संख्याओं का वह क्रम जिसमें क्रमागत पदों का अंतर नियत रहता है, समांतर श्रेढ़ी कहलाता है। यह अध्याय अनुक्रमों और श्रेढ़ियों का परिचय प्रदान करता है। समांतर श्रेढ़ी का अध्ययन गणित के साथ-साथ दैनिक जीवन में भी उपयोगी है, जैसे ब्याज की गणना, वस्तुओं के मूल्य में नियमित वृद्धि, पंक्ति में वस्तुओं की व्यवस्था आदि।
किसी समांतर श्रेढ़ी में क्रमागत दो पदों का अंतर नियत रहता है, इस नियत अंतर को सार्व अंतर (Common Difference) कहते हैं और इसे $d$ से निरूपित करते हैं। प्रथम पद को $a$ से निरूपित किया जाता है। यदि सार्व अंतर धनात्मक हो तो पद बढ़ते जाते हैं, ऋणात्मक होने पर घटते जाते हैं, और शून्य होने पर सभी पद समान होते हैं।
इस अध्याय में हम समांतर श्रेढ़ी का $n$वाँ पद और प्रथम $n$ पदों का योग ज्ञात करने के सूत्रों का अध्ययन करेंगे। इन सूत्रों का उपयोग करके विभिन्न व्यावहारिक समस्याओं को हल किया जा सकता है।
एक अनुक्रम $a_1, a_2, a_3, ..., a_n$ समांतर श्रेढ़ी कहलाता है, यदि:
$$a_2 - a_1 = a_3 - a_2 = ... = a_n - a_{n-1} = d$$
अर्थात क्रमागत पदों का अंतर सदैव नियत $d$ होता है।
उदाहरण: - $2, 4, 6, 8, ...$ (यहाँ $a = 2, d = 2$) - $10, 7, 4, 1, ...$ (यहाँ $a = 10, d = -3$) - $5, 5, 5, 5, ...$ (यहाँ $a = 5, d = 0$)
ध्यान दें: सभी अनुक्रम समांतर श्रेढ़ी नहीं होते। उदाहरण के लिए, $1, 4, 9, 16, ...$ समांतर श्रेढ़ी नहीं है क्योंकि इसके क्रमागत अंतर $3, 5, 7$ नियत नहीं हैं।
किसी समांतर श्रेढ़ी का सामान्य रूप लिखा जा सकता है:
$$a, a + d, a + 2d, a + 3d, ...$$
किसी समांतर श्रेढ़ी का $n$वाँ पद (जिसे $a_n$ लिखते हैं) निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है:
$$a_n = a + (n - 1)d$$
यहाँ: - $a$ = प्रथम पद - $d$ = सार्व अंतर - $n$ = पद की स्थिति (पद संख्या)
उदाहरण: श्रेढ़ी $2, 5, 8, 11, ...$ का 10वाँ पद ज्ञात कीजिए। $$a_{10} = 2 + (10 - 1) \times 3 = 2 + 27 = 29$$
इस सूत्र की सहायता से हम न केवल $n$वाँ पद ज्ञात कर सकते हैं, बल्कि यदि किसी पद का मान दिया हो, तो उसकी स्थिति $n$ भी ज्ञात कर सकते हैं:
$$n = \frac{a_n - a}{d} + 1$$
किसी समांतर श्रेढ़ी के प्रथम $n$ पदों का योग $S_n$ निम्न सूत्र से ज्ञात किया जाता है:
$$S_n = \frac{n}{2}[2a + (n - 1)d]$$
यदि $n$वाँ पद $a_n = l$ ज्ञात हो, तो:
$$S_n = \frac{n}{2}(a + l)$$
जहाँ $l$ अंतिम पद है।
उदाहरण: श्रेढ़ी $1, 2, 3, ..., 100$ का योग: $$S_{100} = \frac{100}{2}(1 + 100) = 50 \times 101 = 5050$$
महत्वपूर्ण संबंध: यदि किसी समांतर श्रेढ़ी के प्रथम $n$ पदों का योग $S_n$ दिया हो, तो उसका $n$वाँ पद निम्न संबंध से ज्ञात किया जाता है:
$$a_n = S_n - S_{n-1}$$
साथ ही, $S_n$ और $S_{n-1}$ में संबंध से $a_n$ ज्ञात करके सार्व अंतर और प्रथम पद भी ज्ञात किए जा सकते हैं।
कुछ प्रश्नों में तीन पदों को $(a - d), a, (a + d)$ के रूप में तथा चार पदों को $(a - 3d), (a - d), (a + d), (a + 3d)$ के रूप में लेने से गणना सरल हो जाती है। इससे योग को तुरंत सरल बनाया जा सकता है क्योंकि मध्य पद सरल रूप में आ जाते हैं।
उदाहरण: यदि तीन संख्याएँ समांतर श्रेढ़ी में हैं और उनका योग 15 तथा गुणनफल 45 है, तो माना संख्याएँ $a - d, a, a + d$ हैं। $$(a - d) + a + (a + d) = 3a = 15 \Rightarrow a = 5$$ $$(5 - d)(5)(5 + d) = 45 \Rightarrow 25 - d^2 = 9 \Rightarrow d = \pm 4$$ अतः संख्याएँ 1, 5, 9 या 9, 5, 1 हैं।
समांतर श्रेढ़ी का उपयोग निम्न प्रकार की समस्याओं में होता है: - नियमित अंतराल पर मूल्य में वृद्धि या कमी। - खेल के मैदान में पंक्तियों में सीटों की संख्या। - ब्याज की गणना साधारण ब्याज के अंतर्गत। - त्रिभुज की क्रमिक पंक्तियों में व्यवस्थित वस्तुएँ।
इन स्थितियों को पहचानकर समस्या को समांतर श्रेढ़ी के रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक है।
| राशि | सूत्र |
|---|---|
| $n$वाँ पद | $a_n = a + (n - 1)d$ |
| प्रथम $n$ पदों का योग | $S_n = \frac{n}{2}[2a + (n - 1)d]$ |
| योग (अंतिम पद के साथ) | $S_n = \frac{n}{2}(a + l)$ |
| पद ज्ञात करना | $a_n = S_n - S_{n-1}$ |
| श्रेढ़ी | प्रथम पद $a$ | सार्व अंतर $d$ | प्रकार |
|---|---|---|---|
| $3, 7, 11, 15$ | 3 | 4 | वर्धमान |
| $12, 9, 6, 3$ | 12 | -3 | ह्रासमान |
| $5, 5, 5, 5$ | 5 | 0 | अचर |
| $n$ | पद $a_n$ (जब $a = 2, d = 3$) | योग $S_n$ |
|---|---|---|
| 1 | 2 | 2 |
| 2 | 5 | 7 |
| 3 | 8 | 15 |
| 4 | 11 | 26 |
समांतर श्रेढ़ियों के अध्याय में हमने अनुक्रमों की अवधारणा, समांतर श्रेढ़ी की परिभाषा, $n$वाँ पद ज्ञात करने का सूत्र तथा प्रथम $n$ पदों के योग के सूत्रों का अध्ययन किया। ये सूत्र दैनिक जीवन की कई स्थितियों जैसे मूल्य-वृद्धि, ब्याज और व्यवस्थाओं को हल करने में प्रयुक्त होते हैं। सूत्रों को याद रखने तथा उनका सही अनुप्रयोग करने से इस अध्याय में पूर्ण अंक अर्जित किए जा सकते हैं। पद और योग के बीच के संबंध की समझ परीक्षा में अत्यधिक लाभकारी सिद्ध होती है।