विस्तृत सिद्धांत, सूत्र, आरेख और स्मृति सहायक।
स्वतंत्र रूप से लटकाई गई चुंबक हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरती है।
चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field): चुंबक के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसमें उसके बल का प्रभाव महसूस किया जा सकता है। यह एक सदिश राशि (Vector quantity) है (इसमें दिशा और परिमाण दोनों होते हैं)।
चुंबकीय क्षेत्र को दिखाने के लिए खींची गई काल्पनिक रेखाएं। इनके गुण: 1. ये चुंबक के उत्तरी ध्रुव (N) से निकलती हैं और दक्षिणी ध्रुव (S) में प्रवेश करती हैं। (चुंबक के अंदर इनकी दिशा S से N की ओर होती है)। 2. ये बंद वक्र (Closed loops) बनाती हैं। 3. जहाँ रेखाएं पास-पास (घनी) होती हैं (जैसे ध्रुवों पर), वहाँ चुंबकीय क्षेत्र मजबूत होता है। 4. दो चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं कभी एक-दूसरे को नहीं काटतीं। (क्योंकि यदि वे काटेंगी, तो कटान बिंदु पर दिक्सूची (Compass) की सुई दो दिशाएं दिखाएगी, जो असंभव है)।
हंस क्रिश्चियन ओर्स्टेड (Hans Christian Oersted) ने 1820 में खोज की कि जब किसी चालक तार से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसके चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम (Right-Hand Thumb Rule): यदि आप अपने दाहिने हाथ से विद्युत धारावाही तार को इस प्रकार पकड़ें कि आपका अंगूठा विद्युत धारा की दिशा को दर्शाए, तो आपकी मुड़ी हुई उंगलियां चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा को दर्शाएंगी।
पास-पास लिपटे हुए विद्युतरोधी तांबे के तार की बेलन के आकार की अनेक फेरों वाली कुंडली को परिनालिका कहते हैं। - जब इसमें धारा प्रवाहित होती है, तो यह एक छड़ चुंबक (Bar Magnet) की तरह व्यवहार करती है। (एक सिरा N ध्रुव और दूसरा S ध्रुव बन जाता है)। - परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं समांतर और सीधी होती हैं, जिसका अर्थ है कि भीतर हर जगह चुंबकीय क्षेत्र समान होता है।
विद्युत चुंबक (Electromagnet): यदि परिनालिका के अंदर नरम लोहे (Soft Iron) की छड़ रख दी जाए, तो वह बहुत मजबूत चुंबक बन जाती है। इसे विद्युत चुंबक कहते हैं। (धारा बंद करते ही इसका चुंबकत्व समाप्त हो जाता है)।
आंद्रे-मैरी ऐम्पियर ने बताया कि यदि धारावाही तार चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है, तो चुंबक को भी तार पर समान और विपरीत बल लगाना चाहिए। - जब किसी धारावाही चालक (तार) को चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो उस पर एक यांत्रिक बल लगता है। - बल की दिशा धारा की दिशा और चुंबकीय क्षेत्र की दिशा दोनों पर निर्भर करती है। - यह बल सबसे अधिक तब होता है जब धारा की दिशा चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत ($90^\circ$) हो।
इस नियम का उपयोग चालक पर लगने वाले बल की दिशा ज्ञात करने के लिए किया जाता है। - अपने बाएं हाथ के अंगूठे, तर्जनी (Forefinger) और मध्यमा (Middle finger) को इस प्रकार फैलाएं कि तीनों एक-दूसरे के लंबवत हों। - यदि तर्जनी $\rightarrow$ चुंबकीय क्षेत्र (B) की दिशा में हो, - और मध्यमा $\rightarrow$ विद्युत धारा (I) की दिशा में हो, - तो अंगूठा $\rightarrow$ चालक पर लगने वाले बल (Force/Motion) की दिशा बताएगा। (याद रखने का तरीका: FBI - Force, Magnetic Field, Current)
विद्युत मोटर एक ऐसी युक्ति है जो विद्युत ऊर्जा (Electric Energy) को यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical Energy) में बदलती है। - सिद्धांत: जब किसी आयताकार कुंडली (Coil) को चुंबकीय क्षेत्र में रखकर उसमें धारा प्रवाहित की जाती है, तो कुंडली पर एक बल आघूर्ण (Torque) कार्य करता है, जो उसे लगातार घुमाता है। (यह फ्लेमिंग के बाएं हाथ के नियम पर आधारित है)। - मुख्य भाग: 1. आर्मेचर (Armature): नरम लोहे की क्रोड पर लिपटी तांबे के तार की कुंडली (ABCD)। 2. प्रबल चुंबक: कुंडली को एक मजबूत चुंबकीय क्षेत्र (N और S) के बीच रखा जाता है। 3. विभक्त वलय / दिक्परिवर्तक (Split rings / Commutator): ये दो अर्धवृत्ताकार पीतल के छल्ले होते हैं, जो हर आधे चक्कर के बाद कुंडली में धारा की दिशा को पलट देते हैं, जिससे कुंडली एक ही दिशा में घूमती रहती है। 4. कार्बन ब्रश (Brushes): ये विभक्त वलयों को स्पर्श करते हैं और बैटरी से धारा को कुंडली तक पहुँचाते हैं। - उपयोग: पंखे, वाशिंग मशीन, मिक्सर, कंप्यूटर के पंखे आदि।
1831 में माइकल फैराडे (Michael Faraday) ने खोज की कि बदलते हुए चुंबकीय क्षेत्र से विद्युत धारा उत्पन्न की जा सकती है। - जब किसी बंद कुंडली और चुंबक के बीच सापेक्ष गति (Relative motion) होती है (यानी या तो चुंबक हिले या कुंडली), तो कुंडली में एक विद्युत वाहक बल (Voltage) उत्पन्न हो जाता है और उसमें धारा बहने लगती है। इस घटना को विद्युत चुम्बकीय प्रेरण कहते हैं। - इस प्रकार उत्पन्न धारा को प्रेरित धारा (Induced Current) कहते हैं। - गैल्वेनोमीटर (Galvanometer) एक ऐसा उपकरण है जो परिपथ में धारा की उपस्थिति और उसकी दिशा को मापता है।
इस नियम का उपयोग प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात करने के लिए किया जाता है। - दाएं हाथ के अंगूठे, तर्जनी और मध्यमा को लंबवत फैलाएं। - यदि अंगूठा $\rightarrow$ चालक की गति (Motion) की दिशा में हो, - और तर्जनी $\rightarrow$ चुंबकीय क्षेत्र (Field) की दिशा में हो, - तो मध्यमा $\rightarrow$ प्रेरित विद्युत धारा (Induced Current) की दिशा बताएगी।
विद्युत जनित्र एक ऐसी युक्ति है जो यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical Energy) को विद्युत ऊर्जा (Electric Energy) में बदलती है। - सिद्धांत: यह विद्युत चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) पर आधारित है। जब कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है, तो चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं कटती हैं और प्रेरित धारा उत्पन्न होती है। - जनित्र दो प्रकार की धारा उत्पन्न कर सकते हैं: 1. प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current - AC): वह धारा जो समान समय अंतराल के बाद अपनी दिशा बदल लेती है। (हमारे घरों में 220V, 50Hz की AC आती है, जो हर 1/100 सेकंड में दिशा बदलती है)। AC को लंबी दूरी तक बिना ज्यादा ऊर्जा हानि के भेजा जा सकता है। 2. दिष्ट धारा (Direct Current - DC): वह धारा जो हमेशा एक ही दिशा में बहती है (जैसे बैटरी से मिलने वाली धारा)।
हमारे घरों में बिजली के खंभे से तीन प्रकार के तार आते हैं: 1. विद्युन्मय तार (Live Wire): यह लाल रंग के आवरण वाला तार होता है। इसमें 220V का विभव होता है (यही करंट लाता है)। 2. उदासीन तार (Neutral Wire): यह काले रंग का होता है। इसका विभव 0V होता है। 3. भूसंपर्क तार (Earth Wire): यह हरे रंग का होता है। - अर्थिंग का महत्व: इसे उपकरणों (जैसे प्रेस, फ्रिज) की बाहरी धातु की बॉडी से जोड़ा जाता है। यदि लाइव तार बॉडी से छू जाए, तो करंट अर्थ वायर से होते हुए जमीन में चला जाता है और उपयोगकर्ता को भयानक झटका नहीं लगता।
graph TD
A[चुंबक और चुंबकीय क्षेत्र] --> B(विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव)
A --> C(विद्युत चुम्बकीय प्रेरण)
A --> D(घरेलू परिपथ)
B --> B1(सीधा तार - वृत्ताकार क्षेत्र - दाएं हाथ का अंगूठा नियम)
B --> B2(परिनालिका - छड़ चुंबक जैसी)
B --> B3(विद्युत मोटर - फ्लेमिंग का बाएं हाथ का नियम)
B3 --> B3a(विद्युत ऊर्जा -> यांत्रिक ऊर्जा)
C --> C1(माइकल फैराडे - सापेक्ष गति से धारा)
C --> C2(विद्युत जनित्र - फ्लेमिंग का दाएं हाथ का नियम)
C2 --> C2a(यांत्रिक ऊर्जा -> विद्युत ऊर्जा)
D --> D1(लाइव - लाल, न्यूट्रल - काला, अर्थ - हरा)
D --> D2(फ्यूज - लघुपथन और अतिभारण से सुरक्षा)