प्राकृतिक संसाधन वे पदार्थ और ऊर्जाएँ हैं जो प्रकृति में उपलब्ध होती हैं और जिनका उपयोग मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करता है। जल, वायु, मृदा, वन, वन्य जीव, खनिज, कोयला, पेट्रोलियम और सौर ऊर्जा ये सभी प्राकृतिक संसाधन हैं। पृथ्वी पर उपलब्ध ये संसाधन सीमित हैं, किन्तु मानव की लालच और अनियोजित विकास के कारण इनका दोहन तीव्र गति से हो रहा है। वनों की कटाई, जल प्रदूषण, मृदा क्षरण, जैव विविधता की हानि और प्रदूषण जैसी समस्याएँ इसी अनियंत्रित दोहन का परिणाम हैं।
प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण प्रबंधन अत्यन्त आवश्यक है, ताकि वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएँ पूरी हो सकें और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी ये संसाधन सुरक्षित रह सकें। इसी अवधारणा को सतत विकास (Sustainable Development) कहते हैं। यह अध्याय प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के सिद्धांतों, विधियों और उनके महत्व पर केन्द्रित है। हम जल संसाधन प्रबंधन, वन और वन्य जीव संरक्षण, सतत विकास तथा जैव विविधता के संरक्षण का विस्तार से अध्ययन करेंगे, ताकि हम अपने संसाधनों के प्रति जागरूक बन सकें।
प्राकृतिक संसाधनों को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:
प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण प्रबंधन तीन सिद्धांतों पर आधारित है - सोचना वैश्विक स्तर पर, कार्य करना स्थानीय स्तर पर (Think globally, act locally); सभी जीवों के अधिकारों का सम्मान करना; तथा मानव और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करना।
जल पृथ्वी पर जीवन के लिए सर्वाधिक आवश्यक संसाधन है। पृथ्वी पर उपलब्ध जल का केवल 2.5% मीठा जल है, और उसमें भी अधिकांश हिमनदों तथा भूमिगत जल में बँधा है। बढ़ती जनसंख्या, कृषि, उद्योग और शहरीकरण के कारण जल की माँग निरन्तर बढ़ रही है, जबकि प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण इसकी उपलब्धता घट रही है।
वर्षा जल संचयन: वर्षा के जल को बहने देने के स्थान पर उसे एकत्र करके भूमिगत जल स्तर में पुनर्भरण (Recharge) की विधि को वर्षा जल संचयन कहते हैं। छतों से वर्षा का जल पाइपों द्वारा भूमि के गड्ढों या टैंकों में पहुँचाया जाता है। इससे भूमिगत जल स्तर ऊपर उठता है। राजस्थान में प्राचीन समय से बावड़ियाँ (Stepwells) और टाँका (Tankas) जैसी संरचनाओं से वर्षा जल संचयन किया जाता था।
जल शेड प्रबंधन: किसी क्षेत्र में वर्षा के जल को संरक्षित करने, उसका कुशल उपयोग करने तथा मृदा क्षरण रोकने की योजनाबद्ध विधि को जल शेड प्रबंधन कहते हैं। इसमें छोटे बाँध, जल संग्रहण गड्ढे और वृक्षारोपण शामिल हैं। वर्षा जल संचयन का प्रसिद्ध उदाहरण राजस्थान के अलवर जिले का तारुण भारत संघ (Tarun Bharat Sangh) है, जिसने गाँवों में तालाबों का पुनर्निर्माण कर भूमिगत जल स्तर को ऊपर उठाया।
वन और वन्य जीव हमारी प्राकृतिक धरोहर हैं। वन हमें लकड़ी, औषधियाँ, स्वच्छ वायु और जल देते हैं, मृदा क्षरण रोकते हैं तथा जलवायु को नियन्त्रित करते हैं। वनों की कटाई, शिकार, आवास विनाश और व्यापारिक दोहन के कारण अनेक प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं।
जैव विविधता: किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली जीवों की विभिन्न प्रजातियों की सम्पूर्ण विविधता को जैव विविधता कहते हैं। यह तीन स्तरों पर होती है - आनुवंशिक विविधता, प्रजातीय विविधता और पारिस्थितिकीय विविधता। उच्च जैव विविधता वाला पारिस्थितिकी तंत्र अधिक स्थिर और स्वस्थ होता है।
वन्य जीव संरक्षण के उपाय:
चिपको आंदोलन: 1973 में उत्तराखंड में सुन्दरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में चला चिपको आंदोलन वन संरक्षण का विश्व प्रसिद्ध उदाहरण है, जिसमें ग्रामीण महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उन्हें काटे जाने से रोका।
सतत विकास विकास की वह अवधारणा है जो भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करती है। यह परिभाषा 1987 में ब्रंटलैंड आयोग ने दी थी। सतत विकास के तीन स्तंभ हैं - आर्थिक विकास, सामाजिक समानता और पर्यावरणीय संरक्षण।
सतत विकास के उपाय:
खनिज (जैसे लोहा, ताँबा, बॉक्साइट, कोयला) अनवीकरणीय संसाधन हैं। खनिज संरक्षण के लिए हमें उनका विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए, पुनर्चक्रण (Recycling) को बढ़ावा देना चाहिए और खनिजों से बनी वस्तुओं का पुनः उपयोग (Reuse) करना चाहिए। अनियोजित खनन से मृदा क्षरण और प्रदूषण होता है, अतः पर्यावरण के अनुकूल खनन तकनीकों को अपनाना आवश्यक है।
गंगा एक्शन प्लान (1985): गंगा नदी में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए भारत सरकार ने 1985 में गंगा एक्शन प्लान प्रारम्भ किया। इसका उद्देश्य नदी में मिलने वाले सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट को शोधित करना तथा नदी के जल की गुणवत्ता में सुधार करना था।
जैव मण्डल आरक्षित क्षेत्र: ये बड़े क्षेत्र होते हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र, वन्य जीवों और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा के लिए घोषित किए जाते हैं। इनमें तीन क्षेत्र होते हैं - मुख्य क्षेत्र (Core), बफर क्षेत्र (Buffer) और संक्रमण क्षेत्र (Transition)। भारत में 18 से अधिक जैव मण्डल आरक्षित क्षेत्र हैं, जिनमें नीलगिरि और सुंदरवन प्रमुख हैं।
घरेलू एवं औद्योगिक कचरे का अनुचित निपटान पर्यावरण प्रदूषण का बड़ा कारण है। संसाधन संरक्षण के लिए हमें अपने कचरे को कम करना चाहिए। पुरानी वस्तुओं (जैसे कागज, काँच, प्लास्टिक) का पुनर्चक्रण करने से नई वस्तुएँ बनाने में लगने वाली ऊर्जा और कच्चे माल की बचत होती है। उदाहरण के लिए, एक टन कागज के पुनर्चक्रण से 17 पेड़ों की कटाई बचाई जा सकती है। इस प्रकार प्रत्येक नागरिक के छोटे-छोटे प्रयास मिलकर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में बड़ा योगदान देते हैं।
| आधार | नवीकरणीय संसाधन | अनवीकरणीय संसाधन |
|---|---|---|
| पुनः उत्पन्न होना | हाँ | नहीं |
| उदाहरण | जल, वायु, वन, सौर ऊर्जा | कोयला, पेट्रोलियम, खनिज |
| समाप्त होने का खतरा | कम | अधिक |
| पर्यावरणीय प्रभाव | कम प्रदूषण | अधिक प्रदूषण |
| संरक्षण विधि | विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| राष्ट्रीय उद्यान | पूर्ण संरक्षण | जिम कॉर्बेट, काजीरंगा |
| अभ्यारण्य | वन्य जीवों की सुरक्षा | पेरियार अभ्यारण्य |
| जैव मण्डल आरक्षित क्षेत्र | Core, Buffer, Transition | नीलगिरि, सुंदरवन |
| परियोजना टाइगर (1973) | बाघों का संरक्षण | टाइगर रिजर्व |
| विधि | कार्य | लाभ |
|---|---|---|
| वर्षा जल संचयन | जल एकत्र कर भूमिगत भरना | जल स्तर में वृद्धि |
| जल शेड प्रबंधन | योजनाबद्ध जल उपयोग | मृदा क्षरण रोकना |
| बाँध | जल संग्रहण | सिंचाई और विद्युत |
प्राकृतिक संसाधन पृथ्वी पर जीवन का आधार हैं, किन्तु अनियोजित दोहन के कारण इन पर गम्भीर संकट मंडरा रहा है। जल, वन, वन्य जीव और खनिज जैसे संसाधनों के विवेकपूर्ण प्रबंधन से ही इन्हें भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। वर्षा जल संचयन, जल शेड प्रबंधन, वन्य जीव अभ्यारण्य, जैव मण्डल आरक्षित क्षेत्र और सतत विकास की अवधारणाएँ संसाधन प्रबंधन के प्रमुख साधन हैं। प्रत्येक नागरिक को अपने स्तर पर संसाधनों के संरक्षण में योगदान देना चाहिए - जल की बचत करके, वृक्ष लगाकर, कचरे का पुनर्चक्रण करके और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनकर। प्रकृति के साथ सामंजस्य में रहकर विकास करना ही सच्चे सतत विकास का मार्ग है।