यह अध्याय भारत में राष्ट्रवाद के उदय और विकास का वर्णन करता है। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरंभ में भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने आकार लिया। स्वदेशी आंदोलन, बंगाल विभाजन का विरोध, खिलाफत आंदोलन, असहयोग आंदोलन और नागरिक अवज्ञा आंदोलन इसके प्रमुख पड़ाव थे। इस अध्याय में हम राष्ट्रवाद की अवधारणा, महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए आंदोलनों और जनता की भागीदारी का अध्ययन करेंगे। राष्ट्रवाद कोई एक घटना नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया थी, जिसमें विभिन्न वर्गों - किसान, मज़दूर, महिलाएँ, व्यापारी और बुद्धिजीवी - ने भाग लिया।
भारत में राष्ट्रवाद की भावना का विकास उन्नीसवीं सदी के दौरान हुआ। इसमें कई कारकों ने योगदान दिया:
कांग्रेस के प्रारंभिक अधिवेशनों में निम्नलिखित माँगें की गईं: - लोक सेवा परीक्षा में भारतीयों को भाग लेने की अनुमति। - प्रशासन में भारतीयों का अधिक प्रतिनिधित्व। - राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक शक्ति का विकेंद्रीकरण। - सिविल सेवा में अधिक भारतीयों की भर्ती।
1905 में भारत के वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन करने का आदेश दिया। उनका कहना था कि विभाजन प्रशासनिक दृष्टि से आवश्यक है, लेकिन राष्ट्रवादियों ने इसे भारतीय एकता को तोड़ने की साजिश माना। इस विभाजन का विरोध पूरे देश में हुआ।
स्वदेशी आंदोलन के मुख्य बिंदु: 1. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और भारतीय वस्तुओं (स्वदेशी) का उपयोग। 2. विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करना। 3. सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार। 4. स्वदेशी वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहन। 5. राष्ट्रीय शिक्षा की स्थापना।
बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान एक भजन प्रचलित हुआ जिसमें कहा गया कि "स्वदेश का समृद्ध होना चाहिए ताकि उसकी प्रजा पर सुख बरसे"। स्वदेशी आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता था। 1911 में बंगाल के विभाजन को रद्द कर दिया गया, लेकिन इस आंदोलन ने राष्ट्रीय चेतना को नई ऊँचाई दी।
महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उन्होंने सत्याग्रह के सिद्धांत के माध्यम से जन आंदोलनों का नेतृत्व किया। सत्याग्रह का अर्थ सत्य और अहिंसा पर आधारित संघर्ष है।
गांधीजी के प्रारंभिक आंदोलन: 1. 1917 चंपारण सत्याग्रह: बिहार के चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों के लिए। नील के कठोर दबाव (तिनकठिया प्रणाली) के विरुद्ध। 2. 1917 अहमदाबाद सत्याग्रह: मिल मज़दूरों के लिए। 3. 1918 खेड़ा सत्याग्रह: गुजरात के खेड़ा में किसानों के लिए, जो फसल खराब होने के कारण कर नहीं दे पा रहे थे।
गांधीजी ने महसूस किया कि राष्ट्रवादी आंदोलन को जनता तक पहुँचाने के लिए व्यापक जनभागीदारी आवश्यक है। उन्होंने हिंदुस्तानी (आम भाषा) का प्रयोग किया ताकि आम जनता तक संवाद पहुँचे। गांधीजी ने खादी पहनना, चरखा चलाना और सादा जीवन अपनाया, जो उनकी पहचान बन गया।
असहयोग आंदोलन के लिए गांधीजी ने सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में प्रस्ताव रखा। इस आंदोलन के कारण:
असहयोग आंदोलन के तरीके: 1. सरकारी उपाधियाँ और पद लौटाना। 2. सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार। 3. विदेशी कपड़ों का बहिष्कार। 4. लोगों द्वारा अपनी पहल पर बहिष्कार। 5. गांधीजी ने कहा कि यदि आंदोलन शांतिपूर्ण रहा, तो अगला कदम कर-बहिष्कार होगा।
आंदोलन की समाप्ति: फरवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा में हिंसा भड़क गई। पुलिस थाने में आग लगा दी गई जिसमें पुलिसकर्मी मारे गए। इस घटना के कारण गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया। इससे कई राष्ट्रवादियों में निराशा हुई।
1928 में साइमन कमीशन के विरुद्ध देश भर में विरोध हुआ क्योंकि इस आयोग में कोई भारतीय सदस्य नहीं था। "साइमन गो बैक" का नारा गूँजा। 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज (पूर्ण स्वतंत्रता) का लक्ष्य घोषित किया गया।
नमक सत्याग्रह: गांधीजी ने नमक कर को चुनौती दी। 12 मार्च 1930 को दांडी मार्च शुरू हुआ - साबरमती आश्रम से दांडी (गुजरात) तक लगभग 240 मील की यात्रा। 6 अप्रैल 1930 को गांधीजी ने दांडी में समुद्र तट पर नमक बनाकर नमक कानून का उल्लंघन किया।
नागरिक अवज्ञा आंदोलन के मुख्य पहलू: 1. नमक कर का उल्लंघन। 2. विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार। 3. शराब की दुकानों का बहिष्कार। 4. सरकारी नौकरियों से इस्तीफा। 5. करों का भुगतान न करना। 6. वन कानूनों का उल्लंघन करना।
गांधी-इरविन समझौता (1931): गांधीजी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच समझौता हुआ। गांधीजी आंदोलन रोकने पर सहमत हुए और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने को तैयार हुए। लेकिन द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (लंदन) असफल रहा।
विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी: - किसान: कर में कमी की माँग की। - व्यापारी वर्ग: व्यापार में ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध आंदोलन में शामिल हुए। - मज़दूर: न्यूनतम मज़दूरी की माँग की। - महिलाएँ: आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
लेकिन दलित समूहों ने आंदोलन से कुछ हद तक दूरी बनाए रखी। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने मांग की कि दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र हों। गांधीजी ने इसका विरोध किया। इस मुद्दे पर 1932 में पूना समझौता हुआ, जिसमें दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर सहमति बनी।
राष्ट्रीय आंदोलन में विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी अलग-अलग तरह से रही:
किसान और मज़दूर: 1920-30 के दशक में अवध में किसान आंदोलन हुए। 1920 में अवध में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में किसान आंदोलन चला। किसानों ने बेदखली, ऊँचे किराये और करों के विरुद्ध विरोध किया।
व्यापारी वर्ग: व्यापारी स्वदेशी वस्तुओं के उत्पादन में लगे। उन्होंने ब्रिटिश व्यापार नीतियों का विरोध किया।
महिलाएँ: महिलाओं ने आंदोलनों में भाग लिया। वे सड़कों पर प्रदर्शन करती थीं, अदालतों और कारखानों के सामने धरना देती थीं। हालाँकि, उन्हें आंदोलन में समान अधिकार नहीं मिले, फिर भी उनकी भागीदारी महत्वपूर्ण रही।
दलित वर्ग: डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में दलितों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया। दलित समूहों ने आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की माँग की।
राष्ट्रीय आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी था। 1921 में जनगणना के आंकड़ों के अनुसार गांधीजी को "महात्मा" और "राष्ट्रपिता" जैसे नामों से संबोधित किया गया। लोकप्रिय चित्रों और कैलेंडरों में राष्ट्रीय नायकों के चित्र लोकप्रिय हुए।
राष्ट्रीय प्रतीक: कई चित्रकारों ने राष्ट्रवाद को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया। भारत माता की अवधारणा को प्रमुखता मिली। राष्ट्रीय ध्वज के विभिन्न रूपों पर चर्चा हुई। नमक मार्च के दौरान हाथ में सत्याग्रहियों का समूह, लाठियों से सजी टुकड़ियाँ जैसे प्रतीक राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बने।
राष्ट्रवादी इतिहास-लेखन: राष्ट्रवादियों ने अपने संघर्ष का इतिहास लिखा। इसमें "नेतृत्व", "उपनिवेशवाद", "संघर्ष" जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया। वामपंथी इतिहासकारों ने विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच तनावों पर ध्यान दिया।
प्रमुख घटनाएँ और तिथियाँ: 1. 1885 - भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना। 2. 1905 - बंगाल का विभाजन। 3. 1919 - रौलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग हत्याकांड। 4. 1920-22 - असहयोग आंदोलन। 5. 1922 - चौरी चौरा कांड। 6. 1928 - साइमन कमीशन का विरोध। 7. 1929 - पूर्ण स्वराज की माँग (लाहौर अधिवेशन)। 8. 1930 - नमक सत्याग्रह, नागरिक अवज्ञा आंदोलन। 9. 1931 - गांधी-इरविन समझौता, द्वितीय गोलमेज सम्मेलन। 10. 1942 - भारत छोड़ो आंदोलन। 11. 1947 - भारत की स्वतंत्रता।
| आंदोलन | वर्ष | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|
| स्वदेशी आंदोलन | 1905 | विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार |
| असहयोग आंदोलन | 1920-22 | अहिंसक विरोध, चौरी चौरा के बाद समाप्त |
| नागरिक अवज्ञा आंदोलन | 1930 | नमक सत्याग्रह, कर-बहिष्कार |
| भारत छोड़ो आंदोलन | 1942 | तत्काल स्वतंत्रता की माँग |
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1885 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना |
| 1905 | बंगाल का विभाजन |
| 1917 | चंपारण सत्याग्रह |
| 1919 | जलियाँवाला बाग हत्याकांड |
| 1920-22 | असहयोग आंदोलन |
| 1922 | चौरी चौरा कांड |
| 1930 | दांडी मार्च, नमक सत्याग्रह |
| 1931 | गांधी-इरविन समझौता |
| 1942 | भारत छोड़ो आंदोलन |
| 1947 | भारत की स्वतंत्रता |
| व्यक्ति | योगदान |
|---|---|
| ए.ओ. ह्यूम | कांग्रेस की स्थापना |
| लॉर्ड कर्ज़न | बंगाल का विभाजन |
| महात्मा गांधी | सत्याग्रह, असहयोग, नागरिक अवज्ञा |
| जनरल डायर | जलियाँवाला बाग कांड |
| डॉ. अंबेडकर | दलित अधिकारों का संघर्ष |
| बाबा रामचंद्र | अवध का किसान आंदोलन |
| लॉर्ड इरविन | गांधी-इरविन समझौता |
भारत में राष्ट्रवाद का विकास एक सतत और व्यापक प्रक्रिया थी, जो उन्नीसवीं सदी के अंत में शुरू हुई और 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति तक जारी रही। स्वदेशी आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक, महात्मा गांधी के नेतृत्व में विभिन्न सामाजिक समूहों ने राष्ट्र के निर्माण में भाग लिया। राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और सामाजिक जागृति थी, जिसने भारत के कोने-कोने में राष्ट्रीय चेतना फैलाई।