कक्षा दसवीं के संस्कृत पाठ्यक्रम (शेमुषी) का दूसरा पाठ बुद्धिर्बलवती सदा एक प्रसिद्ध कथा पर आधारित है, जो बताती है कि बुद्धि ही सदा बलवती होती है। यह पाठ बुद्धि और बल के संबंध को स्पष्ट करता है। इस कथा में बुद्धिमान मंत्री 'बुध' और राजा 'जनक' का उल्लेख मिलता है। वीर (सेनापति) 'वीरबाहु' जैसे बलवान व्यक्ति का वर्णन है। पाठ के अनुसार राजा जनक के पास एक बुद्धिमान मंत्री था जिसका नाम बुध था। राजा जनक को अपनी राज्य की सुरक्षा की चिंता थी। एक बार शत्रु राजा की सेना द्वारा राज्य पर आक्रमण हुआ। राजा जनक अपनी सेना सहित युद्ध की तैयारी करने लगा। किंतु बुद्धिमान मंत्री बुध ने राजा को सलाह दी कि बुद्धि के द्वारा ही शत्रु को पराजित किया जा सकता है। बुध ने शत्रु शिविर में अपने दूत भेजकर ऐसी कुशलता दिखाई कि शत्रु की सेना बिना युद्ध ही विचलित हो गई। इस प्रकार बुद्धि की सहायता से बिना रक्तपात ही राज्य की रक्षा हुई। इस पाठ का शीर्षक 'बुद्धि + बलवती + सदा' है, अर्थात् बुद्धि सदा (हमेशा) बलवती होती है। यह पाठ बच्चों को यह शिक्षा देता है कि केवल शारीरिक बल ही महत्वपूर्ण नहीं है, वरन् बुद्धि का प्रयोग करना अधिक आवश्यक है। बुद्धि से बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना किया जा सकता है।
पाठ के अनुसार, राजा जनक के मंत्री का नाम 'बुध' था। राजा जनक की चिंता थी कि शत्रु राज्य द्वारा उनके राज्य पर आक्रमण हो सकता है। राजा जनक अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार करना चाहते थे। किंतु बुद्धिमान मंत्री बुध ने राजा को समझाया कि युद्ध में रक्तपात होता है और अनेक जीवन नष्ट होते हैं। युद्ध का मार्ग अपनाने के स्थान पर बुद्धि के मार्ग से ही शत्रु को पराजित करना चाहिए। बुध ने राजा से कहा कि बुद्धि सदा बलवती होती है। केवल शारीरिक बल से कार्य नहीं होता। इसलिए युद्ध से पहले हमें बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।
पाठ में वीरबाहु नामक एक बलवान योद्धा का उल्लेख मिलता है। वीरबाहु शारीरिक बल में बहुत प्रबल था। किंतु उसके बल का उचित उपयोग बुद्धि के द्वारा ही किया जा सकता था। इससे पता चलता है कि केवल बल से काम नहीं बनता। बल के साथ बुद्धि का होना अत्यंत आवश्यक है। यहाँ बल और बुद्धि दोनों के महत्व को दर्शाया गया है।
मंत्री बुध ने अपनी कुशल नीति से शत्रु को पराजित किया। उसने शत्रु की सेना में अपने गुप्तचर भेजे। गुप्तचरों ने शत्रु की सेना में भ्रम फैलाया। उन्होंने शत्रु सैनिकों को समझाया कि राजा जनक की सेना अत्यंत शक्तिशाली है और उनके पास अनेक युद्ध कौशल हैं। शत्रु की सेना में इस प्रकार का भ्रम फैलने से शत्रु विचलित हो गया। बिना युद्ध ही शत्रु पीछे हट गया। इस प्रकार बुध की बुद्धि के कारण राज्य की बिना रक्तपात रक्षा हुई।
इस पाठ का नैतिक संदेश है कि बुद्धि सदा बलवती होती है। जहाँ बुद्धि है, वहाँ बल अपने आप उपस्थित रहता है। बुद्धिमान व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थिति में भी सफलता प्राप्त कर लेता है। हमें कठिनाइयों का सामना करने के लिए बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए, न कि केवल शारीरिक बल का। बुद्धि से हम शत्रु को भी मित्र बना सकते हैं।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | राजा | राजानौ | राजानः |
| द्वितीया | राजानम् | राजानौ | राज्ञः |
| तृतीया | राज्ञा | राजभ्याम् | राजभिः |
| चतुर्थी | राज्ञे | राजभ्याम् | राजभ्यः |
| पंचमी | राज्ञः | राजभ्याम् | राजभ्यः |
| षष्ठी | राज्ञः | राज्ञोः | राज्ञाम् |
| सप्तमी | राज्ञि | राज्ञोः | राजसु |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| बुद्धिः | बुद्धि | बलवती | बलवान (स्त्रीलिंग में) |
| सदा | हमेशा | बलम् | बल, शक्ति |
| मन्त्री | मंत्री | राजा | राजा |
| जनकः | जनक | शत्रुः | शत्रु |
| सेना | सेना | युद्धम् | युद्ध, लड़ाई |
| रक्तपातम् | खून बहाना | गुप्तचरः | जासूस, गुप्तचर |
| कुशलः | चतुर | नीतिः | नीति, चालाकी |
| विचलितः | विचलित | पराजयः | हार |
| विजयः | जय | मन्त्रः | सलाह |
| शक्तिः | शक्ति | अभ्युपायः | उपाय |
| पात्र | पद | विशेषता |
|---|---|---|
| जनक | राजा | राज्य की चिंता करने वाला |
| बुध | मंत्री | बुद्धिमान, कुशल नीति का जानकार |
| वीरबाहु | वीर/सेनापति | शारीरिक बल में प्रबल |
| बुद्धि | बल |
|---|---|
| युद्ध से बचाती है | रक्तपात करवाता है |
| शत्रु को मित्र बना सकती है | शत्रु से लड़ता है |
| कठिनाइयों का उपाय खोजती है | सीधे सामना करता है |
| विजय की गारंटी देती है | विजय निश्चित नहीं |
| सदा बलवती | अस्थायी होता है |
पाठ 'बुद्धिर्बलवती सदा' हमें यह महत्वपूर्ण शिक्षा देता है कि बुद्धि ही सदा बलवती होती है। राजा जनक के बुद्धिमान मंत्री बुध ने अपनी कुशल नीति से बिना युद्ध ही शत्रु को पराजित कर दिया। इससे स्पष्ट होता है कि शारीरिक बल के स्थान पर बुद्धि का प्रयोग अधिक सफलता प्रदान करता है। जीवन की हर कठिनाई में हमें बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए। बुद्धि से ही हम रक्तपात से बच सकते हैं, शत्रु को मित्र बना सकते हैं और विजय प्राप्त कर सकते हैं। यह पाठ बुद्धि के महत्व का सदैव स्मरण कराता है।