कक्षा दसवीं के संस्कृत पाठ्यक्रम (शेमुषी) का सातवाँ पाठ सूक्तयः है। 'सूक्ति' का अर्थ है उत्तम कथन या श्रेष्ठ वचन। यह पाठ भी 'सुभाषितानि' की तरह ही जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आधारित श्लोकों का संग्रह है। इस पाठ में मित्रता, श्रम, जीवन के उतार-चढ़ाव, संयम और परिश्रम जैसे विषयों पर प्रकाश डाला गया है। सूक्तियों के माध्यम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मित्र वही सच्चा है जो विपत्ति में काम आता है। जैसे लोहे पर चोट लगाने से ही सोने की परख होती है, वैसे ही संकट में ही मित्र की परख होती है। इस पाठ में बताया गया है कि आलसी व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता। परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। जीवन में कभी सुख तो कभी दुख आता है, पर हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए। यह पाठ विद्यार्थियों को जीवन के उतार-चढ़ाव को समझकर सदा प्रयत्नशील रहने की प्रेरणा देता है। 'सूक्ति' शब्द 'सु + उक्ति' से बना है, जिसका अर्थ है सुंदर कही गई बात।
पहली सूक्ति मित्र की परख के विषय में है। जिस प्रकार लोहे की कसौटी पर सोने को परखा जाता है, उसी प्रकार संकट के समय ही सच्चे मित्र की परख होती है। संकट में काम आने वाला ही सच्चा मित्र होता है। सुख के समय तो सब अपने होते हैं, पर दुख में जो साथ देता है, वही सच्चा मित्र है। इसलिए मित्र का चुनाव सावधानी से करना चाहिए।
दूसरी सूक्ति परिश्रम के महत्व को दर्शाती है। आलसी व्यक्ति का जीवन व्यर्थ होता है। जो व्यक्ति परिश्रम नहीं करता, वह कभी सफल नहीं होता। परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। प्रकृति भी परिश्रमियों की सहायता करती है। परिश्रम करने वाला व्यक्ति ही जीवन में आगे बढ़ता है। आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
तीसरी सूक्ति जीवन के उतार-चढ़ाव के विषय में है। जीवन में कभी सुख आता है तो कभी दुख। जैसे सूर्य भी सदा एक समान नहीं रहता और कभी उदय होता है, कभी अस्त, उसी प्रकार जीवन में भी परिवर्तन होते रहते हैं। इसलिए सुख में अहंकार नहीं करना चाहिए और दुख में निराश नहीं होना चाहिए। जीवन के उतार-चढ़ाव को समभाव से स्वीकारना चाहिए।
चौथी सूक्ति संयम और विद्वता के विषय में है। सच्चा विद्वान वही है जो अपनी विद्या का दुरुपयोग नहीं करता और संयमित जीवन जीता है। विद्या का उपयोग समाज के कल्याण के लिए होना चाहिए। संयम ही मनुष्य को महान बनाता है। अत्यधिक भोजन, वाणी और क्रोध से संयम रखना चाहिए। संयमी व्यक्ति ही सच्चे सुख की प्राप्ति करता है।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | सूक्तिः | सूक्ती | सूक्तयः |
| द्वितीया | सूक्तिम् | सूक्ती | सूक्तीः |
| तृतीया | सूक्त्या | सूक्तिभ्याम् | सूक्तिभिः |
| चतुर्थी | सूक्त्यै | सूक्तिभ्याम् | सूक्तिभ्यः |
| पंचमी | सूक्त्याः | सूक्तिभ्याम् | सूक्तिभ्यः |
| षष्ठी | सूक्त्याः | सूक्त्योः | सूक्तीनाम् |
| सप्तमी | सूक्त्याम् | सूक्त्योः | सूक्तिषु |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| सूक्तिः | उत्तम कथन | मित्रम् | मित्र |
| परिश्रमः | परिश्रम | आलस्यम् | आलस्य |
| कसौटी | परख | लोहम् | लोहा |
| संकटम् | संकट | सुखम् | सुख |
| दुःखम् | दुख | संयमः | संयम |
| विद्वान् | विद्वान | जीवनम् | जीवन |
| उदयः | उदय | अस्तः | अस्त |
| सूर्यः | सूर्य | समभावः | समभाव |
| प्रयत्नः | प्रयत्न | सफलता | सफलता |
| उक्तिः | कथन | श्रमः | श्रम |
| सूक्ति | विषय | मुख्य शिक्षा |
|---|---|---|
| पहली | मित्र | संकट में सच्चे मित्र की परख |
| दूसरी | परिश्रम | परिश्रम ही सफलता की कुंजी |
| तीसरी | उतार-चढ़ाव | सुख-दुख में समभाव रखना |
| चौथी | संयम | संयम से सच्चा सुख मिलता है |
| सच्चा मित्र | झूठा मित्र |
|---|---|
| संकट में साथ देता है | संकट में छोड़ देता है |
| सच बोलता है | चापलूसी करता है |
| कल्याण चाहता है | स्वार्थ देखता है |
| दुख बाँटता है | दुख में दूर रहता है |
| सदा भरोसेमंद | धोखा देता है |
पाठ 'सूक्तयः' जीवन के चार महत्वपूर्ण सिद्धांतों को प्रस्तुत करता है - सच्ची मित्रता, परिश्रम, जीवन के उतार-चढ़ाव में समभाव और संयम। ये सूक्तियाँ हमें सिखाती हैं कि संकट में साथ देने वाला ही सच्चा मित्र है, परिश्रम ही सफलता की कुंजी है, सुख-दुख में धैर्य रखना चाहिए और संयम से ही सच्चा सुख मिलता है। इन आदर्श सिद्धांतों को अपनाकर हम अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सकते हैं। सूक्तियाँ हमारे जीवन के स्थायी मार्गदर्शक हैं।