किसी रासायनिक अभिक्रिया में जब अभिकारक तथा उत्पादों की सांद्रताएँ समय के साथ परिवर्तित नहीं होतीं, तो उस अवस्था को रासायनिक साम्यावस्था कहते हैं। यह एक गतिशील अवस्था है जिसमें अग्र तथा प्रतीप दोनों अभिक्रियाएँ समान दर से चलती रहती हैं। साम्यावस्था केवल बंद तंत्र में ही प्राप्त होती है। इस अध्याय में हम साम्य स्थिरांक, ले-शातेलिये का सिद्धांत, अम्ल-क्षार साम्यावस्था, pH, बफर विलयन, आयनिक उत्पाद तथा विलेयता गुणनफल का अध्ययन करेंगे।
साम्यावस्था की विशेषताएँ: साम्यावस्था केवल बंद तंत्र में प्राप्त होती है, दोनों अभिक्रियाओं की दरें समान होती हैं, सांद्रताएँ स्थिर रहती हैं, तथा बाहरी परिस्थितियाँ बदलने पर साम्यावस्था का स्थान बदल सकता है। यह गतिशील होती है - अभिक्रिया रुकती नहीं, केवल शुद्ध परिवर्तन शून्य होता है।
भौतिक साम्यावस्था: वे साम्यावस्थाएँ जिनमें केवल भौतिक परिवर्तन होते हैं - ठोस-द्रव (पिघलना), द्रव-वाष्प (वाष्पीकरण), ठोस-वाष्प (उर्ध्वपातन) तथा विलेय-विलयन। इनमें ताप निश्चित होने पर भौतिक राशियाँ स्थिर रहती हैं।
रासायनिक साम्यावस्था: रासायनिक अभिक्रियाओं में प्राप्त साम्यावस्था। यह सजातीय (सभी अभिकारक-उत्पाद एक ही अवस्था में) या विषमांगी (भिन्न अवस्थाओं में) हो सकती है।
गैसीय अभिक्रिया $aA + bB \rightleftharpoons cC + dD$ के लिए साम्य स्थिरांक:
$$K_c = \frac{[C]^c[D]^d}{[A]^a[B]^b}$$
गैसीय अभिक्रियाओं में आंशिक दाबों के आधार पर $K_p$ ज्ञात होता है:
$$K_p = \frac{(p_C)^c(p_D)^d}{(p_A)^a(p_B)^b}$$
$K_p$ तथा $K_c$ में संबंध:
$$K_p = K_c (RT)^{\Delta n_g}$$
यहाँ $\Delta n_g$ गैसीय मोलों की संख्या में परिवर्तन है। साम्य स्थिरांक के मान से यह ज्ञात होता है कि साम्यावस्था पर उत्पादों की मात्रा अधिक है या अभिकारकों की। $K$ केवल ताप पर निर्भर करता है, अभिकारकों की प्रारंभिक सांद्रता पर नहीं।
अभिक्रिया बल्प (Reaction Quotient, Q): किसी भी अवस्था में गुणनफल अनुपात Q होता है। यदि $Q < K$, तो अभिक्रिया अग्र दिशा में आगे बढ़ेगी; यदि $Q > K$, तो प्रतीप दिशा में; तथा यदि $Q = K$, तो साम्यावस्था प्राप्त है।
ले-शातेलिये का सिद्धांत बताता है कि यदि साम्यावस्था पर किसी तंत्र पर बाह्य परिस्थितियों (सांद्रता, दाब, ताप) में परिवर्तन किया जाए, तो साम्यावस्था उस दिशा में विस्थापित होती है जो परिवर्तन का विरोध करती है।
हैबर की अमोनिया संश्लेषण विधि तथा कॉन्टैक्ट विधि (H2SO4 निर्माण) ले-शातेलिये सिद्धांत के महत्वपूर्ण औद्योगिक अनुप्रयोग हैं।
आरेनियस अवधारणा: अम्ल जल में $H^+$ (वास्तव में $H_3O^+$ हाइड्रोनियम) आयन तथा क्षार $OH^-$ आयन देते हैं।
ब्रॉन्स्टेड-लोरी अवधारणा: अम्ल प्रोटॉन ($H^+$) दान करता है, क्षार प्रोटॉन ग्रहण करता है। इस अवधारणा में संयुग्मी अम्ल-क्षार युग्म होते हैं। उदाहरण के लिए $HCl + H_2O \rightarrow H_3O^+ + Cl^-$ में $HCl/Cl^-$ तथा $H_3O^+/H_2O$ संयुग्मी युग्म हैं। जल उभयधर्मी (Amphoteric) है - यह अम्ल तथा क्षार दोनों की तरह व्यवहार कर सकता है।
लुईस अवधारणा: अम्ल इलेक्ट्रॉन युग्म स्वीकारकर्ता तथा क्षार इलेक्ट्रॉन युग्म दानकर्ता होता है। यह सबसे व्यापक अवधारणा है।
जल एक दुर्बल वैद्युत-अपघट्य है जो स्वयं आयनित होता है:
$$H_2O + H_2O \rightleftharpoons H_3O^+ + OH^-$$
जल का आयनिक उत्पाद:
$$K_w = [H_3O^+][OH^-] = 1.0 \times 10^{-14} \text{ (25°C पर)}$$
विलयनों की अम्लता या क्षारकता व्यक्त करने के लिए pH स्केल का प्रयोग होता है:
$$pH = -\log[H_3O^+]$$
$$pOH = -\log[OH^-]$$
$$pH + pOH = 14$$
उदासीन विलयन में $pH = 7$, अम्लीय में $pH < 7$ तथा क्षारीय में $pH > 7$। जल की आयनिक उत्पाद $K_w$ ताप के साथ बढ़ती है। किसी विलयन के $H_3O^+$ की सांद्रता तथा pH की गणना सामान्यतः पूर्ण आयनन वाले प्रबल अम्ल/क्षार तथा आंशिक आयनन वाले दुर्बल अम्ल/क्षार के लिए भिन्न विधियों से की जाती है।
दुर्बल अम्ल $HA$ के लिए:
$$HA + H_2O \rightleftharpoons H_3O^+ + A^-$$
$$K_a = \frac{[H_3O^+][A^-]}{[HA]}$$
दुर्बल क्षार $B$ के लिए वियोजन स्थिरांक $K_b$ इसी प्रकार परिभाषित होता है। $K_a$ एवं $K_b$ में संबंध:
$$K_a \times K_b = K_w$$
$K_a$ जितना बड़ा, अम्ल उतना प्रबल। अम्ल का वियोजन तनुता के साथ बढ़ता है (ओस्टवाल्ड का तनुता नियम)। वियोजन की मात्रा ($\alpha$) तथा $K_a$ में संबंध: $K_a = c\alpha^2$ (दुर्बल अम्ल के लिए)। अम्ल की प्रबलता ज्ञात करने के लिए $pK_a$ का प्रयोग होता है:
$$pK_a = -\log K_a$$
कम $pK_a$ का अर्थ अधिक प्रबल अम्ल।
लवणों का जल-अपघटन: प्रबल अम्ल-प्रबल क्षार के लवण तटस्थ ($pH=7$), प्रबल अम्ल-दुर्बल क्षार के लवण अम्लीय ($pH<7$, जैसे $NH_4Cl$), दुर्बल अम्ल-प्रबल क्षार के लवण क्षारीय ($pH>7$, जैसे $CH_3COONa$) तथा दुर्बल अम्ल-दुर्बल क्षार के लवणों का pH अम्ल तथा क्षार के $K_a$, $K_b$ पर निर्भर करता है।
बफर विलयन: ऐसे विलयन जो अम्ल या क्षार की थोड़ी मात्रा मिलाने पर भी अपना pH लगभग अपरिवर्तित रखते हैं। दो प्रकार - अम्लीय बफर (दुर्बल अम्ल + इसका लवण, जैसे $CH_3COOH/CH_3COONa$) तथा क्षारीय बफर (दुर्बल क्षार + इसका लवण, जैसे $NH_4OH/NH_4Cl$)। बफर का pH हैंडरसन-हेसलबेक समीकरण से ज्ञात होता है:
$$pH = pK_a + \log \frac{[\text{लवण}]}{[\text{अम्ल}]}$$
मानव रक्त एक प्राकृतिक बफर है जिसका pH लगभग 7.4 रहता है। बफर क्षमता उच्चतम होती है जब लवण तथा अम्ल की सांद्रता बराबर होती है, अर्थात $pH = pK_a$।
विलेयता गुणनफल ठोस के साथ संतृप्त विलयन में आयनों के सांद्रताओं का गुणनफल है। $AgCl \rightleftharpoons Ag^+ + Cl^-$ के लिए:
$$K_{sp} = [Ag^+][Cl^-]$$
अल्प विलेय लवणों के लिए $K_{sp}$ से विलेयता तथा विलेयता से $K_{sp}$ ज्ञात की जा सकती है। यदि आयनों का गुणनफल $K_{sp}$ से अधिक हो जाए, तो अवक्षेपण होता है। सामान्य आयन प्रभाव के कारण अल्प विलेय लवण की विलेयता कम हो जाती है। उदाहरण के लिए $NaCl$ की उपस्थिति में $AgCl$ की विलेयता घट जाती है।
| परिवर्तन | साम्यावस्था का विस्थापन |
|---|---|
| अभिकारक सांद्रता बढ़ाना | उत्पादों की ओर |
| उत्पाद सांद्रता बढ़ाना | अभिकारकों की ओर |
| दाब बढ़ाना | कम गैसीय मोल वाली दिशा |
| ताप बढ़ाना | ऊष्माशोषी दिशा |
| उत्प्रेरक | कोई विस्थापन नहीं |
| विलयन | pH | उदाहरण |
|---|---|---|
| अम्लीय | < 7 | HCl, CH3COOH |
| उदासीन | = 7 | शुद्ध जल |
| क्षारीय | > 7 | NaOH, NH4OH |
| अम्लीय बफर | pKa के निकट | CH3COOH/CH3COONa |
| क्षारीय बफर | pKb के निकट | NH4OH/NH4Cl |
इस अध्याय में हमने रासायनिक तथा आयनिक साम्यावस्था का अध्ययन किया। साम्य स्थिरांक $K_c$ तथा $K_p$ अभिक्रिया की सीमा निर्धारित करते हैं, जबकि अभिक्रिया बल्प Q साम्यावस्था की दिशा बताता है। ले-शातेलिये का सिद्धांत सांद्रता, दाब तथा ताप के प्रभाव को समझाता है, जिसका औद्योगिक महत्व है। आयनिक साम्यावस्था में अम्ल-क्षार की अवधारणाएँ, जल का आयनिक उत्पाद, pH स्केल, दुर्बल अम्ल-क्षार के वियोजन स्थिरांक, बफर विलयन तथा विलेयता गुणनफल सम्मिलित हैं। ये अवधारणाएँ जैविक तंत्रों, औद्योगिक प्रक्रमों तथा विश्लेषणात्मक रसायन में अत्यंत उपयोगी हैं तथा रेडॉक्स तथा वैद्युतरासायनिक अध्ययन का आधार हैं।