कक्षा दसवीं के संस्कृत पाठ्यक्रम (शेमुषी) का चौथा पाठ शिशुलालनम् है, जिसमें छोटे बालक की देखभाल और लालन-पालन के भावों का सुंदर वर्णन किया गया है। यह पाठ एक काव्यात्मक रचना है, जिसमें शिशु के मनोहारी रूप, उसकी मासूमियत और उसके पालन-पोषण में माँ-बाप की ममता का वर्णन है। पाठ में बताया गया है कि शिशु का लालन-पालन किस प्रकार किया जाना चाहिए। शिशु के साथ अत्यंत प्रेम, धैर्य और स्नेह से व्यवहार करना चाहिए। शिशु को कभी रुलाना नहीं चाहिए। शिशु जब रोता है तो उसे गोद में लेकर सुलाना चाहिए और उसे प्यार करना चाहिए। पाठ में शिशु की चेष्टाएँ, उसके बोलने की मासूम कोशिशें और उसकी हरकतों का बड़ा मनोरम वर्णन है। इस पाठ में बताया गया है कि शिशु के पालन-पोषण के लिए माँ-बाप का स्नेह सबसे आवश्यक है। शिशु माँ का रूप होता है, जो माँ के दिल में विराजमान रहता है। शिशु की मासूम हँसी देखकर सारा परिवार प्रसन्न हो जाता है। शिशु के दर्शन मात्र से ही अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार यह पाठ माँ-बाप के प्रेम और शिशु लालन के महत्व को दर्शाता है।
पाठ में शिशु के रूप का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है। शिशु के कपोल (गाल), नयन (आँखें), अधर (होंठ) आदि अत्यंत मनोहारी होते हैं। शिशु की मुस्कान देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें, मासूम चेहरा और कोमल अंग सभी को आकर्षित करते हैं। शिशु जब हँसता है तो लगता है मानो पूरा घर प्रसन्नता से भर गया हो। शिशु की मासूमियत किसी के भी मन को छू लेती है।
पाठ में बताया गया है कि शिशु के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। शिशु को स्नेह और प्रेम देना चाहिए। जब शिशु रोता है, तो उसे रुलाना नहीं चाहिए, वरन् उसे गोद में उठाकर प्यार करना चाहिए। शिशु को मारना-पीटना पाप के समान है। शिशु के साथ धैर्यपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। शिशु को उसकी इच्छा के अनुसार खिलौने देने चाहिए, ताकि उसका मन लगा रहे।
माँ-बाप का स्नेह ही शिशु के विकास का आधार है। शिशु के पालन-पोषण में माँ का योगदान सबसे महत्वपूर्ण होता है। माँ अपने शिशु को दूध पिलाती है, सुलाती है और उसकी रक्षा करती है। शिशु माँ के प्रेम के बिना अधूरा है। शिशु की पहली हँसी, पहला शब्द और पहला कदम माँ-बाप के लिए अमूल्य होते हैं। माँ-बाप अपने शिशु के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए उचित पोषण और प्यार आवश्यक है। शिशु को अच्छा भोजन, स्वच्छ वातावरण और प्रेमपूर्ण व्यवहार मिलना चाहिए। शिशु की शिक्षा की शुरुआत भी घर से ही होती है। शिशु के पालन-पोषण में जितना प्रेम होगा, बालक उतना ही अच्छा इंसान बनेगा। शिशु के पालन-पोषण को कभी भी उपेक्षित नहीं करना चाहिए।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | पुत्रः | पुत्रौ | पुत्राः |
| द्वितीया | पुत्रम् | पुत्रौ | पुत्रान् |
| तृतीया | पुत्रेण | पुत्राभ्याम् | पुत्रैः |
| चतुर्थी | पुत्राय | पुत्राभ्याम् | पुत्रेभ्यः |
| पंचमी | पुत्रात् | पुत्राभ्याम् | पुत्रेभ्यः |
| षष्ठी | पुत्रस्य | पुत्रयोः | पुत्राणाम् |
| सप्तमी | पुत्रे | पुत्रयोः | पुत्रेषु |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| शिशुः | छोटा बालक | लालनम् | पालन-पोषण |
| माता | माँ | पिता | पिता |
| स्नेहः | प्रेम | कपोलः | गाल |
| नयनम् | आँख | अधरः | होंठ |
| मुस्कानम् | मुस्कान | मासूमम् | मासूम |
| रुदनम् | रोना | हास्यम् | हँसी |
| आनन्दः | आनंद | पालनम् | पालन |
| पोषणम् | पोषण | बाल्यम् | बचपन |
| ममता | ममता | कोमलम् | कोमल |
| पुत्रः | पुत्र | धैर्यम् | धैर्य |
| करना चाहिए | नहीं करना चाहिए |
|---|---|
| शिशु को स्नेह देना | शिशु को मारना |
| रोने पर गोद में उठाना | शिशु को रुलाना |
| धैर्यपूर्वक व्यवहार | उपेक्षा करना |
| खिलौने देना | क्रोध करना |
| ममता और प्यार | अभिमान |
| अंग | विशेषता |
|---|---|
| कपोल (गाल) | मनोहारी |
| नयन (आँखें) | बड़ी और सुंदर |
| अधर (होंठ) | कोमल |
| मुस्कान | प्रसन्नता प्रदान करने वाली |
| रुदन | स्नेह की पुकार |
पाठ 'शिशुलालनम्' हमें बालक के पालन-पोषण का महत्व समझाता है। शिशु का रूप मनोहारी होता है और उसकी मासूमियत सबका मन जीत लेती है। शिशु के साथ प्रेम, धैर्य और स्नेह से व्यवहार करना चाहिए। शिशु को कभी रुलाना या मारना नहीं चाहिए। माँ-बाप की ममता ही शिशु के स्वस्थ विकास का आधार है। प्रेम और पोषण से पला बालक ही आगे चलकर एक अच्छा इंसान और नागरिक बनता है। शिशु का लालन-पालन ही एक सभ्य समाज की नींव है।