मुद्रा (Money) और साख (Credit) आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली (barter system) की समस्याओं को दूर करने के लिए मुद्रा का विकास हुआ। मुद्रा ने लेन-देन को सरल बनाया। आज के युग में बैंकों द्वारा साख (ऋण) प्रदान करना अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण कार्य है। इस अध्याय में हम वस्तु विनिमय प्रणाली, मुद्रा के कार्य, बैंक, साख की अवधारणा, ऋण की शर्तें, औपचारिक और अनौपचारिक ऋण स्रोत, भारत में ऋण की समस्याएँ और साख की सुलभता के उपायों का अध्ययन करेंगे।
वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter system) में वस्तुओं का सीधे आदान-प्रदान होता था। इसमें कई समस्याएँ थीं:
वस्तु विनिमय की समस्याएँ: 1. इच्छाओं का दोहरा संयोग (Double coincidence of wants): दोनों पक्षों की एक-दूसरे की वस्तुओं की आवश्यकता होनी चाहिए। 2. मूल्य मापने में कठिनाई। 3. वस्तुओं को संग्रहित करने में कठिनाई। 4. विभाजन की समस्या।
इन समस्याओं के समाधान के लिए मुद्रा का विकास हुआ। मुद्रा एक मध्यस्थ के रूप में कार्य करती है।
मुद्रा के प्रकार: 1. प्राचीन मुद्रा: सोना, चाँदी, अनाज। 2. आधुनिक मुद्रा: सिक्के, कागज़ी मुद्रा। 3. बैंकिंग मुद्रा: चेक, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड।
मुद्रा के निम्नलिखित मुख्य कार्य हैं:
आधुनिक मुद्रा प्रणाली: - भारत में रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) मुद्रा का नियंत्रण करता है। - कागज़ी मुद्रा और सिक्के कानूनी मुद्रा (legal tender) हैं। - किसी को भी मुद्रा स्वीकार करने से मना नहीं कर सकता।
बैंक (Bank) वित्तीय संस्थाएँ हैं जो जनता से जमा स्वीकार करती हैं और ऋण प्रदान करती हैं।
बैंक की मुख्य गतिविधियाँ: 1. जमा स्वीकार करना: लोग अपनी बचत बैंक में जमा करते हैं। 2. ऋण प्रदान करना: बैंक जमा का एक हिस्सा ऋण के रूप में देता है। 3. ब्याज दर निर्धारण।
बैंक कैसे काम करता है: - लोग बैंक में जमा करते हैं। - बैंक जमा का एक हिस्सा (जमा के अनुपात में) ऋण के रूप में देता है। - ऋण पर ब्याज लेता है और जमा पर ब्याज देता है। - बैंक ब्याज के अंतर से लाभ कमाता है।
साख (Credit): साख का अर्थ है ऋण या उधार। जब कोई व्यक्ति या संस्था पैसा उधार लेती है, तो उसे साख कहते हैं।
ऋण (Loan) लेते समय कुछ शर्तें तय होती हैं:
ऋण की मुख्य शर्तें: 1. ब्याज दर (Interest rate): ऋण पर देय ब्याज। 2. संपार्श्विक (Collateral): वह संपत्ति जो ऋण के बदले गिरवी रखी जाती है। 3. वितरण (Documentation): ऋण देने की प्रक्रिया। 4. पुनर्भुगतान की अवधि (Repayment period): ऋण चुकाने का समय।
संपार्श्विक के उदाहरण: भूमि, मकान, सोना, वाहन। यदि ऋणी ऋण नहीं चुका पाता, तो ऋणदाता संपार्श्विक को बेच सकता है।
भारत में ऋण के स्रोत दो प्रकार के हैं:
औपचारिक ऋण स्रोत (Formal sources): 1. बैंक। 2. सहकारी समितियाँ। 3. सरकारी संस्थाएँ। - इनकी निगरानी RBI करता है। - ब्याज दरें नियंत्रित होती हैं।
अनौपचारिक ऋण स्रोत (Informal sources): 1. साहूकार (moneylenders)। 2. दोस्त, रिश्तेदार। 3. व्यापारी। - इन पर कोई नियंत्रण नहीं। - ब्याज दरें अधिक होती हैं। - शर्तें सख्त होती हैं।
औपचारिक और अनौपचारिक ऋण में अंतर: 1. औपचारिक में RBI की निगरानी, अनौपचारिक में कोई निगरानी नहीं। 2. औपचारिक में ब्याज दरें कम, अनौपचारिक में अधिक। 3. औपचारिक में कागज़ी प्रक्रिया, अनौपचारिक में व्यक्तिगत संबंध।
भारत में ऋण प्रणाली की निम्नलिखित समस्याएँ हैं:
भारत में ऋण वितरण में असमानता: गरीब वर्ग को ऋण का बहुत कम हिस्सा मिलता है, जबकि धनी वर्ग को अधिक।
भारत में साख की सुलभता बढ़ाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए गए हैं:
स्वयं सहायता समूह (SHG): - 15-20 सदस्यों का समूह। - सदस्य छोटी-छोटी राशि जमा करते हैं। - समूह बैंक से ऋण लेता है। - महिलाओं को सशक्त बनाता है।
| कार्य | विवरण |
|---|---|
| विनिमय का माध्यम | लेन-देन में मध्यस्थ |
| मूल्य का मापक | वस्तुओं का मूल्य |
| मूल्य का संचय | बचत करना |
| विलंबित भुगतान | भविष्य में भुगतान |
| स्रोत | प्रकार | विशेषताएँ |
|---|---|---|
| बैंक | औपचारिक | RBI निगरानी, कम ब्याज |
| सहकारी समिति | औपचारिक | सदस्यों के लिए |
| साहूकार | अनौपचारिक | अधिक ब्याज |
| रिश्तेदार | अनौपचारिक | व्यक्तिगत संबंध |
| शर्त | विवरण |
|---|---|
| ब्याज दर | ऋण पर देय ब्याज |
| संपार्श्विक | गिरवी संपत्ति |
| पुनर्भुगतान अवधि | चुकाने का समय |
| वितरण | कागज़ी प्रक्रिया |
मुद्रा और साख अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली की समस्याओं को मुद्रा ने सुलझाया। मुद्रा विनिमय का माध्यम, मूल्य का मापक और संचय का साधन है। बैंक जमा स्वीकार कर ऋण प्रदान करते हैं, जो साख कहलाता है। भारत में ऋण के औपचारिक (बैंक, सहकारी) और अनौपचारिक (साहूकार) स्रोत हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अनौपचारिक स्रोतों पर अधिक निर्भरता और अधिक ब्याज दरें कर्ज़ के जाल का कारण हैं। सहकारी समितियों, KCC और SHG जैसे उपायों से साख की सुलभता बढ़ाना आवश्यक है। यह अध्याय हमें वित्तीय प्रणाली की कार्यप्रणाली और कर्ज़ की समस्या की समझ देता है।