जीव विज्ञान (Biology) शब्द की उत्पत्ति दो ग्रीक शब्दों से हुई है - 'बायोस' (Bios) जिसका अर्थ है जीवन, और 'लोगोस' (Logos) जिसका अर्थ है अध्ययन। इस प्रकार जीव विज्ञान जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है। हमारे चारों ओर जीवों की अत्यधिक विविधता पाई जाती है। जीवों की इस विविधता को पहचानना, उनके नामकरण करना और उन्हें वर्गीकृत करना जीव विज्ञान का प्रमुख कार्य है। जीवों की इस विशाल विविधता को बायोडाइवर्सिटी (जैव विविधता) कहा जाता है। वर्तमान समय में हमारे ग्रह पर लगभग 1.4 से 1.8 मिलियन प्रजातियों का नामकरण किया जा चुका है, परंतु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पृथ्वी पर वास्तविक प्रजातियों की संख्या 20 से 50 मिलियन तक हो सकती है।
पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्रकार के जीवों, उनके बीच के अंतर तथा उनके आवासों की समग्रता को जैव विविधता कहते हैं। जैव विविधता का अध्ययन निम्नलिखित प्रमुख पहलुओं पर आधारित है:
प्रत्येक जीव को उसकी पहचान करने के लिए एक निश्चित नाम दिया जाता है। इस नामकरण की प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन किया जाता है। कैरोलस लिनियस ने सबसे पहले नामकरण की एक व्यवस्थित प्रणाली स्थापित की।
किसी जीव की सही पहचान करना आवश्यक होता है। एक जीव की पहचान उसकी विभिन्न विशेषताओं जैसे आकार, संरचना, आकृति, रंग आदि के आधार पर की जाती है। पहचान के लिए साहित्यिक संदर्भ जैसे 'फ्लोरा', 'मोनोग्राफ' और 'मैनुअल' का उपयोग किया जाता है।
समान विशेषताओं वाले जीवों को एक समूह में रखने की प्रक्रिया को वर्गीकरण कहते हैं। वर्गीकरण से जीवों के अध्ययन में सुविधा होती है। एक जीवशास्त्री जीवों के विभिन्न समूहों का अध्ययन करता है जैसे टैक्सोनोमी, सिस्टेमैटिक्स आदि। टैक्सोनोमी (Taxonomy) जीवों की विशेषताओं के आधार पर उनकी पहचान, वर्गीकरण और नामकरण का अध्ययन करती है। सिस्टेमैटिक्स (Systematics) वर्गीकरण का वैज्ञानिक अध्ययन है जो विभिन्न विकासीय संबंधों को भी ध्यान में रखता है।
जीवों में पाई जाने वाली कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
सभी जीवों में वृद्धि होती है। बहुकोशिकीय जीवों में वृद्धि कोशिका विभाजन द्वारा होती है, जबकि एककोशिकीय जीवों में वृद्धि कोशिका के आकार में वृद्धि के रूप में होती है। पादपों में वृद्धि सम्पूर्ण जीवन में जारी रहती है, जबकि प्राणियों में एक निश्चित आयु तक ही वृद्धि होती है। निर्जीव वस्तुओं में भी बाह्य रूप से वृद्धि दिखाई देती है, परंतु वह आंतरिक रूप से नहीं होती।
प्रजनन जीवों की वह विशेषता है जिसके द्वारा वे अपनी संतति उत्पन्न करते हैं। प्रजनन दो प्रकार का होता है - अलैंगिक प्रजनन (जिसमें एक ही माता-पिता से संतति उत्पन्न होती है) और लैंगिक प्रजनन (जिसमें दो जनकों की भागीदारी होती है)। जीवाणु, कवक और शैवाल जैसे सूक्ष्म जीव द्विखंडन, मुकुलन, बीजाणु निर्माण जैसी विधियों द्वारा अलैंगिक रूप से प्रजनन करते हैं। मनुष्य सहित अधिकांश उच्च जीव लैंगिक प्रजनन करते हैं। कुछ जीव जैसे हाइड्रा दोनों प्रकार से प्रजनन कर सकते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया, प्लास्टिड जैसे अंगक स्वयं के द्वारा विभाजित होकर नए अंगकों का निर्माण करते हैं।
जीवों के शरीर के अंदर होने वाली सभी रासायनिक अभिक्रियाओं का समूह चयापचय कहलाता है। चयापचय में अपचय (Catabolism) और उपचय (Anabolism) दोनों शामिल हैं। चयापचय की अभिक्रियाएँ जीवों द्वारा एंजाइम की सहायता से संपन्न होती हैं। जैविक अणुओं का निर्माण (संश्लेषण) उपचय कहलाता है, जबकि बड़े अणुओं का छोटे अणुओं में विघटन अपचय कहलाता है। कोई भी रासायनिक अभिक्रिया जो जीवों के भीतर होती है, चयापचय की श्रेणी में आती है।
सभी जीव बाह्य तथा आंतरिक उत्तेजनाओं के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं। पादपों में यह प्रतिक्रिया धीमी होती है जबकि प्राणियों में तीव्र होती है। पौधों में स्पर्श के प्रति छुईमुई के पौधे की प्रतिक्रिया एक प्रसिद्ध उदाहरण है। प्रकाश की ओर पादपों का झुकना भी इसी का उदाहरण है।
जीवों की आंतरिक पर्यावरण को स्थिर बनाए रखने की क्षमता को होमोस्टैसिस कहते हैं। शरीर का तापमान, pH, जल की मात्रा आदि को नियंत्रित रखना इसका उदाहरण है।
द्विपद नामकरण की प्रणाली का विकास कैरोलस लिनियस द्वारा किया गया था। इस प्रणाली के अनुसार प्रत्येक जीव का वैज्ञानिक नाम दो शब्दों से मिलकर बना होता है - पहला शब्द जीनस (Genus) को दर्शाता है और दूसरा शब्द स्पीशीज (Species) को। द्विपद नामकरण के नियम निम्नलिखित हैं:
उदाहरण: मनुष्य का वैज्ञानिक नाम 'होमो सैपियंस' (Homo sapiens) है। यहाँ 'होमो' जीनस है और 'सैपियंस' स्पीशीज है। मटर का वैज्ञानिक नाम 'पिसम सैटाइवम' है।
वर्गीकरण की प्रक्रिया में जीवों को विभिन्न श्रेणियों में रखा जाता है। इन श्रेणियों को वर्गिकी श्रेणियाँ या टैक्सोनमी श्रेणियाँ कहते हैं। प्रमुख वर्गिकी श्रेणियाँ उच्च से निम्न क्रम में निम्नलिखित हैं:
वर्गिकी की सबसे छोटी श्रेणी स्पीशीज है। स्पीशीज वह समूह है जिसमें मूल रूप से समान लक्षण वाले जीव होते हैं जो आपस में प्रजनन कर सकते हैं। एक स्पीशीज के जीव दूसरी स्पीशीज के जीवों से प्रजनन दृष्टि से अलग होते हैं। उदाहरण के लिए सोलेनम ट्यूबरोसम (आलू), सोलेनम मेलांगेना (बैंगन) अलग-अलग स्पीशीज हैं।
जीनस वर्गिकी की वह श्रेणी है जिसमें कई सम्बन्धित स्पीशीज एक साथ रखी जाती हैं। उदाहरण के लिए पैंथेरा जीनस में पैंथेरा लियो (शेर), पैंथेरा टाइग्रिस (बाघ), पैंथेरा पार्डस (तेंदुआ) आदि स्पीशीज सम्मिलित हैं।
कई सम्बन्धित जीनस मिलकर कुल का निर्माण करते हैं। उदाहरण के लिए फेलिडे कुल में बिल्ली, शेर, बाघ आदि के जीनस आते हैं। सोलेनसी कुल में सोलेनम, विदानिया, डाटूरा आदि जीनस आते हैं।
कई सम्बन्धित कुल मिलकर गण का निर्माण करते हैं। जैसे फेलिडे और कैनिडे कुल मिलकर कार्निवोरा गण बनाते हैं।
कई सम्बन्धित गण मिलकर वर्ग का निर्माण करते हैं। जैसे प्राइमेटा और कार्निवोरा गण मिलकर मैमेलिया वर्ग बनाते हैं।
कई सम्बन्धित वर्ग मिलकर संघ या विभाजन बनाते हैं। प्राणियों में इसे संघ (Phylum) तथा पादपों में विभाजन (Division) कहते हैं। जैसे मैमेलिया, एव्स, रेप्टिलिया आदि वर्ग मिलकर कॉर्डेटा संघ बनाते हैं।
वर्गिकी की सबसे बड़ी श्रेणी जगत है। पादप और प्राणी को अलग-अलग जगत में रखा जाता है। बाद में व्हिटेकर ने पाँच जगत वर्गीकरण का प्रस्ताव दिया।
| श्रेणी | मनुष्य | बाघ | आलू |
|---|---|---|---|
| जगत | ऐनिमेलिया | ऐनिमेलिया | प्लांटे |
| संघ/विभाजन | कॉर्डेटा | कॉर्डेटा | एंजियोस्पर्मे |
| वर्ग | मैमेलिया | मैमेलिया | डायकोटिलीडोनी |
| गण | प्राइमेटा | कार्निवोरा | सोलेनलेस |
| कुल | होमिनिडे | फेलिडे | सोलेनसी |
| वंश | होमो | पैंथेरा | सोलेनम |
| जाति | सैपियंस | टाइग्रिस | ट्यूबरोसम |
| विशेषता | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| वृद्धि | कोशिका विभाजन/आकार वृद्धि द्वारा | पादपों में जीवनपर्यंत |
| प्रजनन | संतति उत्पन्न करना | अलैंगिक और लैंगिक |
| चयापचय | रासायनिक अभिक्रियाओं का समूह | श्वसन, पाचन |
| उत्तेजनाओं की प्रतिक्रिया | बाह्य/आंतरिक प्रभावों का जवाब | छुईमुई का सिकुड़ना |
| होमोस्टैसिस | आंतरिक वातावरण का स्थायित्व | तापमान नियंत्रण |
इस अध्याय में हमने जीव जगत की मूल अवधारणाओं का अध्ययन किया - जैव विविधता, जीवों की विशेषताएँ, द्विपद नामकरण और वर्गिकी श्रेणियाँ। यह अध्याय जीव विज्ञान की नींव है, क्योंकि आगे के सभी अध्यायों में विभिन्न जीवों के अध्ययन के लिए वर्गीकरण की समझ आवश्यक होती है। वर्गिकी श्रेणियों का क्रम, द्विपद नामकरण के नियम और जीवों की विशेषताएँ - ये तीनों विषय परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस अध्याय की अवधारणाओं को आत्मसात करने से जैव विविधता के व्यवस्थित अध्ययन का आधार मजबूत होता है।