Comprehensive theory, key formulas, diagrams, and memory aids for लेन-देनों का अभिलेखन - II.
पहले अध्याय में हमने सीखा कि सभी लेन-देन जर्नल में अभिलेखित होते हैं। परंतु जब व्यवसाय का आकार बढ़ता है, तो सभी लेन-देनों को एक ही जर्नल में लिखना असुविधाजनक हो जाता है। इसलिए विशेष प्रकार के लेन-देनों को अलग-अलग सहायक पुस्तकों में वर्गीकृत कर दिया जाता है। इन्हें 'विशेष प्रयोजन पुस्तकें' या 'उप-पुस्तकें' (Subsidiary Books) कहते हैं। इस अध्याय में रोकड़ बही, क्रय बही, विक्रय बही, क्रय वापसी बही, विक्रय वापसी बही, रोकड़-संचित बही तथा खाताबही (Ledger) का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा।
विशेष प्रयोजन पुस्तकों के प्रमुख लाभ:
रोकड़ बही वह पुस्तक है जिसमें व्यवसाय के सभी नकद लेन-देनों को अभिलेखित किया जाता है। यह जर्नल की विशेष पुस्तक है, क्योंकि इसमें नकद खाता और बैंक खाता दोनों के रूप में प्रविष्टियाँ होती हैं। रोकड़ बही एक साथ जर्नल और खाताबही दोनों का कार्य करती है, इसलिए इसे 'जर्नल एवं खाताबही का मिश्रण' भी कहा जाता है।
क्रय बही में केवल उधार (क्रेडिट) पर किए गए माल की क्रय को अभिलेखित किया जाता है। नकद क्रय रोकड़ बही में लिखा जाता है। क्रय बही का प्रमाण चालान (Invoice) होता है। महीने के अंत में क्रय बही का योग क्रय खाते के नामे किया जाता है।
| तिथि | विवरण | चालान संख्या | L.F. | राशि |
|---|---|---|---|---|
विक्रय बही में केवल उधार पर किए गए माल की विक्रय को अभिलेखित किया जाता है। नकद विक्रय रोकड़ बही में लिखी जाती है। महीने के अंत में विक्रय बही का योग विक्रय खाते के जमा किया जाता है।
जब व्यवसाय द्वारा क्रय किया गया माल विक्रेता को लौटाया जाता है, तो उसे क्रय वापसी बही (या विक्रय वापसी बही) में लिखा जाता है। इसका प्रमाण डेबिट नोट होता है। अंत में योग को 'क्रय वापसी खाते' के जमा किया जाता है।
जब क्रेता द्वारा व्यवसाय को माल वापस किया जाता है, तो उसे विक्रय वापसी बही में लिखा जाता है। इसका प्रमाण क्रेडिट नोट होता है। अंत में योग 'विक्रय वापसी खाते' के नामे किया जाता है।
छोटे-मोटे व्ययों (जैसे डाक टिकट, टिफिन, छोटे सामान) के लिए रोकड़-संचित बही का उपयोग किया जाता है। इसका प्रभारी 'रोकड़-संचित रखवाला' (Petty Cashier) होता है। इसमें 'किराया पद्धति' (Imprest System) का उपयोग होता है, जिसमें पहले एक निश्चित राशि (जैसे 500 रुपये) दी जाती है और खर्च होने पर उसी राशि की पूर्ति कर दी जाती है।
खाताबही वह पुस्तक है जिसमें जर्नल की सभी प्रविष्टियों को विभिन्न खातों में वर्गीकृत करके अभिलेखित किया जाता है। इसे 'अंतिम पुस्तक' (Principal Book) भी कहते हैं। खाताबही में प्रत्येक खाते के दो पक्ष होते हैं - नामे का पक्ष (बायाँ) और जमा का पक्ष (दायाँ)।
किसी खाते में नामे पक्ष का योग और जमा पक्ष का योग जब समान नहीं होता, तो उनका अंतर 'शेष' (Balance) कहलाता है: - यदि नामे का योग अधिक है, तो 'नामे का शेष' (Debit Balance)। - यदि जमा का योग अधिक है, तो 'जमा का शेष' (Credit Balance)।
| आधार | जर्नल | खाताबही |
|---|---|---|
| नाम | आगम पुस्तक | अंतिम पुस्तक |
| क्रम | तिथि क्रम | वर्गीकृत |
| विवरण | विस्तृत नैरेशन | संक्षिप्त |
| उपयोग | प्रारंभिक अभिलेख | स्थिति का ज्ञान |
| पुस्तक | लेन-देन | प्रमाण दस्तावेज |
|---|---|---|
| रोकड़ बही | नकद लेन-देन | रसीद, वाउचर |
| क्रय बही | उधार क्रय | चालान (Invoice) |
| विक्रय बही | उधार विक्रय | चालान (Invoice) |
| क्रय वापसी बही | माल की वापसी (क्रय) | डेबिट नोट |
| विक्रय वापसी बही | माल की वापसी (विक्रय) | क्रेडिट नोट |
| रोकड़-संचित बही | छोटे व्यय | वाउचर |
| प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| एक स्तंभीय | केवल नकद |
| द्वि-स्तंभीय | नकद और बैंक |
| त्रि-स्तंभीय | नकद, बैंक और बट्टा |
| रोकड़-संचित | छोटे व्यय, किराया पद्धति |
| आधार | जर्नल | खाताबही |
|---|---|---|
| पुस्तक का प्रकार | प्रारंभिक पुस्तक | अंतिम पुस्तक |
| अभिलेखन प्रणाली | तिथि क्रम | खातेवार |
| विवरण | नैरेशन सहित | संक्षिप्त |
| शेष का ज्ञान | संभव नहीं | प्रत्येक खाते का शेष |
graph TD
A["लेन-देनों का अभिलेखन - II"] --> B["सहायक पुस्तकें"]
B --> C["रोकड़ बही"]
B --> D["क्रय बही"]
B --> E["विक्रय बही"]
B --> F["क्रय वापसी बही"]
B --> G["विक्रय वापसी बही"]
B --> H["रोकड़-संचित बही"]
C --> C1["नकद प्राप्ति नामे"]
C --> C2["नकद भुगतान जमा"]
C --> C3["प्रकार: एक/द्वि/त्रि स्तंभ"]
D --> D1["उधार क्रय (चालान)"]
E --> E1["उधार विक्रय (चालान)"]
F --> F1["डेबिट नोट"]
G --> G1["क्रेडिट नोट"]
H --> H1["किराया पद्धति"]
H --> H2["रोकड़-संचित रखवाला"]
A --> I["खाताबही (अंतिम पुस्तक)"]
I --> I1["वर्गीकरण"]
I --> I2["शेष का ज्ञान"]
I --> I3["तलपट का आधार"]
लेन-देनों का अभिलेखन विशेष प्रयोजन पुस्तकों के माध्यम से अधिक सुव्यवस्थित और कुशल हो जाता है। रोकड़ बही, क्रय-विक्रय बही, वापसी बहियाँ तथा रोकड़-संचित बही विभिन्न प्रकार के लेन-देनों को अलग कर लेखांकन को सरल बनाती हैं। इन सबका अंतिम गंतव्य खाताबही है, जो आगे चलकर तलपट और वित्तीय विवरणों का आधार बनती है। इस अध्याय का पूर्ण ज्ञान लेखांकन की व्यावहारिक समझ के लिए अनिवार्य है।