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1. परिचय

पर्यावरण वह सम्पूर्ण वातावरण है जो हमें घेरे हुए है और जिसमें जीवित जीव अपनी सम्पूर्ण क्रियाओं को सम्पन्न करते हैं। इसमें वायु, जल, मृदा, सूर्य का प्रकाश, तापमान, आर्द्रता जैसे भौतिक घटक तथा पौधे, जन्तु, सूक्ष्मजीव जैसे जैविक घटक शामिल होते हैं। प्रत्येक जीव अपने पर्यावरण से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ा होता है, क्योंकि उसे भोजन की आवश्यकता, श्वसन, उत्सर्जन तथा प्रजनन जैसी सभी जैविक प्रक्रियाओं के लिए पर्यावरणीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। हमारे आस-पास के सभी जीव-जन्तु, पेड़-पौधे और उनके बीच के सम्बन्ध मिलकर जीवन का एक जटिल जाल बनाते हैं। पर्यावरण की सुरक्षा के बिना पृथ्वी पर जीवन की निरन्तरता असम्भव है।

पर्यावरण का अध्ययन करने से हमें यह ज्ञान होता है कि ऊर्जा और पदार्थ विभिन्न जीवों के बीच किस प्रकार आदान-प्रदान होते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र में प्रत्येक जीव अपनी निश्चित भूमिका निभाता है - कुछ जीव भोजन बनाते हैं, कुछ भोजन खाते हैं और कुछ मृत जीवों के अपघटन में सहायता करते हैं। यही कारण है कि प्रकृति में पदार्थों का पुनर्चक्रण निरन्तर चलता रहता है। इस अध्याय में हम पारिस्थितिकी तंत्र, खाद्य श्रृंखला, खाद्य जाल, ऊर्जा प्रवाह, दस प्रतिशत नियम, जैव आवर्धन, ओजोन परत का क्षरण तथा अपशिष्ट प्रबंधन के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे, ताकि हम अपने पर्यावरण की रक्षा के प्रति जागरूक हो सकें।

2. पारिस्थितिकी तंत्र

पारिस्थितिकी तंत्र एक प्राकृतिक इकाई है जिसमें सभी जीवधारी (जैविक घटक) तथा उनका भौतिक पर्यावरण (अजैविक घटक) आपस में अन्तर्क्रिया करते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र के प्रत्येक घटक एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र के घटक:

  1. अजैविक घटक: ये निर्जीव घटक होते हैं, जैसे वायु, जल, मृदा, सूर्य का प्रकाश, तापमान, आर्द्रता, वर्षा और खनिज लवण।
  2. जैविक घटक: ये जीवित घटक होते हैं, जिन्हें भोजन प्राप्ति की विधि के आधार पर तीन श्रेणियों में बाँटा गया है: - उत्पादक: हरे पौधे तथा कुछ जीवाणु जो सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। ये खाद्य श्रृंखला की पहली कड़ी होते हैं। - उपभोक्ता: वे जीव जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते। प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी), द्वितीयक उपभोक्ता (मांसाहारी) तथा तृतीयक उपभोक्ता (सर्वोच्च परभक्षी) इनमें शामिल हैं। - अपघटक: जीवाणु, कवक तथा केंचुआ जैसे जीव मृत जीवों तथा उनके अपशिष्ट पदार्थों का विघटन करके सरल पदार्थों में बदल देते हैं, जो पुनः मृदा में मिल जाते हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं - स्थलीय (वन, घास के मैदान, रेगिस्तान) तथा जलीय (तालाब, नदी, झील, समुद्र)। सभी पारिस्थितिकी तंत्र मिलकर पृथ्वी के बायोम बनाते हैं।

3. खाद्य श्रृंखला एवं खाद्य जाल

खाद्य श्रृंखला एक सीधी श्रृंखला है जिसमें एक जीव का उपभोग दूसरा जीव करता है, जैसे घास → हिरण → शेर। यहाँ घास उत्पादक, हिरण प्राथमिक उपभोक्ता तथा शेर द्वितीयक उपभोक्ता है। खाद्य श्रृंखला में प्रत्येक स्तर को पोषण स्तर (Trophic Level) कहते हैं। खाद्य श्रृंखला सदैव उत्पादक से प्रारम्भ होती है तथा शीर्ष परभक्षी (Apex Predator) पर समाप्त होती है।

खाद्य जाल एक-दूसरे से जुड़ी हुई अनेक खाद्य श्रृंखलाओं का जाल होता है, जिसमें एक ही जीव अनेक श्रृंखलाओं का भाग हो सकता है। खाद्य जाल वास्तविक प्रकृति को अधिक सटीक रूप से प्रदर्शित करता है तथा पारिस्थितिकी तंत्र को स्थायित्व प्रदान करता है, क्योंकि यदि एक जीव की संख्या घट जाए तो जाल में अन्य विकल्प उपलब्ध होते हैं।

4. ऊर्जा का प्रवाह एवं दस प्रतिशत नियम

सूर्य ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश को प्रकाश-संश्लेषण द्वारा रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं, जो खाद्य श्रृंखला के माध्यम से एक जीव से दूसरे जीव में स्थानान्तरित होती है। ऊर्जा का यह प्रवाह हमेशा एक दिशा में (उत्पादक से उपभोक्ता की ओर) होता है।

दस प्रतिशत नियम: लिंडमैन द्वारा प्रतिपादित इस नियम के अनुसार, जब ऊर्जा एक पोषण स्तर से अगले पोषण स्तर में स्थानान्तरित होती है तो उसका केवल लगभग 10% भाग ही अगले स्तर तक पहुँचता है। शेष 90% ऊर्जा श्वसन, पाचन, गति, ऊष्मा तथा विभिन्न जैविक क्रियाओं में व्यय हो जाती है। इसी कारण खाद्य श्रृंखला में सामान्यतः तीन से चार से अधिक पोषण स्तर नहीं होते, क्योंकि ऊर्जा की उपलब्धता अत्यन्त कम हो जाती है। यही कारण है कि सर्वोच्च परभक्षियों की संख्या सबसे कम होती है।

5. जैव आवर्धन (Biomagnification)

जब हानिकारक रसायन (जैसे कीटनाशक, DDT, पारा यौगिक) वातावरण में पहुँचते हैं, तो वे जल, मृदा तथा वायु में घुलकर उत्पादकों द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं। इन रसायनों की सान्द्रता खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक पोषण स्तर पर बढ़ती जाती है। किसी जीव में विषैले रसायनों की सान्द्रता का पोषण स्तर दर पोषण स्तर निरन्तर बढ़ता जाना जैव आवर्धन कहलाता है।

जैव आवर्धन का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण DDT है। सर्वोच्च पोषण स्तर के परभक्षियों (जैसे चील, बाज) के शरीर में इसकी सान्द्रता सबसे अधिक पाई गई, जिसके कारण इनके अण्डों के छिलके पतले हो गए और इनकी आबादी में तीव्र गिरावट आई। जैव आवर्धन का सबसे खतरनाक प्रभाव शीर्ष परभक्षियों पर पड़ता है।

6. ओजोन परत एवं उसका क्षरण

ओजोन (O₃) वायुमण्डल की ऊपरी सतह (समताप मण्डल) में पाई जाने वाली गैस है। ओजोन परत पृथ्वी के चारों ओर सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती है तथा सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को अवशोषित कर लेती है। यदि यह परत न हो तो UV किरणें पृथ्वी पर सीधे पहुँचकर त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद, प्रतिरक्षा प्रणाली की क्षति तथा फसलों की उत्पादकता में कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न कर दें।

ओजोन परत का क्षरण मुख्यतः क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) गैसों के कारण होता है, जिनका उपयोग प्रशीतक (फ्रिज, एयर कंडीशनर) तथा फोम बनाने में होता था। CFC गैसें ऊपर जाकर UV किरणों की उपस्थिति में क्लोरीन मुक्त करती हैं, जो ओजोन अणुओं को तोड़ देती हैं। एक क्लोरीन परमाणु हजारों ओजोन अणुओं को नष्ट कर सकता है। सन् 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल द्वारा CFC के उत्पादन को चरणबद्ध रूप से प्रतिबन्धित करने का निर्णय लिया गया।

7. अपशिष्ट प्रबंधन

हमारी दैनिक गतिविधियों से उत्पन्न कचरे का समुचित निपटान अपशिष्ट प्रबंधन कहलाता है। अपशिष्ट दो प्रकार के होते हैं:

  1. जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट: वे पदार्थ जिन्हें अपघटक (जीवाणु और कवक) सरल पदार्थों में विघटित कर सकते हैं, जैसे रसोई के बचे भोजन, सब्जियों के छिलके, कागज, गोबर। इन्हें कम्पोस्ट बनाकर कृषि में उपयोग किया जा सकता है।
  2. अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट: वे पदार्थ जिनका विघटन प्राकृतिक रूप से नहीं हो पाता या बहुत धीमी गति से होता है, जैसे प्लास्टिक, पॉलीथिन, काँच, धातु, रबर। ये सैकड़ों वर्षों तक मृदा में जमा रहते हैं।

अपशिष्ट प्रबंधन के उपाय - 3R सिद्धांत: Reduce (कम करना), Reuse (पुनः उपयोग) तथा Recycle (पुनर्चक्रण)। इसके अतिरिक्त भू-भरण, भस्मीकरण तथा खाद बनाना भी निपटान की विधियाँ हैं। हमें गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग कूड़ेदानों में डालने की आदत डालनी चाहिए।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: पारिस्थितिकी तंत्र के घटक

घटक प्रकार उदाहरण भूमिका
अजैविक घटक निर्जीव जल, वायु, मृदा, प्रकाश जीवों को आधार प्रदान करते हैं
उत्पादक जैविक हरे पौधे प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन
उपभोक्ता जैविक शाकाहारी, मांसाहारी भोजन का उपभोग
अपघटक जैविक जीवाणु, कवक मृत जीवों का विघटन

तालिका 2: जैव एवं अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ

विशेषता जैव निम्नीकरणीय अजैव निम्नीकरणीय
विघटन अपघटकों द्वारा नहीं होता
उदाहरण भोजन, कागज, गोबर प्लास्टिक, काँच, धातु
निपटान कम्पोस्ट पुनर्चक्रण

माइंड मैप

graph TD A["हमारा पर्यावरण"] --> B["पारिस्थितिकी तंत्र"] A --> C["खाद्य श्रृंखला एवं जाल"] A --> D["ऊर्जा प्रवाह"] A --> E["ओजोन परत"] A --> F["अपशिष्ट प्रबंधन"] B --> B1["जैविक घटक"] B --> B2["अजैविक घटक"] B1 --> B1a["उत्पादक, उपभोक्ता, अपघटक"] D --> D1["10% नियम - लिंडमैन"] E --> E1["CFC से क्षरण"] E --> E2["मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल 1987"] F --> F1["3R - Reduce, Reuse, Recycle"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह

खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा प्रवाह (दस प्रतिशत नियम) उत्पादक घास 1000 इकाई 10% प्राथमिक उपभोक्ता हिरण, 100 इकाई 10% द्वितीयक उपभोक्ता शेर, 10 इकाई ऊर्जा प्रत्येक स्तर पर 90% घटती है श्वसन, उत्सर्जन, गति और ऊष्मा में व्यय स्वर्ण नियम एक पोषण स्तर से अगले तक केवल 10% ऊर्जा पहुँचती है

आरेख 2: ओजोन परत का क्षरण

ओजोन परत क्षरण का कारण सूर्य UV किरणें समताप मण्डल में ओजोन परत (O3) UV किरणों का अवशोषण CFC गैसें CFC + UV किरणें क्लोरीन मुक्त होकर O3 को तोड़ती हैं एक Cl परमाणु हजारों O3 नष्ट करता है मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) द्वारा CFC पर प्रतिबन्ध Golden Rule ओजोन परत UV किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है

सामान्य गलतियाँ

  1. छात्र उत्पादकों को सदैव शाकाहारी जीव मान लेते हैं, जबकि उत्पादक सदैव हरे पौधे होते हैं।
  2. अपघटकों (जीवाणु, कवक) को उपभोक्ता की श्रेणी में रख दिया जाता है, जबकि अपघटक पोषण का तीसरा अलग वर्ग है।
  3. ऊर्जा प्रवाह की दिशा में गलती होती है; ऊर्जा सदैव एक दिशा में (उत्पादक से उपभोक्ता की ओर) जाती है।
  4. दस प्रतिशत नियम में छात्र 90% ऊर्जा अगले स्तर तक पहुँचती है लिख देते हैं; वास्तव में केवल 10% पहुँचती है।
  5. ओजोन क्षरण में CO₂ को मुख्य कारण बता दिया जाता है; वास्तविक कारण CFC गैसें हैं।
  6. जैव आवर्धन में विष की सान्द्रता पोषण स्तर पर घटती है लिखा जाता है; वास्तव में यह निरन्तर बढ़ती है।
  7. प्लास्टिक को जैव निम्नीकरणीय मान लिया जाता है; प्लास्टिक अजैव निम्नीकरणीय है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. पारिस्थितिकी तंत्र के जैविक घटकों को उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक में वर्गीकृत करने के उदाहरण याद रखें।
  2. खाद्य श्रृंखला (घास → हिरण → शेर) तथा प्रत्येक पोषण स्तर का नाम लिखने का अभ्यास करें।
  3. दस प्रतिशत नियम में लिंडमैन का नाम तथा संख्यात्मक तथ्य (10% पहुँचती है) लिखें।
  4. ओजोन क्षरण के प्रश्न में CFC का पूरा नाम (क्लोरोफ्लोरोकार्बन) तथा मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल वर्ष 1987 लिखें।
  5. अपशिष्ट प्रबंधन के प्रश्न में 3R सिद्धांत का उदाहरण सहित उल्लेख करें।
  6. जैव आर्धन का DDT वाला उदाहरण लिखें, यह परीक्षा में बहुत पूछा जाता है।
  7. अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट के चार उदाहरण (प्लास्टिक, काँच, धातु, रबर) याद रखें।
  8. चित्रात्मक प्रश्नों के लिए खाद्य श्रृंखला तथा ओजोन क्षरण के आरेख बनाने का अभ्यास करें।

निष्कर्ष

पर्यावरण पृथ्वी पर सम्पूर्ण जीवन का आधार है। पारिस्थितिकी तंत्र के जैविक और अजैविक घटक आपस में गहरे सम्बन्ध में बँधे हैं, और ऊर्जा तथा पदार्थ का प्रवाह इन सबको जोड़ता है। दस प्रतिशत नियम के कारण खाद्य श्रृंखला की लम्बाई सीमित रहती है, जबकि जैव आवर्धन हानिकारक रसायनों के संचयन को दर्शाता है। ओजोन परत का क्षरण मानवीय गतिविधियों का दुष्परिणाम है, जिससे बचाव के लिए CFC पर प्रतिबन्ध आवश्यक है। अपशिष्ट प्रबंधन के माध्यम से हम पर्यावरण को स्वच्छ रख सकते हैं। हमें 3R सिद्धांत का पालन करना चाहिए और पर्यावरण संरक्षण को अपनी दैनिक आदतों का अंग बनाना चाहिए, क्योंकि एक सुरक्षित पर्यावरण ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सुनिश्चित भविष्य है।