हाइड्रोकार्बन वे कार्बनिक यौगिक हैं जो केवल कार्बन तथा हाइड्रोजन से बने होते हैं। ये कार्बनिक रसायन की मूल श्रेणियाँ हैं, जिनसे अन्य कार्बनिक यौगिक व्युत्पन्न होते हैं। हाइड्रोकार्बन तीन मुख्य वर्गों में विभक्त हैं - संतृप्त (एल्केन), असंतृप्त (एल्कीन तथा एल्काइन) तथा सुगंधित (एरीन)। इनके सामान्य सूत्र क्रमशः $C_nH_{2n+2}$, $C_nH_{2n}$, $C_nH_{2n-2}$ तथा $C_nH_{2n-6}$ (बेंजीन के लिए) होते हैं। इस अध्याय में हम इनकी संरचना, नामकरण, विधियाँ, गुणधर्म तथा अभिक्रियाओं का अध्ययन करेंगे।
एल्केन संतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं जिनका सामान्य सूत्र $C_nH_{2n+2}$ है। इनमें केवल एकल आबंध ($C-C$ तथा $C-H$) होते हैं। इनका संकरण sp³ है तथा आबंध कोण लगभग 109.5° होता है।
प्रथम चार एल्केन - मेथेन ($CH_4$), एथेन ($C_2H_6$), प्रोपेन ($C_3H_8$), ब्यूटेन ($C_4H_{10}$)।
एल्केनों की विधियाँ: - वुर्ट्ज अभिक्रिया: हैलोऐल्केनों का सोडियम धातु की उपस्थिति में शुष्क ईथर में अभिक्रिया से बड़े एल्केन बनते हैं: $2CH_3Cl + 2Na \rightarrow CH_3CH_3 + 2NaCl$। - कोल्बे वैद्युत-अपघटन: पोटैशियम लवणों के विद्युत अपघटन से एल्केन बनते हैं। - कोलबे का वैद्युत संश्लेषण तथा हाइड्रोजनीकरण: एल्कीनों के निकल उत्प्रेरक पर हाइड्रोजनीकरण से एल्केन बनते हैं: $CH_2=CH_2 + H_2 \xrightarrow{Ni} CH_3CH_3$। - हैलोऐल्केन का अपचयन: जस्ता तथा अम्ल द्वारा।
एल्केनों के गुण: एल्केन अत्यंत कम अभिक्रियाशील होते हैं, इसलिए इन्हें 'पैराफिन' (कम स्नेह वाले) कहते हैं। ये जल में अविलेय होते हैं। इनकी अभिक्रियाएँ मुख्यतः मुक्त मूलक क्रियाविधि से होती हैं। एल्केनों की मुख्य अभिक्रियाएँ - दहन (जल तथा CO2 बनाना), हैलोजनीकरण (UV प्रकाश में), तथा ऊष्मा अपघटन (क्रैकिंग)।
एल्कीन असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं जिनका सामान्य सूत्र $C_nH_{2n}$ है तथा इनमें एक द्वि-आबंध होता है। द्वि-आबंध कार्बन का संकरण sp² है। एथीन ($CH_2=CH_2$) सबसे सरल एल्कीन है।
एल्कीनों की विधियाँ: - हैलोऐल्केन का निर्जलन (Dehydrohalogenation): क्षारकीय $KOH$ (ऐल्कोहॉलीक) से हैलोऐल्केन एल्कीन में परिवर्तित होते हैं। सायत्शेव का नियम - विलोपन में अधिक प्रतिस्थापित एल्कीन प्रमुख उत्पाद बनता है। - ऐल्कोहॉल का निर्जलीकरण: सांद्र $H_2SO_4$ से एल्कोहॉल एल्कीन बनाते हैं, जैसे एथेनॉल से एथीन। - ऐल्काइन का आंशिक हाइड्रोजनीकरण: लिंडलर उत्प्रेरक पर।
एल्कीनों की अभिक्रियाएँ: एल्कीन अत्यधिक अभिक्रियाशील होते हैं क्योंकि π आबंध कमजोर होता है। ये योगात्मक अभिक्रियाएँ करते हैं: - हाइड्रोजन योग (हाइड्रोजनीकरण): $CH_2=CH_2 + H_2 \rightarrow CH_3CH_3$ - हैलोजन योग: $CH_2=CH_2 + Br_2 \rightarrow CH_2BrCH_2Br$ (ब्रोमीन जल का रंगहीन होना एल्कीन का परीक्षण है) - हाइड्रोहैलोजन योग: $CH_2=CH_2 + HCl \rightarrow CH_3CH_2Cl$। असममित एल्कीनों पर मार्कोवनिकोव का नियम लागू होता है। - जल का योग (हाइड्रेशन): एल्कोहॉल बनते हैं। - ओज़ोनीकरण: द्वि-आबंध के स्थान की जाँच के लिए। - ऑक्सीकरण: KMnO4 से ग्लाइकॉल या कार्बोक्सिलिक अम्ल बनते हैं।
मार्कोवनिकोव का नियम: असममित एल्कीन में HX के जुड़ने पर हाइड्रोजन उस कार्बन से जुड़ता है जिसमें अधिक हाइड्रोजन होता है, तथा X कम हाइड्रोजन वाले कार्बन से। यह नियम स्थायी कार्बोधनायक के बनने पर आधारित है। उदाहरण - प्रोपीन + HBr → 2-ब्रोमोप्रोपेन (प्रमुख)।
एल्काइन असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं जिनका सामान्य सूत्र $C_nH_{2n-2}$ है तथा इनमें त्रि-आबंध होता है। त्रि-आबंध कार्बन का संकरण sp है। एथाइन ($HC \equiv CH$) सबसे सरल एल्काइन है, जिसे एसीटिलीन भी कहते हैं।
एथाइन की विधि: कैल्शियम कार्बाइड तथा जल से: $CaC_2 + 2H_2O \rightarrow C_2H_2 + Ca(OH)_2$।
एल्काइनों की अभिक्रियाएँ: त्रि-आबंध के कारण ये भी योगात्मक अभिक्रियाएँ करते हैं, परंतु एल्कीनों से कम तेजी से। $H_2$, $X_2$, $HX$ का योग होता है। ऐसीटिलीन की अम्लीय प्रकृति: एथाइन अमोनियाकल सिल्वर नाइट्रेट तथा क्यूप्रस क्लोराइड से क्रमशः सिल्वर एसीटिलाइड (श्वेत) तथा कॉपर एसीटिलाइड (लाल-भूरा) अवक्षेप देता है। यह अम्लीय हाइड्रोजन का परीक्षण है जो एल्कीन तथा एल्केन में नहीं होता। एथाइन के दहन से उच्च ताप (ऑक्सी-एसीटिलीन ज्वाला) प्राप्त होता है, जिसका उपयोग वेल्डिंग में होता है।
बेंजीन ($C_6H_6$) सबसे सरल सुगंधित हाइड्रोकार्बन है। 1825 में फैराडे ने इसकी खोज की। केकुले ने इसकी वलय संरचना प्रस्तावित की। बेंजीन की वास्तविक संरचना अनुनाद हाइब्रिड है। सभी छह C-C आबंध समान होते हैं। बेंजीन का संकरण sp² है तथा आबंध कोण 120°। बेंजीन की अनुनाद ऊर्जा अधिक होने के कारण यह योगात्मक की अपेक्षा इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ करता है:
बेंजीन में प्रतिस्थापक का निर्देशक प्रभाव: -OH, -NH2, -OCH3 जैसे समूह ऑर्थो/पैरा निर्देशक होते हैं (सक्रियकारक), जबकि -NO2, -CN, -COOH मेटा निर्देशक होते हैं (निष्क्रियकारक)। यह इलेक्ट्रॉन दान/खिंचाव पर निर्भर करता है।
टॉलूईन ($C_6H_5CH_3$) तथा ज़ाइलीन महत्वपूर्ण सुगंधित यौगिक हैं।
पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस हाइड्रोकार्बनों के मुख्य प्राकृतिक स्रोत हैं। कच्चा तेल विभिन्न हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण है, जिन्हें भिन्नात्मक आसवन द्वारा पृथक किया जाता है। प्राप्त अंश - पेट्रोलियम गैस, पेट्रोल (गैसोलीन), केरोसिन, डीजल, स्नेहक तेल, पैराफिन मोम तथा बिटुमेन। पेट्रोल की गुणवत्ता उसकी ऑक्टेन संख्या से मापी जाती है। क्रैकिंग प्रक्रिया में बड़े हाइड्रोकार्बनों को छोटे, अधिक उपयोगी हाइड्रोकार्बनों में तोड़ा जाता है। हाइड्रोकार्बनों के दहन से $CO_2$, जल तथा ऊर्जा मिलती है, किंतु अपूर्ण दहन से विषैली CO बनती है।
| श्रेणी | सामान्य सूत्र | संकरण | आबंध |
|---|---|---|---|
| एल्केन | CnH2n+2 | sp³ | केवल एकल |
| एल्कीन | CnH2n | sp² | एक द्वि |
| एल्काइन | CnH2n-2 | sp | एक त्रि |
| बेंजीन | C6H6 | sp² | अनुनाद वलय |
| अभिक्रिया | अभिकारक | उत्पाद |
|---|---|---|
| वुर्ट्ज | 2RX + 2Na | R-R + 2NaX |
| हाइड्रोजनीकरण | ऐल्कीन + H2 (Ni) | एल्केन |
| हैलोजन योग | एल्कीन + Br2 | डाइहैलाइड |
| नाइट्रीकरण | बेंजीन + HNO3 (H2SO4) | नाइट्रोबेंजीन |
| फ्रीडेल-क्राफ्ट्स | बेंजीन + RCl (AlCl3) | एल्किलबेंजीन |
इस अध्याय में हमने हाइड्रोकार्बनों - एल्केन, एल्कीन, एल्काइन तथा सुगंधित हाइड्रोकार्बनों - का अध्ययन किया। प्रत्येक श्रेणी की संरचना, सामान्य सूत्र, संकरण तथा विशिष्ट अभिक्रियाएँ भिन्न हैं। एल्केन संतृप्त तथा कम अभिक्रियाशील होते हैं, एल्कीन योगात्मक अभिक्रियाएँ करते हैं जिनमें मार्कोवनिकोव का नियम लागू होता है, एल्काइनों में अम्लीय हाइड्रोजन का गुण विशिष्ट है, तथा बेंजीन की अनुनाद स्थायित्व के कारण इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ होती हैं। पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस हाइड्रोकार्बनों के प्रमुख स्रोत हैं। ये सभी हाइड्रोकार्बन कार्बनिक रसायन के अन्य सभी यौगिकों के निर्माण का आधार हैं तथा ऊर्जा स्रोत के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।