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1. परिचय

परमाणु स्वयं अस्थिर होते हैं, अतः वे अन्य परमाणुओं से जुड़कर स्थायी अणु या यौगिक बनाते हैं। परमाणुओं को एक-दूसरे से बाँधने वाले बल को रासायनिक आबंध (Chemical Bond) कहते हैं। इस आबंधन का मूल कारण संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं। 1916 में कोसेल तथा लुईस ने स्वतंत्र रूप से यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि परमाणु अपने बाह्यतम कोश में इलेक्ट्रॉन अष्टक (Octet) प्राप्त कर स्थायी होना चाहते हैं, जिसे अष्टक नियम कहते हैं। इस अध्याय में हम आयनिक आबंध, सहसंयोजक आबंध, लुईस संरचना, बंधन की कई सिद्धांत (VSEPR, VBT, MOT) तथा अणुओं की ज्यामिति का अध्ययन करेंगे।

2. कोसेल-लुईस दृष्टिकोण तथा अष्टक नियम

कोसेल ने समझाया कि धातुएँ इलेक्ट्रॉन त्यागकर तथा अधातुएँ इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके उत्कृष्ट गैस विन्यास प्राप्त करती हैं, जिससे आयनिक आबंध बनते हैं। लुईस ने बताया कि परमाणु इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी करके भी अष्टक पूर्ण कर सकते हैं, जिससे सहसंयोजक आबंध बनता है। अष्टक नियम के अनुसार संयोजी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन (हाइड्रोजन के लिए 2) प्राप्त करने पर परमाणु स्थायी हो जाता है। इस नियम के अपवाद हैं - हाइड्रोजन, बेरिलियम ($BeCl_2$ में 4 इलेक्ट्रॉन), बोरॉन ($BF_3$ में 6 इलेक्ट्रॉन), तथा विस्तारित अष्टक वाले तत्व ($PCl_5$ में फास्फोरस के 10 इलेक्ट्रॉन, $SF_6$ में सल्फर के 12 इलेक्ट्रॉन)।

लुईस संरचना में परमाणु के संयोजी इलेक्ट्रॉनों को बिंदुओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। आबंध बनाते समय इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी को एक रेखा से दर्शाया जाता है। उदाहरण के लिए $CO_2$ की लुईस संरचना में कार्बन दो ऑक्सीजन से द्वि-आबंध ($C=O$) द्वारा जुड़ा होता है।

3. आयनिक आबंध

आयनिक आबंध धनायन तथा ऋणायन के बीच स्थैतिक विद्युत आकर्षण से बनता है। यह तब बनता है जब एक परमाणु की आयनन एन्थैल्पी कम तथा दूसरे की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक होती है। $NaCl$ में सोडियम अपना एक संयोजी इलेक्ट्रॉन क्लोरीन को देकर $Na^+$ तथा $Cl^-$ आयन बनाता है। आयनिक यौगिकों के गुणधर्म - उच्च गलनांक तथा क्वथनांक (प्रबल आयनिक आकर्षण), कठोर होते हैं, गलित अवस्था या जलीय विलयन में विद्युत का चालन करते हैं, तथा भंगुर होते हैं। आयनिक आबंध में योगदान देने वाले कारक - धनायन की छोटी त्रिज्या, अधिक आवेश, तथा दोनों आयनों की छोटी त्रिज्याएँ।

4. सहसंयोजक आबंध

सहसंयोजक आबंध इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी से बनता है। जब दो परमाणु एक इलेक्ट्रॉन युग्म साझा करते हैं, तो एकल आबंध बनता है ($H_2$, $Cl_2$); दो युग्म साझा करने पर द्वि-आबंध ($O_2$, $CO_2$) तथा तीन युग्म पर त्रि-आबंध ($N_2$, $C_2H_2$) बनता है।

लुईस अम्ल-क्षार: वह अणु या आयन जो इलेक्ट्रॉन युग्म स्वीकार करता है (जैसे $H^+$, $AlCl_3$), लुईस अम्ल है, तथा जो दान करता है (जैसे $NH_3$, $H_2O$), लुईस क्षार है। इस आधार पर सहसंयोजक आबंध को आबंध-इलेक्ट्रॉन युग्म की साझेदारी कहा जाता है।

5. आबंध पैरामीटर

आबंध लंबाई: दो आबंधित परमाणुओं के नाभिकों के बीच की संतुलन दूरी। एकल आबंध द्वि-आबंध से लंबा तथा द्वि-आबंध त्रि-आबंध से लंबा होता है। $C-C$ (154 pm), $C=C$ (134 pm), $C \equiv C$ (120 pm)।

आबंध कोण: दो आबंधों के बीच का कोण, जो आण्विक ज्यामिति निर्धारित करता है।

आबंध एन्थैल्पी: एक मोल सहसंयोजक आबंधों को गैसीय अवस्था में तोड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा। द्वि-आबंध एकल आबंध से मजबूत होता है।

आबंध क्रम: आबंध क्रम = (बंधन इलेक्ट्रॉनों की संख्या - प्रति-बंधन इलेक्ट्रॉनों की संख्या) / 2। उच्च आबंध क्रम, आबंध की अधिक मजबूती तथा कम आबंध लंबाई को दर्शाता है।

आबंध ध्रुवता: जब दो परमाणुओं की विद्युत-ऋणात्मकता भिन्न होती है, तो साझा इलेक्ट्रॉन युग्म अधिक विद्युत-ऋणात्मक परमाणु की ओर खिंचता है और ध्रुवीय आबंध बनता है। अधिक विद्युत-ऋणात्मक परमाणु पर आंशिक ऋणावेश ($\delta^-$) तथा दूसरे पर आंशिक धनावेश ($\delta^+$) आ जाता है। द्विध्रुव आघूर्ण ($\mu = q \times d$) आबंध की ध्रुवता का माप है।

6. VSEPR सिद्धांत

VSEPR (वैलेंस शेल इलेक्ट्रॉन पेयर रिपल्शन) सिद्धांत के अनुसार अणु में संयोजी कोश के इलेक्ट्रॉन युग्म (आबंधन तथा अकेले) एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं और स्वयं को न्यूनतम प्रतिकर्षण की स्थिति में रखते हैं। अणु की ज्यामिति इलेक्ट्रॉन युग्मों की संख्या पर निर्भर करती है:

जब अकेले इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित होते हैं, तो वे अधिक स्थान घेरते हैं और आबंध कोणों को विकृत कर देते हैं। उदाहरण के लिए $NH_3$ में एक अकेला युग्म होने से कोण 107° तथा $H_2O$ में दो अकेले युग्मों से कोण 104.5° हो जाता है। अकेले युग्म-अकेले युग्म प्रतिकर्षण > अकेले युग्म-आबंधन युग्म > आबंधन-आबंधन।

7. संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT)

लिनस पॉलिंग द्वारा दिया गया संयोजकता आबंध सिद्धांत बताता है कि सहसंयोजक आबंध तब बनता है जब दो अर्ध-भरे कक्षक आपस में अतिव्यापन (Overlap) करते हैं। इसके मुख्य बिंदु:

सिग्मा ($\sigma$) आबंध सिरे-से-सिरे अतिव्यापन से बनता है। यह मजबूत होता है तथा नाभिकीय अक्ष के चारों ओर घूर्णन की अनुमति देता है। पाई ($\pi$) आबंध पार्श्विक अतिव्यापन से बनता है, कमजोर होता है तथा केवल सिग्मा आबंध के साथ ही बनता है। द्वि-आबंध = 1 सिग्मा + 1 पाई, त्रि-आबंध = 1 सिग्मा + 2 पाई।

8. संकरण (Hybridization)

संकरण वह प्रक्रिया है जिसमें समान ऊर्जा के परमाणु कक्षक मिलकर समान संख्या में समतुल्य नए कक्षक बनाते हैं। संकरण के प्रकार:

$\sigma$ आबंध की संख्या संकरण के बराबर होती है, अर्थात एक द्वि-आबंध में केवल एक सिग्मा आबंध संकरण में गिना जाता है। संकरण ज्ञात करने का सरल तरीका अकेले युग्मों को आबंधन युग्मों की तरह गिनना है, जिसे स्टेरिक संख्या कहते हैं।

9. आण्विक कक्षक सिद्धांत (MOT)

आण्विक कक्षक सिद्धांत के अनुसार परमाणु कक्षक मिलकर आण्विक कक्षक बनाते हैं, जिनमें इलेक्ट्रॉन पूरे अणु पर वितरित होते हैं। आण्विक कक्षकों की संख्या परमाणु कक्षकों के बराबर होती है। बंधन कक्षक (निम्न ऊर्जा) तथा प्रति-बंधन कक्षक (उच्च ऊर्जा) बनते हैं। स्थायित्व के लिए बंधन कक्षकों में अधिक इलेक्ट्रॉन होने चाहिए। यह सिद्धांत $O_2$ के अनुचुंबकीय व्यवहार की व्याख्या करता है, क्योंकि $O_2$ में दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अप्रतिबंधन कक्षकों में होते हैं। MOT यह भी बताता है कि $He_2$ स्थायी अणु नहीं है, क्योंकि बंधन तथा प्रति-बंधन इलेक्ट्रॉन समान होते हैं और आबंध क्रम शून्य होता है।

graph TD A["रासायनिक आबंधन"] --> B["आयनिक आबंध - कोसेल"] A --> C["सहसंयोजक आबंध - लुईस"] A --> D["धात्विक आबंध"] A --> E["हाइड्रोजन आबंध"] C --> F["VSEPR - ज्यामिति"] C --> G["VBT - अतिव्यापन, संकरण"] C --> H["MOT - आण्विक कक्षक"] F --> F1["CH4 - चतुष्फलकीय"] G --> G1["sp, sp2, sp3, sp3d, sp3d2"] H --> H1["O2 अनुचुंबकीय"]

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

अणु इलेक्ट्रॉन युग्म संकरण ज्यामिति कोण
BeCl2 2 sp रैखिक 180°
BF3 3 sp² त्रिकोणीय समतलीय 120°
CH4 4 sp³ चतुष्फलकीय 109.5°
NH3 4 (1 अकेला) sp³ पिरामिडीय 107°
H2O 4 (2 अकेले) sp³ कोणीय 104.5°
PCl5 5 sp³d त्रिकोणीय द्विपिरामिडीय 90°, 120°
SF6 6 sp³d² अष्टफलकीय 90°
आबंध सिग्मा/पाई मजबूती लंबाई (C-C)
एकल आबंध 1 सिग्मा कमजोर 154 pm
द्वि-आबंध 1 सिग्मा + 1 पाई मध्यम 134 pm
त्रि-आबंध 1 सिग्मा + 2 पाई सबसे मजबूत 120 pm

माइंड मैप

graph TD A["आण्विक संरचना निर्धारण"] --> B["लुईस संरचना लिखें"] B --> C["स्टेरिक संख्या ज्ञात करें"] C --> D["संकरण तय करें"] D --> E["VSEPR से ज्यामिति"] E --> F["ध्रुवता की जाँच करें"] F --> G["द्विध्रुव आघूर्ण"] E --> H["पाई आबंध की संख्या"] H --> I["आबंध क्रम"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आण्विक ज्यामिति - VSEPR रैखिक BeCl₂ 180° त्रिकोणीय समतलीय BF₃ 120° चतुष्फलकीय CH₄ 109.5° कोणीय H₂O 104.5° स्वर्ण नियम अकेले इलेक्ट्रॉन युग्म कोण को विकृत कर देते हैं: CH4=109.5°, NH3=107°, H2O=104.5°।
सिग्मा तथा पाई आबंध सिग्मा (σ) आबंध - सिरे से सिरे मजबूत, घूर्णन संभव पाई (π) आबंध - पार्श्विक कमजोर, केवल σ के साथ आबंध क्रम का सूत्र आबंध क्रम = (Nb - Na) / 2 Nb = बंधन इलेक्ट्रॉन, Na = प्रति-बंधन इलेक्ट्रॉन Golden Rule हर द्वि-आबंध में 1 सिग्मा + 1 पाई तथा हर त्रि-आबंध में 1 सिग्मा + 2 पाई होते हैं।

सामान्य गलतियाँ

  1. अष्टक नियम के अपवादों को भूलना: $BeCl_2$, $BF_3$, $PCl_5$, $SF_6$ जैसे अणु अष्टक नियम का पालन नहीं करते।
  2. σ और π आबंधों का जोड़ गलत करना: संकरण की संख्या σ आबंधों की संख्या के बराबर होती है, π आबंधों की नहीं।
  3. अकेले युग्म की उपेक्षा: VSEPR में अकेले युग्म भी ज्यामिति को प्रभावित करते हैं। $NH_3$ की ज्यामिति पिरामिडीय है, चतुष्फलकीय नहीं।
  4. ध्रुवीय अणु की पहचान: सममित अणु ($CO_2$, $CH_4$) में आबंध ध्रुवीय होने पर भी अणु अध्रुवीय हो सकता है, क्योंकि द्विध्रुव आघूर्ण निरस्त हो जाते हैं।
  5. आयनिक यौगिकों में विद्युत चालन: ठोस अवस्था में आयनिक यौगिक विद्युत का चालन नहीं करते; केवल गलित या जलीय अवस्था में करते हैं।
  6. $O_2$ की स्थायित्व: $O_2$ के लिए MOT की आण्विक कक्षक अवधारणा में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों को भूलना, जिससे अनुचुंबकत्व की व्याख्या नहीं होती।
  7. आबंध लंबाई का क्रम: त्रि-आबंध द्वि-आबंध से छोटा तथा द्वि-आबंध एकल से छोटा होता है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. ज्यामिति प्रश्न हल करने के लिए पहले लुईस संरचना लिखें, फिर अकेले युग्म गिनकर VSEPR लागू करें।
  2. संकरण ज्ञात करने के लिए σ आबंधों की संख्या + अकेले युग्म = संकरण की संख्या, यह सूत्र सदैव याद रखें।
  3. ध्रुवता के प्रश्नों में अणु की सममिति की जाँच करें - सममित अणु अध्रुवीय होते हैं।
  4. आबंध क्रम तथा अनुचुंबकत्व के प्रश्नों में MOT आरेख याद रखें ($O_2$ दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन)।
  5. द्विध्रुव आघूर्ण के मानों की तुलना: $NH_3$ > $NF_3$ वाले प्रश्न का अभ्यास करें।
  6. आयनिक तथा सहसंयोजक गुणधर्मों की तुलनात्मक प्रश्नों में गलनांक, चालन तथा घुलनशीलता पर ध्यान दें।
  7. संकरण युक्त अणुओं के कोण मान (109.5°, 120°, 180°, 107°, 104.5°) रट लें।

निष्कर्ष

इस अध्याय में हमने परमाणुओं के बीच बनने वाले आबंधों - आयनिक तथा सहसंयोजक - का अध्ययन किया। कोसेल-लुईस दृष्टिकोण, अष्टक नियम तथा लुईस संरचनाओं से आबंधन की मूल समझ विकसित हुई। VSEPR सिद्धांत अणुओं की ज्यामिति बताता है, संयोजकता आबंध सिद्धांत तथा संकरण आबंध के निर्माण की प्रक्रिया समझाते हैं, जबकि आण्विक कक्षक सिद्धांत आबंधन की सबसे उन्नत व्याख्या प्रस्तुत करता है। आबंध पैरामीटर - लंबाई, कोण, एन्थैल्पी, क्रम तथा ध्रुवता - अणुओं के गुणधर्म निर्धारित करते हैं। यह ज्ञान यौगिकों के भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्मों को समझने तथा भविष्यवाणी करने में सहायक होता है और यह अध्याय आगे के समस्त अध्यायों का वैचारिक आधार है।