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1. परिचय

यह अध्याय भारत में राष्ट्रवाद के उदय और विकास का वर्णन करता है। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरंभ में भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने आकार लिया। स्वदेशी आंदोलन, बंगाल विभाजन का विरोध, खिलाफत आंदोलन, असहयोग आंदोलन और नागरिक अवज्ञा आंदोलन इसके प्रमुख पड़ाव थे। इस अध्याय में हम राष्ट्रवाद की अवधारणा, महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए आंदोलनों और जनता की भागीदारी का अध्ययन करेंगे। राष्ट्रवाद कोई एक घटना नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया थी, जिसमें विभिन्न वर्गों - किसान, मज़दूर, महिलाएँ, व्यापारी और बुद्धिजीवी - ने भाग लिया।

2. भारत में राष्ट्रवाद का प्रारंभिक उदय

भारत में राष्ट्रवाद की भावना का विकास उन्नीसवीं सदी के दौरान हुआ। इसमें कई कारकों ने योगदान दिया:

  1. शिक्षित मध्यवर्ग का उदय: अंग्रेज़ी शिक्षा और नए विचारों से प्रभावित वर्ग ने राजनीतिक जागरूकता फैलाई।
  2. प्रशासनिक असंतोष: ब्रिटिश नीतियों की आलोचना ने विरोध को जन्म दिया।
  3. आर्थिक शोषण: ब्रिटिश नीतियों से भारतीय उद्योगों और व्यापार को नुकसान पहुँचा।
  4. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना: 1885 में ए.ओ. ह्यूम के प्रयासों से कांग्रेस की स्थापना हुई। प्रारंभ में यह केवल शिक्षित अभिजात वर्ग तक सीमित थी।

कांग्रेस के प्रारंभिक अधिवेशनों में निम्नलिखित माँगें की गईं: - लोक सेवा परीक्षा में भारतीयों को भाग लेने की अनुमति। - प्रशासन में भारतीयों का अधिक प्रतिनिधित्व। - राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक शक्ति का विकेंद्रीकरण। - सिविल सेवा में अधिक भारतीयों की भर्ती।

3. स्वदेशी आंदोलन और बंगाल विभाजन (1905)

1905 में भारत के वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन करने का आदेश दिया। उनका कहना था कि विभाजन प्रशासनिक दृष्टि से आवश्यक है, लेकिन राष्ट्रवादियों ने इसे भारतीय एकता को तोड़ने की साजिश माना। इस विभाजन का विरोध पूरे देश में हुआ।

स्वदेशी आंदोलन के मुख्य बिंदु: 1. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और भारतीय वस्तुओं (स्वदेशी) का उपयोग। 2. विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करना। 3. सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार। 4. स्वदेशी वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहन। 5. राष्ट्रीय शिक्षा की स्थापना।

बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान एक भजन प्रचलित हुआ जिसमें कहा गया कि "स्वदेश का समृद्ध होना चाहिए ताकि उसकी प्रजा पर सुख बरसे"। स्वदेशी आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता था। 1911 में बंगाल के विभाजन को रद्द कर दिया गया, लेकिन इस आंदोलन ने राष्ट्रीय चेतना को नई ऊँचाई दी।

4. महात्मा गांधी का भारत में प्रवेश और राष्ट्रवाद

महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उन्होंने सत्याग्रह के सिद्धांत के माध्यम से जन आंदोलनों का नेतृत्व किया। सत्याग्रह का अर्थ सत्य और अहिंसा पर आधारित संघर्ष है।

गांधीजी के प्रारंभिक आंदोलन: 1. 1917 चंपारण सत्याग्रह: बिहार के चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों के लिए। नील के कठोर दबाव (तिनकठिया प्रणाली) के विरुद्ध। 2. 1917 अहमदाबाद सत्याग्रह: मिल मज़दूरों के लिए। 3. 1918 खेड़ा सत्याग्रह: गुजरात के खेड़ा में किसानों के लिए, जो फसल खराब होने के कारण कर नहीं दे पा रहे थे।

गांधीजी ने महसूस किया कि राष्ट्रवादी आंदोलन को जनता तक पहुँचाने के लिए व्यापक जनभागीदारी आवश्यक है। उन्होंने हिंदुस्तानी (आम भाषा) का प्रयोग किया ताकि आम जनता तक संवाद पहुँचे। गांधीजी ने खादी पहनना, चरखा चलाना और सादा जीवन अपनाया, जो उनकी पहचान बन गया।

5. असहयोग आंदोलन (1920-22)

असहयोग आंदोलन के लिए गांधीजी ने सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में प्रस्ताव रखा। इस आंदोलन के कारण:

  1. खिलाफत आंदोलन: प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के सुल्तान (खलीफा) को हटाने की धमकी से मुसलमानों में असंतोष था। खिलाफत मुद्दे ने मुसलमानों को राष्ट्रवादी आंदोलन से जोड़ा।
  2. रौलेट एक्ट (1919): ब्रिटिश सरकार ने बिना मुकदमा चलाए बंदी बनाने का अधिकार देने वाला कानून बनाया। इसके विरोध में गांधीजी ने हड़ताल की घोषणा की।
  3. जलियाँवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919): अमृतसर में जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के लोगों पर गोली चलाई, जिससे सैकड़ों लोग मारे गए। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया।

असहयोग आंदोलन के तरीके: 1. सरकारी उपाधियाँ और पद लौटाना। 2. सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार। 3. विदेशी कपड़ों का बहिष्कार। 4. लोगों द्वारा अपनी पहल पर बहिष्कार। 5. गांधीजी ने कहा कि यदि आंदोलन शांतिपूर्ण रहा, तो अगला कदम कर-बहिष्कार होगा।

आंदोलन की समाप्ति: फरवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा में हिंसा भड़क गई। पुलिस थाने में आग लगा दी गई जिसमें पुलिसकर्मी मारे गए। इस घटना के कारण गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया। इससे कई राष्ट्रवादियों में निराशा हुई।

6. नागरिक अवज्ञा आंदोलन (1930)

1928 में साइमन कमीशन के विरुद्ध देश भर में विरोध हुआ क्योंकि इस आयोग में कोई भारतीय सदस्य नहीं था। "साइमन गो बैक" का नारा गूँजा। 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज (पूर्ण स्वतंत्रता) का लक्ष्य घोषित किया गया।

नमक सत्याग्रह: गांधीजी ने नमक कर को चुनौती दी। 12 मार्च 1930 को दांडी मार्च शुरू हुआ - साबरमती आश्रम से दांडी (गुजरात) तक लगभग 240 मील की यात्रा। 6 अप्रैल 1930 को गांधीजी ने दांडी में समुद्र तट पर नमक बनाकर नमक कानून का उल्लंघन किया।

नागरिक अवज्ञा आंदोलन के मुख्य पहलू: 1. नमक कर का उल्लंघन। 2. विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार। 3. शराब की दुकानों का बहिष्कार। 4. सरकारी नौकरियों से इस्तीफा। 5. करों का भुगतान न करना। 6. वन कानूनों का उल्लंघन करना।

गांधी-इरविन समझौता (1931): गांधीजी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच समझौता हुआ। गांधीजी आंदोलन रोकने पर सहमत हुए और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने को तैयार हुए। लेकिन द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (लंदन) असफल रहा।

विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी: - किसान: कर में कमी की माँग की। - व्यापारी वर्ग: व्यापार में ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध आंदोलन में शामिल हुए। - मज़दूर: न्यूनतम मज़दूरी की माँग की। - महिलाएँ: आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया।

लेकिन दलित समूहों ने आंदोलन से कुछ हद तक दूरी बनाए रखी। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने मांग की कि दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र हों। गांधीजी ने इसका विरोध किया। इस मुद्दे पर 1932 में पूना समझौता हुआ, जिसमें दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर सहमति बनी।

7. कांग्रेस और विभिन्न सामाजिक समूह

राष्ट्रीय आंदोलन में विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी अलग-अलग तरह से रही:

किसान और मज़दूर: 1920-30 के दशक में अवध में किसान आंदोलन हुए। 1920 में अवध में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में किसान आंदोलन चला। किसानों ने बेदखली, ऊँचे किराये और करों के विरुद्ध विरोध किया।

व्यापारी वर्ग: व्यापारी स्वदेशी वस्तुओं के उत्पादन में लगे। उन्होंने ब्रिटिश व्यापार नीतियों का विरोध किया।

महिलाएँ: महिलाओं ने आंदोलनों में भाग लिया। वे सड़कों पर प्रदर्शन करती थीं, अदालतों और कारखानों के सामने धरना देती थीं। हालाँकि, उन्हें आंदोलन में समान अधिकार नहीं मिले, फिर भी उनकी भागीदारी महत्वपूर्ण रही।

दलित वर्ग: डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में दलितों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया। दलित समूहों ने आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की माँग की।

8. राष्ट्रवाद और विभिन्न स्वरूप

राष्ट्रीय आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी था। 1921 में जनगणना के आंकड़ों के अनुसार गांधीजी को "महात्मा" और "राष्ट्रपिता" जैसे नामों से संबोधित किया गया। लोकप्रिय चित्रों और कैलेंडरों में राष्ट्रीय नायकों के चित्र लोकप्रिय हुए।

राष्ट्रीय प्रतीक: कई चित्रकारों ने राष्ट्रवाद को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया। भारत माता की अवधारणा को प्रमुखता मिली। राष्ट्रीय ध्वज के विभिन्न रूपों पर चर्चा हुई। नमक मार्च के दौरान हाथ में सत्याग्रहियों का समूह, लाठियों से सजी टुकड़ियाँ जैसे प्रतीक राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बने।

राष्ट्रवादी इतिहास-लेखन: राष्ट्रवादियों ने अपने संघर्ष का इतिहास लिखा। इसमें "नेतृत्व", "उपनिवेशवाद", "संघर्ष" जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया। वामपंथी इतिहासकारों ने विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच तनावों पर ध्यान दिया।

9. राष्ट्रवादी आंदोलन में महत्वपूर्ण घटनाएँ

प्रमुख घटनाएँ और तिथियाँ: 1. 1885 - भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना। 2. 1905 - बंगाल का विभाजन। 3. 1919 - रौलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग हत्याकांड। 4. 1920-22 - असहयोग आंदोलन। 5. 1922 - चौरी चौरा कांड। 6. 1928 - साइमन कमीशन का विरोध। 7. 1929 - पूर्ण स्वराज की माँग (लाहौर अधिवेशन)। 8. 1930 - नमक सत्याग्रह, नागरिक अवज्ञा आंदोलन। 9. 1931 - गांधी-इरविन समझौता, द्वितीय गोलमेज सम्मेलन। 10. 1942 - भारत छोड़ो आंदोलन। 11. 1947 - भारत की स्वतंत्रता।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: महत्वपूर्ण आंदोलन और उनकी विशेषताएँ

आंदोलन वर्ष मुख्य विशेषताएँ
स्वदेशी आंदोलन 1905 विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
असहयोग आंदोलन 1920-22 अहिंसक विरोध, चौरी चौरा के बाद समाप्त
नागरिक अवज्ञा आंदोलन 1930 नमक सत्याग्रह, कर-बहिष्कार
भारत छोड़ो आंदोलन 1942 तत्काल स्वतंत्रता की माँग

तालिका 2: महत्वपूर्ण घटनाएँ और तिथियाँ

वर्ष घटना
1885 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
1905 बंगाल का विभाजन
1917 चंपारण सत्याग्रह
1919 जलियाँवाला बाग हत्याकांड
1920-22 असहयोग आंदोलन
1922 चौरी चौरा कांड
1930 दांडी मार्च, नमक सत्याग्रह
1931 गांधी-इरविन समझौता
1942 भारत छोड़ो आंदोलन
1947 भारत की स्वतंत्रता

तालिका 3: प्रमुख व्यक्ति और उनके योगदान

व्यक्ति योगदान
ए.ओ. ह्यूम कांग्रेस की स्थापना
लॉर्ड कर्ज़न बंगाल का विभाजन
महात्मा गांधी सत्याग्रह, असहयोग, नागरिक अवज्ञा
जनरल डायर जलियाँवाला बाग कांड
डॉ. अंबेडकर दलित अधिकारों का संघर्ष
बाबा रामचंद्र अवध का किसान आंदोलन
लॉर्ड इरविन गांधी-इरविन समझौता

माइंड मैप

graph TD A["भारत में राष्ट्रवाद"] --> B["प्रारंभिक उदय"] B --> C["कांग्रेस की स्थापना 1885"] B --> D["बंगाल विभाजन 1905"] A --> E["गांधी युग"] E --> F["चंपारण 1917"] E --> G["असहयोग आंदोलन 1920-22"] E --> H["नागरिक अवज्ञा 1930"] A --> I["जनभागीदारी"] I --> J["किसान, मज़दूर"] I --> K["महिलाएँ"] I --> L["दलित वर्ग"] A --> M["प्रतीक और संस्कृति"] M --> N["भारत माता"] M --> O["स्वदेशी भावना"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: गांधी युग के प्रमुख आंदोलन

गांधी युग के प्रमुख आंदोलन सत्याग्रह चंपारण 1917 नील किसान असहयोग 1920-22 खिलाफत + रौलेट नागरिक अवज्ञा 1930 दांडी मार्च चौरी चौरा कांड 1922 हिंसा के कारण असहयोग आंदोलन वापस लिया गया गांधी-इरविन समझौता 1931 द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति स्वर्ण नियम: सत्य और अहिंसा ही सत्याग्रह की आत्मा हैं

आरेख 2: राष्ट्रीय आंदोलन में जनभागीदारी

राष्ट्रीय आंदोलन में जनभागीदारी राष्ट्रीय आंदोलन किसान कर और बेदखली विरोध महिलाएँ प्रदर्शन और धरना व्यापारी स्वदेशी समर्थन मज़दूर: न्यूनतम मज़दूरी की माँग दलित वर्ग: डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में आरक्षण की माँग Golden Rule: जनभागीदारी के बिना राष्ट्रीय आंदोलन अधूरा है

सामान्य गलतियाँ

  1. कांग्रेस की स्थापना का वर्ष: विद्यार्थी कांग्रेस की स्थापना (1885) को भूल जाते हैं। यह ए.ओ. ह्यूम के प्रयासों से 1885 में हुई।
  2. चंपारण और खेड़ा में भ्रम: चंपारण (बिहार) में नील किसानों का आंदोलन था, जबकि खेड़ा (गुजरात) में कर-मुक्ति का आंदोलन। इन्हें उलट नहीं किया जाना चाहिए।
  3. रौलेट एक्ट का वर्ष: रौलेट एक्ट 1919 में पारित हुआ, 1917 में नहीं। इसी वर्ष जलियाँवाला बाग कांड हुआ।
  4. सत्याग्रह का अर्थ: सत्याग्रह केवल निष्क्रिय विरोध नहीं है, बल्कि सत्य और अहिंसा पर आधारित सक्रिय संघर्ष है।
  5. गांधी-इरविन समझौता किस वर्ष: 1931 में हुआ, और इसके बाद गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए। इसे प्रथम गोलमेज सम्मेलन से नहीं जोड़ें।
  6. चौरी चौरा कांड का स्थान: यह बिहार या बंगाल नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश (गोरखपुर जिले) में हुआ था।
  7. स्वदेशी आंदोलन का उद्देश्य: इसे केवल बहिष्कार तक सीमित नहीं समझना चाहिए; इसका उद्देश्य आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय चेतना जगाना था।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. तिथियों की सूची बनाएँ: 1885, 1905, 1917, 1919, 1920-22, 1922, 1930, 1931, 1942, 1947 - इन्हें क्रम से याद करें और घटना के साथ जोड़ें।
  2. आंदोलनों की तुलना: असहयोग आंदोलन और नागरिक अवज्ञा आंदोलन के बीच अंतर लिखना सीखें - पहले में उपाधि बहिष्कार था, दूसरे में नमक कर और कर-बहिष्कार।
  3. व्यक्तियों के योगदान: गांधीजी, अंबेडकर, लॉर्ड कर्ज़न, जनरल डायर, ए.ओ. ह्यूम - इनके योगदान के आधार पर प्रश्न आते हैं।
  4. मानचित्र कार्य: चंपारण (बिहार), खेड़ा (गुजरात), दांडी (गुजरात), चौरी चौरा (उ.प्र.) का मानचित्र पर स्थान जानें।
  5. बहु-विकल्पीय प्रश्नों में सावधानी: वर्षों और स्थानों से जुड़े प्रश्नों में विकल्पों को ध्यान से पढ़ें, क्योंकि गलत विकल्प अक्सर भ्रमित करने वाले होते हैं।
  6. पूर्ण वाक्यों में उत्तर: परीक्षा में महत्वपूर्ण शब्दों को रेखांकित करें, जैसे सत्याग्रह, स्वदेशी, खिलाफत, पूर्ण स्वराज।

निष्कर्ष

भारत में राष्ट्रवाद का विकास एक सतत और व्यापक प्रक्रिया थी, जो उन्नीसवीं सदी के अंत में शुरू हुई और 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति तक जारी रही। स्वदेशी आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक, महात्मा गांधी के नेतृत्व में विभिन्न सामाजिक समूहों ने राष्ट्र के निर्माण में भाग लिया। राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और सामाजिक जागृति थी, जिसने भारत के कोने-कोने में राष्ट्रीय चेतना फैलाई।