विस्तृत सिद्धांत, सूत्र, आरेख और स्मृति सहायक।
जनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपने ही जैसी नई संततियों (Offsprings) को जन्म देते हैं। - महत्व: यह पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता को बनाए रखने और प्रजातियों (Species) को विलुप्त होने से बचाने के लिए आवश्यक है। - डीएनए प्रतिकृति (DNA Replication): जनन की मूल घटना DNA (Deoxyribonucleic acid) की प्रतिकृति (copy) बनाना है। DNA में पैतृक गुणों की जानकारी होती है जो माता-पिता से संतति में जाती है। DNA प्रतिकृति के दौरान होने वाली सूक्ष्म त्रुटियों के कारण ही विभिन्नताएं (Variations) उत्पन्न होती हैं, जो जैव विकास (Evolution) का आधार हैं।
जनन मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है:
इसमें केवल एक ही जनक (Single parent) भाग लेता है। इसमें युग्मक (Gametes) नहीं बनते हैं और उत्पन्न संतति अपने जनक के बिल्कुल समान होती है। इसके मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं:
इसमें दो जनक (नर और मादा) भाग लेते हैं। इसमें नर युग्मक (Sperm) और मादा युग्मक (Egg/Ovum) का संलयन (Fusion) होता है। इसके परिणामस्वरूप विभिन्नताएं अधिक होती हैं।
फूल पौधे का जनन अंग है। फूल के मुख्य भाग: - बाह्यदल (Sepals): कली की रक्षा करते हैं (हरे रंग के)। - दल (Petals): कीटों को आकर्षित करते हैं (रंगीन)। - पुंकेसर (Stamen): नर जनन अंग। इसके दो भाग होते हैं - तंतु और परागकोश (Anther)। परागकोश में परागकण (Pollen grains) बनते हैं। - स्त्रीकेसर (Carpel / Pistil): मादा जनन अंग। इसके तीन भाग होते हैं - वर्तिकाग्र (Stigma), वर्तिका (Style) और अंडाशय (Ovary)। अंडाशय के अंदर बीजांड (Ovule) होते हैं जिनमें मादा युग्मक (अंड कोशिका) होता है।
परागण और निषेचन (Pollination and Fertilization): 1. परागण (Pollination): परागकणों का परागकोश से वर्तिकाग्र (Stigma) तक पहुँचना। (यह हवा, जल या कीटों द्वारा होता है)। - स्व-परागण (Self-pollination): उसी फूल के वर्तिकाग्र पर। - पर-परागण (Cross-pollination): दूसरे फूल के वर्तिकाग्र पर। 2. निषेचन (Fertilization): वर्तिकाग्र पर परागकण अंकुरित होकर पराग नलिका बनाता है जो अंडाशय तक पहुँचती है। नर युग्मक और मादा युग्मक (अंड) के संलयन को निषेचन कहते हैं, जिससे युग्मनज (Zygote) बनता है। 3. बीज निर्माण: निषेचन के बाद, बीजांड (Ovule) से बीज (Seed) बनता है और अंडाशय (Ovary) फल (Fruit) में बदल जाता है।
मानव में यौवनारंभ (Puberty) के दौरान शरीर में हॉर्मोनल परिवर्तन होते हैं (नर में टेस्टोस्टेरोन और मादा में एस्ट्रोजन), जिससे जनन अंग परिपक्व होते हैं।
यदि अंड का निषेचन नहीं होता है: गर्भाशय हर महीने भ्रूण को ग्रहण करने के लिए अपनी भित्ति को मोटा और रक्त से समृद्ध बनाता है। यदि निषेचन नहीं होता है, तो इस परत की आवश्यकता नहीं रहती। अतः यह परत टूटकर रक्त और श्लेष्मा (mucus) के रूप में योनि मार्ग से बाहर निकलती है। यह चक्र हर महीने होता है, जिसे मासिक धर्म (Menstruation) कहते हैं।
जनन स्वास्थ्य का अर्थ है जनन के सभी पहलुओं (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक) में स्वस्थ होना।
यौन संचारित रोग (Sexually Transmitted Diseases - STD): - जीवाणु (Bacterial): गोनोरिया, सिफलिस। - विषाणु (Viral): मस्सा (Warts), एचआईवी-एड्स (HIV-AIDS)।
गर्भनिरोधक की विधियां (Methods of Contraception): अवांछित गर्भधारण को रोकने के उपाय: 1. यांत्रिक अवरोध (Mechanical Barrier): कंडोम का उपयोग (यह HIV/STD से भी बचाता है)। 2. रासायनिक विधियां (Chemical Methods): गर्भनिरोधक गोलियां (Pills), जो हॉर्मोन संतुलन को बदलती हैं ताकि अंड का निर्माण न हो। 3. IUCD (Intra Uterine Contraceptive Device): कॉपर-टी (Copper-T) को गर्भाशय में स्थापित करना। 4. शल्यक्रिया (Surgical Methods): स्थायी उपाय। - पुरुष नसबंदी (Vasectomy): शुक्रवाहिनी (Vas deferens) को काटना या बांधना। - महिला नसबंदी (Tubectomy): अंडवाहिका (Fallopian tube) को काटना या बांधना।
graph TD
A[जनन] --> B(अलैंगिक जनन)
A --> C(लैंगिक जनन)
B --> B1(द्विखंडन - अमीबा)
B --> B2(मुकुलन - हाइड्रा)
B --> B3(कायिक प्रवर्धन - आलू, गुलाब)
C --> C1(पुष्पी पादप)
C1 --> C1a(परागण --> निषेचन --> बीज)
C --> C2(मानव)
C2 --> C2a(नर: वृषण, शुक्राणु)
C2 --> C2b(मादा: अंडाशय, अंड)
C2a --> C2c(निषेचन: अंडवाहिका में)
C2b --> C2c
C2c --> C2d(गर्भाशय में विकास - प्लैसेंटा)