संसाधन (Resources) किसी भी देश के विकास की नींव होते हैं। पृथ्वी पर उपलब्ध सभी तत्व, चाहे वे प्राकृतिक हों या मानव निर्मित, जो मानव की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, संसाधन कहलाते हैं। लेकिन केवल उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं है; संसाधनों का उपयोग तभी संभव है जब उपयुक्त तकनीक और योग्यता उपलब्ध हो। इस अध्याय में हम संसाधनों के वर्गीकरण, विकास, संसाधन नियोजन, भू-संसाधन, मृदा अपरदन और मृदा संरक्षण के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे। यह अध्याय हमें संसाधनों के सतत विकास और संरक्षण के प्रति जागरूक बनाता है।
संसाधन हमारे पर्यावरण की वे सभी चीज़ें हैं जो मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने और अधिक मूल्य बनाने में सक्षम हैं। किसी वस्तु को संसाधन बनने के लिए तीन शर्तें आवश्यक हैं:
केवल पृथ्वी का भौतिक तत्व ही संसाधन नहीं है, बल्कि वह प्रक्रिया भी संसाधन है जो उसे उपयोगी बनाती है। उदाहरण के लिए, लकड़ी, हवा, पानी सभी प्राकृतिक संसाधन हैं।
संसाधनों को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:
उत्पत्ति के आधार पर: 1. जैव संसाधन (Biotic): वे संसाधन जो जीवित चीज़ों से प्राप्त होते हैं, जैसे वन, वन्य जीव, मछलियाँ, पशुधन। 2. अजैव संसाधन (Abiotic): वे संसाधन जो निर्जीव चीज़ों से बने हैं, जैसे चट्टानें, खनिज, धातु।
नवीकरणीयता के आधार पर: 1. नवीकरणीय संसाधन (Renewable): जिन्हें पुनः प्राप्त किया जा सकता है, जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, वन (यदि संरक्षित किए जाएँ)। इन्हें अक्षय संसाधन भी कहते हैं। 2. अनवीकरणीय संसाधन (Non-renewable): जिनकी मात्रा सीमित है और जो समाप्त हो सकते हैं, जैसे कोयला, पेट्रोलियम, खनिज। इन्हें परिमित संसाधन भी कहते हैं।
स्वामित्व के आधार पर: 1. व्यक्तिगत संसाधन (Individual): किसी व्यक्ति के स्वामित्व वाले, जैसे बाग, ज़मीन, मकान। 2. सामुदायिक संसाधन (Community): जो समुदाय के उपयोग के लिए उपलब्ध, जैसे सार्वजनिक पार्क, तालाब, चरागाह। 3. राष्ट्रीय संसाधन (National): जो किसी देश के स्वामित्व में हैं, जैसे खनिज, नदियाँ, वन। 4. अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International): जो अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा नियंत्रित होते हैं, जैसे महासागर, अंतरिक्ष।
विकास की अवस्था के आधार पर: 1. वास्तविक संसाधन (Actual): जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है और उपयोग किया जा रहा है। 2. संभावित संसाधन (Potential): जो मौजूद हैं लेकिन अभी पूर्ण उपयोग नहीं हुए, जैसे राजस्थान में पवन और सौर ऊर्जा। 3. भंडार (Stock): तकनीक की कमी के कारण उपयोग न हो सकने वाले संसाधन। 4. आरक्षित संसाधन (Reserves): भंडार का वह भाग जिसका भविष्य में उपयोग किया जा सके।
संसाधनों का विकास उनके उपयोग की क्षमता में सुधार लाना है। संसाधनों का विकास उनकी प्रकृति पर निर्भर करता है। लेकिन विकास की अंधी दौड़ में संसाधनों का अत्यधिक दोहन हुआ है।
संसाधनों के अति-दोहन के कारण: 1. जनसंख्या में तीव्र वृद्धि। 2. उपभोग में वृद्धि। 3. आधुनिक प्रौद्योगिकी का विकास। 4. आर्थिक विकास की अंधी दौड़।
संसाधनों के अति-दोहन के प्रभाव: 1. पर्यावरणीय क्षरण (degradation)। 2. मृदा अपरदन। 3. भूमि क्षरण। 4. जलवायु परिवर्तन।
संसाधनों के उचित उपयोग के लिए संसाधन नियोजन आवश्यक है। संसाधन नियोजन संसाधनों की उपलब्धता, तकनीक और योग्यता का सही आकलन करता है। यह संसाधनों के सतत विकास में मदद करता है।
संसाधन नियोजन की प्रक्रिया: 1. संसाधनों की पहचान और सर्वेक्षण। 2. तकनीकी विकास का मूल्यांकन। 3. संसाधनों के उपयोग की योजना। 4. संसाधनों के संरक्षण के उपाय। 5. संसाधन नियोजन में लोगों की भागीदारी।
भारत में संसाधन नियोजन का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि संसाधनों का वितरण असमान है। राजस्थान में पवन और सौर ऊर्जा अधिक है जबकि पानी कम है। इसी तरह झारखंड में खनिज अधिक हैं जबकि जल संसाधन कम।
भारत में संसाधन नियोजन के प्रयास: 1. पाँच वर्षीय योजनाओं में संसाधन नियोजन। 2. राष्ट्रीय संसाधन नीति। 3. क्षेत्रीय योजनाएँ। 4. स्थानीय भागीदारी।
संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से बचने के लिए सतत विकास की अवधारणा विकसित हुई। सतत विकास का अर्थ है - "ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करे, बिना भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को क्षति पहुँचाए।"
सतत विकास के सिद्धांत: 1. संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग। 2. पर्यावरण का संरक्षण। 3. तकनीकी नवाचार। 4. सामाजिक न्याय। 5. आर्थिक विकास में संतुलन।
सतत विकास की विश्व सम्मेलनों की घटनाएँ: 1. 1972 - स्टॉकहोम सम्मेलन। 2. 1992 - रियो डी जनेरियो पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit)। 3. 1997 - क्योटो प्रोटोकॉल। 4. 2015 - संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य (SDGs)।
भूमि सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है, क्योंकि यह मानव की सभी आवश्यकताओं का आधार है। भूमि का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए होता है। भारत में भूमि का उपयोग विभिन्न वर्गों में वर्गीकृत है:
भारत में भूमि उपयोग का वर्गीकरण: 1. निवल बोया क्षेत्र (Net sown area)। 2. वन क्षेत्र (Forest area)। 3. परती भूमि (Fallow land)। 4. कृषि योग्य बंजर भूमि (Culturable wasteland)। 5. घास के मैदान (Grazing land)। 6. बंजर और अकृष्य भूमि (Barren and unculturable land)।
भूमि उपयोग की समस्याएँ: 1. बोया गया क्षेत्र और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में स्थान की समस्या। 2. वनों की कटाई। 3. मृदा अपरदन। 4. भूमि क्षरण।
भारत की सकल कृषित भूमि (gross cropped area) दुनिया में सबसे अधिक है। भारत की लगभग 43 प्रतिशत भूमि समतल है, लगभग 30 प्रतिशत पहाड़ी है और लगभग 27 प्रतिशत पठारी है।
मृदा अपरदन (Soil Erosion) मिट्टी के ऊपरी उपजाऊ भाग के हट जाने की प्रक्रिया है। मृदा अपरदन के मुख्य कारण:
अपरदन के प्रकार: 1. ढलान अपरदन (Gully erosion): बारिश के पानी से गहरी नालियाँ बनना। 2. तटीय अपरदन (Coastal erosion): लहरों द्वारा तट का कटाव। 3. अपरदन की गहराई के आधार पर विभिन्न प्रकार।
मृदा संरक्षण के उपाय: 1. वृक्षारोपण (Afforestation): अधिक से अधिक पेड़ लगाना। 2. समोच्च जुताई (Contour ploughing): ढलान के आर-पार जुताई। 3. पट्टीदार कृषि (Strip cropping): विभिन्न फसलों की पट्टियाँ। 4. बाँध बनाना (Terrace farming): ढलानों पर सीढ़ीनुमा खेत। 5. मेड़बंदी (Contour bunding): मिट्टी के बाँध। 6. चराई का नियंत्रण।
भारत में कई प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं, जिनके आधार पर कृषि का विकास होता है:
| आधार | प्रकार | उदाहरण |
|---|---|---|
| उत्पत्ति | जैव / अजैव | वन / खनिज |
| नवीकरणीयता | नवीकरणीय / अनवीकरणीय | सौर ऊर्जा / कोयला |
| स्वामित्व | व्यक्तिगत / सामुदायिक / राष्ट्रीय / अंतर्राष्ट्रीय | बाग / पार्क / खनिज / महासागर |
| विकास अवस्था | वास्तविक / संभावित / भंडार / आरक्षित | उपयोग में / पवन ऊर्जा / हाइड्रोजन / जलाशय |
| उपाय | विवरण |
|---|---|
| वृक्षारोपण | पेड़ लगाकर मिट्टी का कटाव रोकना |
| समोच्च जुताई | ढलान के आर-पार जुताई |
| पट्टीदार कृषि | फसलों की पट्टियाँ बनाना |
| सीढ़ीनुमा खेती | ढलानों पर खेत बनाना |
| मेड़बंदी | मिट्टी के बाँध |
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1972 | स्टॉकहोम सम्मेलन |
| 1992 | रियो पृथ्वी सम्मेलन |
| 1997 | क्योटो प्रोटोकॉल |
| 2015 | संयुक्त राष्ट्र SDGs |
संसाधन और विकास अध्याय हमें संसाधनों की पहचान, वर्गीकरण और संरक्षण के बारे में सिखाता है। संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और संसाधन नियोजन ही सतत विकास की कुंजी है। भूमि और मृदा हमारे जीवन का आधार हैं, इसलिए मृदा संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। यह अध्याय हमें बताता है कि संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से पर्यावरणीय संकट उत्पन्न होता है, इसलिए हमें संसाधनों का संरक्षण करना चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना ही सच्चा विकास है।