यह अध्याय भूमंडलीकरण (Globalisation) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण करता है। आज का आपस में जुड़ा हुआ विश्व एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। उन्नीसवीं सदी में औद्योगिक क्रांति, रेलवे, स्टीमशिप और टेलीग्राफ ने दुनिया के विभिन्न भागों को आपस में जोड़ा। माल, पूँजी और लोगों का प्रवाह एक देश से दूसरे देश तक हुआ। इस प्रक्रिया में दो विश्व युद्धों और महामंदी (1930) ने बड़ा बदलाव लाया। प्रौद्योगिकी के विकास ने भी इस प्रक्रिया को तेज़ किया। यह अध्याय हमें दिखाता है कि वर्तमान वैश्वीकरण आधुनिक दुनिया की कोई नई घटना नहीं है, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है जिसकी जड़ें उन्नीसवीं सदी तक जाती हैं।
उन्नीसवीं सदी में विश्व अर्थव्यवस्था में तेज़ी से बदलाव आया। इसके प्रमुख कारण थे:
पूँजी का प्रवाह: यूरोप के धनी देशों ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में पूँजी का निवेश किया। रेलवे निर्माण, बंदरगाहों का विकास और खनन जैसे क्षेत्रों में निवेश हुआ। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों ने अपनी कॉलोनियों में पूँजी निवेश किया।
उन्नीसवीं सदी में लाखों लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले गए। प्रवास के प्रमुख कारण थे:
भारत से प्रवास: उन्नीसवीं सदी में भारत से बड़ी संख्या में लोग मज़दूर (श्रमिक) के रूप में विदेश गए। ये श्रमिक विभिन्न देशों की बागान (plantation) अर्थव्यवस्थाओं में काम करने गए। जमैका, त्रिनिदाद, सूरीनाम, गुयाना, मॉरीशस जैसे देशों में भारतीय मज़दूर चीनी, चाय, कॉफी जैसी फसलों के बागानों में काम करते थे।
श्रमिक प्रवास की प्रणाली: भारतीय श्रमिक अनुबंध (contract) पर विदेश जाते थे। इस प्रणाली में मज़दूरों को एक निश्चित अवधि के लिए अनुबंधित किया जाता था। लेकिन कई बार यह प्रणाली शोषण का रूप ले लेती थी। मज़दूरों को कठोर परिस्थितियों में काम करना पड़ता था।
उन्नीसवीं सदी में प्रौद्योगिकी ने अभूतपूर्व विकास किया। स्टीमशिप के विकास से समुद्री यात्रा तेज़ हुई। रेलवे ने भूमि पर यात्रा को आसान बनाया। टेलीग्राफ ने सूचना को तात्कालिक बना दिया।
रेलवे के लाभ: रेलवे ने दूर-दूर के क्षेत्रों को जोड़ा। माल की ढुलाई सस्ती और तेज़ हुई। किसान अब दूर-दूर के बाज़ारों तक अपनी फसल पहुँचा सकते थे।
टेलीग्राफ: टेलीग्राफ ने व्यापार और वित्तीय लेन-देन को तेज़ किया। व्यापारी अब तुरंत सूचना प्राप्त कर सकते थे और निर्णय ले सकते थे।
हालाँकि, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि प्रौद्योगिकी का लाभ सभी को समान रूप से नहीं मिला। उपनिवेशों में प्रौद्योगिकी का विकास मुख्य रूप से उपनिवेशी शक्तियों के हित में हुआ।
1929 में संयुक्त राज्य अमेरिका में शेयर बाज़ार का पतन हुआ, जिसे महामंदी कहा जाता है। इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ा।
महामंदी के कारण: 1. कृषि उत्पादन में वृद्धि और कीमतों में गिरावट। 2. उद्योगों में अत्यधिक उत्पादन। 3. शेयर बाज़ार में अटकलें (speculation)। 4. बैंकों का कर्ज़ बढ़ना।
महामंदी के प्रभाव: 1. विश्व व्यापार में तेज़ गिरावट (60% तक)। 2. कारखाने बंद होने से बेरोज़गारी बढ़ी। 3. किसानों की आय में गिरावट। 4. श्रमिकों के वेतन में कटौती।
भारत पर प्रभाव: महामंदी का भारत पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। कृषि उत्पादों (जैसे जूट) के निर्यात में भारी गिरावट आई। किसानों की आय घटी, कर्ज़ बढ़ा। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और बेरोज़गारी बढ़ी। जूट मज़दूरों, व्यापारियों और बैंकों सभी को नुकसान हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) ने विश्व अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। युद्ध के बाद कई देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण किया।
युद्ध के बाद के विकास: 1. ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (1944): न्यू हैम्पशायर (अमेरिका) में आयोजित हुआ। इसने नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की नींव रखी। 2. IMF (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष): ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के परिणामस्वरूप 1945 में स्थापित हुआ। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा के अभाव में देशों को ऋण देना था। 3. विश्व बैंक (World Bank): युद्ध के बाद यूरोप के पुनर्निर्माण के लिए ऋण देने हेतु स्थापित हुआ।
ब्रेटन वुड्स की विशेषताएँ: - डॉलर को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में मान्यता। - मुद्राओं को डॉलर से जोड़ना। - स्वर्ण मानक के स्थान पर डॉलर मानक।
विश्व व्यापार संगठन (WTO): 1995 में स्थापित हुआ। यह वैश्विक व्यापार को नियंत्रित करता है। WTO का मुख्य उद्देश्य व्यापार की बाधाओं को कम करना और वैश्विक व्यापार को सुगम बनाना है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद और खासकर हाल के दशकों में प्रौद्योगिकी ने तेज़ी से विकास किया। कंटेनर नौवहन (container shipping) ने माल ढुलाई को सस्ता और आसान बनाया। कंटेनरों ने बंदरगाहों पर लदाई-उतराई का समय कम किया।
वायु परिवहन और संचार: हवाई परिवहन और टेलीफोन संचार ने लोगों को जोड़ा। कंप्यूटर और इंटरनेट ने सूचना क्रांति ला दी। वैश्विक ग्राहक-केंद्रित उद्योग (call centers) भारत जैसे देशों में विकसित हुए।
बहुराष्ट्रीय निगम: ये कंपनियाँ एक देश में स्थित होती हैं, लेकिन कई देशों में कार्य करती हैं। इनके कारण पूँजी और प्रौद्योगिकी का प्रवाह हुआ।
भारत लंबे समय से विश्व अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहा है। औपनिवेशिक काल में भारत कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता और तैयार माल का आयातक था। स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनी आर्थिक नीतियों में बदलाव किए।
भारत में विश्व व्यापार के माध्यम से बदलाव: 1. कच्चे माल के निर्यात में बदलाव। 2. विदेशी निवेश का आगमन। 3. तकनीकी सहयोग। 4. नई नौकरियों का सृजन।
भारत में वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में बदलाव आया। हालाँकि, वैश्वीकरण के लाभ और हानि दोनों हुए। यह चर्चा अध्याय 22 में विस्तार से की गई है।
| संस्था | स्थापना वर्ष | उद्देश्य |
|---|---|---|
| IMF | 1945 | विदेशी मुद्रा के अभाव में ऋण देना |
| विश्व बैंक | 1945 | युद्ध-पश्चात पुनर्निर्माण और विकास ऋण |
| WTO | 1995 | वैश्विक व्यापार की बाधाएँ कम करना |
| घटना | वर्ष | प्रभाव |
|---|---|---|
| महामंदी | 1929-1930 | विश्व व्यापार में 60% गिरावट |
| ब्रेटन वुड्स सम्मेलन | 1944 | नई आर्थिक व्यवस्था की नींव |
| द्वितीय विश्व युद्ध | 1939-45 | अर्थव्यवस्थाओं का पुनर्गठन |
| IMF और विश्व बैंक की स्थापना | 1945 | वैश्विक वित्तीय सहायता |
| WTO की स्थापना | 1995 | व्यापार उदारीकरण |
| देश | प्रवास का कारण | मुख्य गतिविधि |
|---|---|---|
| जमैका, त्रिनिदाद | बागान श्रमिक | चीनी, चाय, कॉफी |
| मॉरीशस | अनुबंधित श्रमिक | बागान अर्थव्यवस्था |
| अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया | रोज़गार की तलाश | विभिन्न उद्योग |
भूमंडलीकृत विश्व का बनना एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया है जो उन्नीसवीं सदी में शुरू हुई। औद्योगिक क्रांति, प्रौद्योगिकी का विकास, पूँजी का प्रवाह और प्रवास ने विश्व को जोड़ा। महामंदी ने अर्थव्यवस्थाओं को हिला दिया, जबकि ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने नई वैश्विक संस्थाओं की स्थापना की। आज के वैश्वीकरण की जड़ें इन्हीं ऐतिहासिक प्रक्रियाओं में हैं। यह अध्याय हमें सिखाता है कि अर्थव्यवस्थाएँ आपस में कैसे जुड़ती हैं और कैसे वैश्विक घटनाएँ स्थानीय जीवन को प्रभावित करती हैं।