कक्षा दसवीं के संस्कृत पाठ्यक्रम (शेमुषी) का यह अध्याय 'नवमः अध्यायः' है। इस अध्याय का मूल विषय 'सत्यस्य विजयः' (सत्य की विजय) है। यह एक रोचक कथा है, जो सत्य बोलने के महत्व को दर्शाती है। कथा में सत्यवादी बालक 'सत्यक' की कहानी है, जो कभी झूठ नहीं बोलता था। एक बार जंगल में उसने एक बीमार और घायल हिरण देखा। वह उसकी सेवा करने लगा। इस बीच उसके पिता ने पूछा कि तुम कहाँ थे? सत्यक ने सच बताया कि वह घायल हिरण की सेवा में व्यस्त था। राजा को जब यह ज्ञात हुआ कि सत्यक ने जंगल में घायल हिरण की सेवा की है, तो राजा प्रसन्न हुआ। राजा ने सत्यक की प्रशंसा की और उसे पुरस्कृत किया। इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सत्य बोलने से सदा विजय मिलती है। सत्य बोलने वाले व्यक्ति को कभी हार नहीं होती। सत्य परम धर्म है। सत्य से बढ़कर कुछ नहीं है। यह अध्याय विद्यार्थियों को सत्य बोलने की प्रेरणा देता है और दया, सेवा एवं करुणा का महत्व सिखाता है।
किसी गाँव में सत्यक नामक एक बालक रहता था। वह सदा सत्य बोलता था। उसके मुख से कभी झूठ नहीं निकलता था। वह सदा सच बोलता था, चाहे उससे कुछ भी हो। सत्यक के सत्यवादी स्वभाव के कारण गाँव के सभी लोग उसका आदर करते थे। उसके पिता उसे सत्य का महत्व सिखाते थे। पिता कहते थे कि सत्य ही सबसे बड़ा धर्म है।
एक दिन सत्यक जंगल में गया। वहाँ उसने एक घायल हिरण को देखा। हिरण को बहुत पीड़ा हो रही थी। सत्यक को हिरण पर दया आई। वह हिरण के पास गया और उसकी सेवा करने लगा। उसने हिरण के घाव पर औषधि लगाई और उसे पानी पिलाया। वह कई दिनों तक हिरण की सेवा करता रहा। धीरे-धीरे हिरण स्वस्थ हो गया। हिरण सत्यक को धन्यवाद देने के लिए उसका अनुसरण करने लगा।
इस बीच राजा भी जंगल में शिकार करने आए थे। राजा ने सत्यक को घायल हिरण की सेवा करते देखा। राजा सत्यक की दया और सेवा भाव देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। राजा ने सत्यक से पूछा कि तुम कौन हो? सत्यक ने अपना परिचय दिया। राजा ने सत्यक की प्रशंसा की और उसे पुरस्कृत किया। इस प्रकार सत्य और सेवा के कारण सत्यक को सम्मान मिला। सत्य की विजय हुई।
इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सत्य बोलने से सदा विजय मिलती है। सत्यवादी व्यक्ति कभी निराश नहीं होता। दया और सेवा भी सत्य के समान ही महान गुण हैं। हमें सदा सत्य बोलना चाहिए, दूसरों की सहायता करनी चाहिए और घायल प्राणियों की सेवा करनी चाहिए। सत्य परम धर्म है और सत्य की ही विजय होती है।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | सत्यम् | सत्ये | सत्यानि |
| द्वितीया | सत्यम् | सत्ये | सत्यानि |
| तृतीया | सत्येन | सत्याभ्याम् | सत्यैः |
| चतुर्थी | सत्याय | सत्याभ्याम् | सत्येभ्यः |
| पंचमी | सत्यात् | सत्याभ्याम् | सत्येभ्यः |
| षष्ठी | सत्यस्य | सत्ययोः | सत्यानाम् |
| सप्तमी | सत्ये | सत्ययोः | सत्येषु |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| सत्यम् | सत्य | विजयः | जीत |
| सत्यवादी | सच बोलने वाला | बालकः | बालक |
| हरिणः | हिरण | घातः | घाव |
| सेवा | सेवा | दया | दया |
| करुणा | करुणा | राजा | राजा |
| पुरस्कारः | पुरस्कार | प्रशंसा | प्रशंसा |
| धर्मः | धर्म | आदरः | आदर |
| परम् | सर्वोत्तम | प्रसन्नः | प्रसन्न |
| सम्मानम् | सम्मान | स्वस्थः | स्वस्थ |
| अनुसरणम् | पीछे चलना | औषधम् | दवा |
| घटना | विवरण |
|---|---|
| सत्यक का स्वभाव | सदा सत्य बोलना |
| घायल हिरण | जंगल में मिला |
| सत्यक की सेवा | घाव पर औषधि, पानी |
| राजा का दर्शन | प्रसन्न होना |
| सत्यक को सम्मान | पुरस्कार प्राप्त |
| गुण | महत्व |
|---|---|
| सत्य | सत्य से सदा विजय |
| दया | दूसरों के प्रति करुणा |
| सेवा | सेवा से सम्मान |
| कर्तव्य | कभी झूठ न बोलना |
| धर्म | सत्य ही परम धर्म |
यह अध्याय 'सत्यस्य विजयः' हमें सत्य बोलने का महत्व सिखाता है। सत्यक नामक सत्यवादी बालक ने घायल हिरण की सेवा करके दया और करुणा का परिचय दिया। उसकी सत्यवादिता और सेवा भाव के कारण राजा ने उसे सम्मानित किया। इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सत्य की सदा विजय होती है। हमें सदा सत्य बोलना चाहिए, दूसरों की सहायता करनी चाहिए और प्राणियों के प्रति दया रखनी चाहिए। सत्य, दया और सेवा ही मनुष्य के सच्चे गुण हैं और सत्य ही परम धर्म है।