आधुनिक रसायन विज्ञान में 118 ज्ञात तत्वों का अध्ययन करना अत्यंत कठिन होता यदि उन्हें सुव्यवस्थित रूप से वर्गीकृत न किया गया होता। तत्वों का वर्गीकरण उनके गुणधर्मों की आवर्तिता (Periodicity) के आधार पर किया जाता है। इस अध्याय में हम आवर्त सारणी के ऐतिहासिक विकास, आधुनिक आवर्त नियम, तत्वों का वर्गीकरण तथा परमाणु त्रिज्या, आयनन एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तथा विद्युत-ऋणात्मकता जैसे आवर्ती गुणधर्मों का अध्ययन करेंगे। इन गुणधर्मों की समझ से तत्वों के रासायनिक व्यवहार की भविष्यवाणी की जा सकती है।
डॉबेराइनर का त्रिक नियम (1817): डॉबेराइनर ने तत्वों को तीन-तीन के समूहों (त्रिकों) में व्यवस्थित किया, जिसमें मध्य तत्व का परमाणु द्रव्यमान अन्य दो तत्वों के परमाणु द्रव्यमानों का औसत होता था। उदाहरण के लिए लिथियम (7), सोडियम (23), पोटैशियम (39) के त्रिक में सोडियम का द्रव्यमान = (7+39)/2 = 23।
न्यूलैंड्स का अष्टक नियम (1865): न्यूलैंड्स ने तत्वों को परमाणु द्रव्यमान के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कर बताया कि प्रत्येक आठवाँ तत्व पहले तत्व के गुणधर्मों के समान होता है। यह नियम केवल कैल्शियम तक लागू होता था तथा भारी तत्वों के लिए विफल रहा।
मेंडलीफ का आवर्त नियम (1869): मेंडलीफ ने तत्वों के गुणधर्मों को उनके परमाणु द्रव्यमान का आवर्ती फलन माना। उन्होंने तत्वों को बढ़ते परमाणु द्रव्यमान के क्रम में व्यवस्थित कर तथा समान गुणधर्मों वाले तत्वों को एक साथ रखकर आवर्त सारणी का निर्माण किया। मेंडलीफ की सारणी की विशेषताएँ - अनदेखे तत्वों के लिए रिक्त स्थान छोड़ना (जैसे गैलियम, जर्मेनियम के लिए) तथा गुणधर्मों की सटीक भविष्यवाणी करना। उन्होंने कुछ स्थानों पर परमाणु द्रव्यमान के क्रम का उल्लंघन करके सही गुणधर्म वाले तत्व को सही स्थान दिया (जैसे कोबाल्ट-निकल, टेल्यूरियम-आयोडीन)। परंतु मेंडलीफ की सारणी में हाइड्रोजन के स्थान, समस्थानिकों की व्यवस्था तथा लैंथेनाइड/ऐक्टिनाइड की समस्या थी।
मोसले का आधुनिक आवर्त नियम (1913): मोसले ने सिद्ध किया कि तत्वों के गुणधर्म उनकी परमाणु संख्या (Z) के आवर्ती फलन होते हैं। इस नियम ने परमाणु द्रव्यमान की सभी त्रुटियों का समाधान किया।
आधुनिक आवर्त सारणी में तत्वों को आवर्त (Periods) तथा समूह (Groups) में व्यवस्थित किया गया है। सारणी में 7 आवर्त तथा 18 समूह होते हैं। इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर तत्वों को चार ब्लॉकों में बाँटा गया है:
किसी तत्व का ब्लॉक उसके अंतिम भरे जाने वाले कक्षक से निर्धारित होता है। आवर्त की संख्या उस तत्व की मुख्य क्वांटम संख्या (सबसे बाहरी कोश) से निर्धारित होती है। प्रथम आवर्त में 2 तत्व, द्वितीय तथा तृतीय आवर्त में 8-8 तत्व, चतुर्थ तथा पंचम आवर्त में 18-18 तत्व, षष्ठ आवर्त में 32 तत्व तथा सप्तम आवर्त अधूरा है।
परमाणु त्रिज्या परमाणु के केंद्र से उसके सबसे बाहरी कोश तक की दूरी है। परमाणु त्रिज्या की प्रवृत्ति:
परमाणु त्रिज्या के संबंधित अवधारणाओं में धात्विक त्रिज्या (दो धातु परमाणुओं के केंद्रों की आधी दूरी) तथा सहसंयोजक त्रिज्या (सहसंयोजक बंध में जुड़े परमाणुओं के केंद्रों की आधी दूरी) शामिल हैं। आयनिक त्रिज्या: धनायन हमेशा अपने मूल परमाणु से छोटा तथा ऋणायन हमेशा बड़ा होता है। उदाहरण के लिए $Na^+$ ($r = 102$ pm) $Na$ ($r = 186$ pm) से छोटा है, जबकि $Cl^-$ ($r = 181$ pm) $Cl$ ($r = 99$ pm) से बड़ा है।
आयनन एन्थैल्पी ($\Delta_{i}H$) वह ऊर्जा है जो गैसीय अवस्था के विलगित परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए आवश्यक होती है:
$$M(g) \rightarrow M^+(g) + e^-$$
किसी धातु से क्रमिक रूप से इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जाएँ क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय आयनन एन्थैल्पी कहलाती हैं। द्वितीय आयनन एन्थैल्पी हमेशा प्रथम से अधिक होती है, क्योंकि धनायन से इलेक्ट्रॉन निकालना कठिन होता है। उदाहरण के लिए $Mg$ के लिए द्वितीय आयनन एन्थैल्पी अत्यधिक उच्च होती है।
इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी ($\Delta_{eg}H$) वह ऊर्जा परिवर्तन है जब गैसीय परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन जुड़ता है:
$$X(g) + e^- \rightarrow X^-(g)$$
विद्युत-ऋणात्मकता किसी परमाणु की रासायनिक बंध में बंधन इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित करने की प्रवृत्ति है। मुल्लीकेन के अनुसार विद्युत-ऋणात्मकता आयनन एन्थैल्पी तथा इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का औसत है। पॉलिंग ने इसकी तुलनात्मक श्रेणी दी, जिसमें फ्लोरीन (4.0) सर्वाधिक विद्युत-ऋणात्मक तत्व है।
अन्य आवर्ती गुणधर्मों में धात्विक तथा अधात्विक चरित्र सम्मिलित हैं। धात्विक चरित्र आवर्त में घटता तथा समूह में बढ़ता है। ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, संयोजकता (s-ब्लॉक में 1-2, p-ब्लॉक में समूह संख्या) तथा रासायनिक आबंध की प्रकृति (धातु-अधातु अंतर के आधार पर) भी आवर्ती प्रवृत्तियाँ प्रदर्शित करती हैं। इसके अतिरिक्त रासायनिक गुणधर्मों में ऑक्साइडों की प्रकृति - क्षारकीय (s-ब्लॉक), उभयधर्मी, अम्लीय (p-ब्लॉक) - भी आवर्त सारणी में क्रमबद्ध रूप से परिवर्तित होती है।
| गुणधर्म | आवर्त में (बाएँ→दाएँ) | समूह में (ऊपर→नीचे) |
|---|---|---|
| परमाणु त्रिज्या | घटती है | बढ़ती है |
| आयनन एन्थैल्पी | बढ़ती है | घटती है |
| इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी | अधिक ऋणात्मक | कम ऋणात्मक |
| विद्युत-ऋणात्मकता | बढ़ती है | घटती है |
| धात्विक चरित्र | घटता है | बढ़ता है |
| अधात्विक चरित्र | बढ़ता है | घटता है |
| ब्लॉक | समूह | प्रकार |
|---|---|---|
| s-ब्लॉक | 1, 2 | क्षार धातु, क्षारीय मृदा धातु |
| p-ब्लॉक | 13-18 | धातु, अधातु, उपधातु |
| d-ब्लॉक | 3-12 | संक्रमण तत्व |
| f-ब्लॉक | लैंथेनाइड, ऐक्टिनाइड | आंतरिक संक्रमण तत्व |
इस अध्याय में हमने तत्वों के वर्गीकरण के विकास - डॉबेराइनर के त्रिक से लेकर मोसले के आधुनिक आवर्त नियम तक - का अध्ययन किया। आधुनिक आवर्त सारणी में तत्वों को परमाणु संख्या के बढ़ते क्रम में s, p, d, f ब्लॉकों में व्यवस्थित किया गया है। परमाणु त्रिज्या, आयनन एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तथा विद्युत-ऋणात्मकता जैसे गुणधर्म आवर्त तथा समूह में नियमित प्रवृत्तियाँ प्रदर्शित करते हैं। इन प्रवृत्तियों तथा अपवादों की समझ से किसी भी तत्व के रासायनिक गुणधर्मों की भविष्यवाणी संभव होती है। यह ज्ञान रासायनिक आबंधन तथा तत्वों की प्रतिक्रियाशीलता को समझने का आधार प्रदान करता है और सभी आगामी अध्यायों में आवर्ती प्रवृत्तियों के संदर्भ का कार्य करता है।