कक्षा दसवीं के संस्कृत पाठ्यक्रम (शेमुषी) का पाँचवाँ पाठ जननी तुल्यवत्सला है, जिसमें माँ के स्नेह और ममता की तुलना गाय (धेनु) से की गई है। पाठ का शीर्षक 'जननी + तुल्या + वत्सला' है, जिसका अर्थ है - जो (माँ) बछड़े (वत्स) के प्रति स्नेह रखने वाली गाय की तरह है। यह पाठ एक कविता के रूप में है, जिसमें माँ के त्याग, प्रेम और सेवा का वर्णन है। माँ अपने बच्चे के लिए सब कुछ त्याग देती है। वह अपने बच्चे की सेवा में अपना सारा समय बिताती है। जिस प्रकार गाय अपने बछड़े के लिए दूध देती है और उसकी रक्षा करती है, उसी प्रकार माँ अपने बच्चे के लिए सब कुछ करती है। पाठ में माँ के विभिन्न गुणों का वर्णन है - माँ स्नेहशीला है, त्यागी है, सर्वस्व देने वाली है और अपने बच्चे के दुख-सुख में सदा साथ रहने वाली है। इस पाठ का उद्देश्य माँ के प्रति आदर और प्रेम का भाव जगाना है। माँ ईश्वर के समान पूजनीय है। हमें अपनी माँ का सदैव आदर और सम्मान करना चाहिए। यह पाठ हमें मातृभक्ति और मातृसेवा की प्रेरणा देता है।
पाठ में माँ की तुलना गाय से की गई है। गाय अपने बछड़े के लिए जिस प्रकार दूध देती है, उसी प्रकार माँ अपने बच्चे के लिए सब कुछ अर्पित कर देती है। जिस प्रकार गाय बछड़े की रक्षा करती है, उसी प्रकार माँ अपने बच्चे की रक्षा करती है। माँ का स्नेह गाय के स्नेह के समान होता है। इसीलिए पाठ का शीर्षक 'जननी तुल्यवत्सला' है।
माँ का त्याग अतुलनीय है। माँ अपने सुखों का त्याग करके अपने बच्चे के लिए सब कुछ करती है। वह भूखी रहकर भी अपने बच्चे को खिलाती है। वह स्वयं कष्ट सहकर भी अपने बच्चे को सुख देती है। माँ का प्रेम निस्वार्थ होता है। वह बदले में कुछ नहीं चाहती। माँ के स्नेह की कोई सीमा नहीं होती।
माँ अपने बच्चे की सेवा में अपना सारा समय लगाती है। वह बच्चे को दूध पिलाती है, उसे नहलाती है, उसे कपड़े पहनाती है और उसे सुलाती है। बच्चा जब बीमार होता है तो माँ उसके सिरहाने बैठकर रातों की नींद भी त्याग देती है। माँ की सेवा का कोई जोड़ नहीं है। हम माँ की सेवा का बदला कभी नहीं चुका सकते।
पाठ हमें माँ के प्रति आदर का भाव सिखाता है। माँ ही हमारी पहली गुरु है। माँ हमें चलना, बोलना और जीवन जीना सिखाती है। माँ का आशीर्वाद ही हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। हमें माँ की सेवा करनी चाहिए और उनका आदर करना चाहिए। माँ से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | जननी | जनन्यौ | जनन्यः |
| द्वितीया | जननीम् | जनन्यौ | जननीः |
| तृतीया | जनन्या | जननीभ्याम् | जननीभिः |
| चतुर्थी | जनन्यै | जननीभ्याम् | जननीभ्यः |
| पंचमी | जनन्याः | जननीभ्याम् | जननीभ्यः |
| षष्ठी | जनन्याः | जनन्योः | जननीनाम् |
| सप्तमी | जनन्याम् | जनन्योः | जननीषु |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| जननी | माँ | तुल्या | समान |
| वत्सला | स्नेह करने वाली | धेनुः | गाय |
| वत्सः | बछड़ा | स्नेहः | प्रेम |
| त्यागः | त्याग | ममता | ममता |
| सेवा | सेवा | पूजनीया | पूजनीय |
| आशीर्वादः | आशीर्वाद | निस्वार्थम् | निस्वार्थ |
| अमूल्यम् | अमूल्य | रक्षा | रक्षा |
| सुखम् | सुख | दुःखम् | दुख |
| परम् | सर्वोत्तम | गुरुः | गुरु |
| पुत्रः | पुत्र | आदरः | आदर |
| माँ | गाय |
|---|---|
| बच्चे को दूध पिलाती है | बछड़े को दूध देती है |
| बच्चे की रक्षा करती है | बछड़े की रक्षा करती है |
| बच्चे के लिए सब कुछ त्यागती है | दूध सहित सब कुछ देती है |
| बच्चे का स्नेह पाती है | बछड़े का स्नेह पाती है |
| बच्चे को सिखाती है | बछड़े को चलना सिखाती है |
| गुण | विवरण |
|---|---|
| स्नेहशीलता | बच्चे के प्रति असीम प्रेम |
| त्याग | अपने सुख का त्याग |
| निस्वार्थता | बदले में कुछ नहीं चाहती |
| सेवाभाव | बच्चे की निरंतर सेवा |
| पूजनीयता | ईश्वर के समान |
पाठ 'जननी तुल्यवत्सला' माँ के अतुलनीय स्नेह और त्याग का वर्णन करता है। जिस प्रकार गाय अपने बछड़े के प्रति स्नेह और त्याग रखती है, उसी प्रकार माँ अपने बच्चे के प्रति होती है। माँ हमारी पहली गुरु, रक्षक और सेविका है। उसका प्रेम निस्वार्थ है और त्याग अतुलनीय है। हमें अपनी माँ का सदैव आदर करना चाहिए, उनकी सेवा करनी चाहिए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। मातृसेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। इस पाठ से हमें मातृभक्ति और मातृसेवा की प्रेरणा मिलती है।