स्वराज्य' शब्द का अर्थ सभी के लिए अलग-अलग था।

चौरी चौरा की घटना (1922): गोरखपुर के चौरी चौरा में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन पुलिस के साथ हिंसक झड़प में बदल गया। पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाई और भीड़ ने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसा को देखकर महात्मा गांधी ने फरवरी 1922 में असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया।


4. सविनय अवज्ञा की ओर (Towards Civil Disobedience)

साइमन कमीशन (The Simon Commission)

1927 में, ब्रिटेन की नई टोरी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग का गठन किया। इसका कार्य भारत में संवैधानिक प्रणाली के कामकाज को देखना और परिवर्तनों का सुझाव देना था। इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था; वे सभी ब्रिटिश थे। - जब साइमन कमीशन 1928 में भारत आया, तो उसका स्वागत 'साइमन गो बैक' (Simon, Go Back) के नारों के साथ किया गया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहित सभी पार्टियों ने विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।

पूर्ण स्वराज्य (Purna Swaraj)

दिसंबर 1929 में, जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में, कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (Lahore Congress) ने 'पूर्ण स्वराज्य' (Complete Independence) की मांग को औपचारिक रूप दिया। यह घोषित किया गया कि 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

नमक मार्च और सविनय अवज्ञा आंदोलन (The Salt March and the Civil Disobedience Movement)

महात्मा गांधी ने पाया कि नमक एक शक्तिशाली प्रतीक है जो देश को एकजुट कर सकता है। नमक अमीर और गरीब दोनों द्वारा उपभोग किया जाता था, और यह भोजन का सबसे आवश्यक वस्तुओं में से एक था। नमक के उत्पादन पर राज्य का एकाधिकार और उस पर लगाया गया कर, गांधीजी के अनुसार, ब्रिटिश शासन का सबसे दमनकारी चेहरा था।

असहयोग आंदोलन (1921-22) से यह कैसे अलग था? अब लोगों को न केवल अंग्रेजों के साथ सहयोग करने से इनकार करने के लिए कहा गया था, बल्कि औपनिवेशिक कानूनों को तोड़ने के लिए भी कहा गया था। देश के विभिन्न हिस्सों में हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा, सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किया, विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया, और किसानों ने राजस्व और चौकीदारी करों (chowkidari taxes) का भुगतान करने से इनकार कर दिया।

गांधी-इरविन समझौता (Gandhi-Irwin Pact)

जैसे-जैसे आंदोलन हिंसक होने लगा (सरकार द्वारा क्रूर दमन के कारण), गांधीजी ने एक बार फिर आंदोलन को वापस ले लिया और 5 मार्च 1931 को लॉर्ड इरविन के साथ एक समझौते (Gandhi-Irwin Pact) पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत, गांधीजी गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) में भाग लेने के लिए सहमत हुए और सरकार ने राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर सहमति व्यक्त की।

लंदन में वार्ता विफल रही और जब गांधीजी लौटे, तो उन्होंने आंदोलन को फिर से शुरू किया (1932 में), जो 1934 तक गति खो चुका था।


5. सामूहिक अपनेपन का भाव (The Sense of Collective Belonging)

राष्ट्रवाद तब फैलता है जब लोग यह मानने लगते हैं कि वे सभी एक ही राष्ट्र का हिस्सा हैं, जब उन्हें कुछ ऐसी एकता मिल जाती है जो उन्हें आपस में बाँधती है। यह सामूहिक अपनेपन की भावना आंशिक रूप से संयुक्त संघर्षों के अनुभव से आई थी।

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