रसायन विज्ञान (Chemistry) विज्ञान की वह शाखा है जो द्रव्य (Matter) की रचना, उसकी अवस्थाओं, उसके गुणधर्मों और द्रव्यों में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करती है। द्रव्य वह वस्तु है जिसका कुछ द्रव्यमान होता है और जो कुछ स्थान घेरती है। रसायन विज्ञान की यह शाखा मुख्यतः तीन क्षेत्रों में विभक्त है - भौतिक रसायन (Physical Chemistry), कार्बनिक रसायन (Organic Chemistry) और अकार्बनिक रसायन (Inorganic Chemistry)। इस अध्याय में हम द्रव्य के वर्गीकरण, उसके मापन, परमाणु एवं अणुओं के द्रव्यमान, मोल संकल्पना तथा रासायनिक संयोजन के नियमों का अध्ययन करेंगे। ये अवधारणाएँ सम्पूर्ण रसायन विज्ञान की नींव हैं, क्योंकि प्रत्येक गणनात्मक समस्या में द्रव्यमान, मोल और अभिक्रिया के सूत्रों का प्रयोग किया जाता है।
द्रव्य को उसकी रासायनिक संरचना के आधार पर तीन मुख्य भागों में वर्गीकृत किया जाता है - तत्व (Elements), यौगिक (Compounds) और मिश्रण (Mixtures)।
द्रव्य की अवस्थाओं के आधार पर भी वर्गीकरण किया जाता है - ठोस (निश्चित आकार एवं आयतन), द्रव (निश्चित आयतन, परिवर्तनशील आकार) और गैस (न तो निश्चित आकार, न ही निश्चित आयतन)। इसके अतिरिक्त द्रव्य के भौतिक गुणधर्मों जैसे द्रव्यमान, घनत्व, दाब, आयतन, तापमान आदि का अध्ययन भी इस अध्याय में किया जाता है। भौतिक गुणधर्मों को बिना रासायनिक संरचना परिवर्तित किए मापा जा सकता है, जबकि रासायनिक गुणधर्म नई रासायनिक संरचना का निर्माण करते हैं।
वैज्ञानिक मापनों को सुव्यवस्थित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर SI मात्रक (Système International d'Unités) का प्रयोग किया जाता है। इसके अंतर्गत द्रव्यमान का मात्रक किलोग्राम (kg), लंबाई का मीटर (m), समय का सेकंड (s), तापमान का केल्विन (K) तथा विद्युत धारा का ऐम्पियर (A) होता है। रसायन विज्ञान में प्रायः आयतन को लीटर (L) या घन मीटर ($m^3$) में तथा दाब को पास्कल (Pa), वायुमंडल (atm) या बार (bar) में मापा जाता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण मात्रक मोलरिटी से संबंधित मात्रकों के अतिरिक्त, वैज्ञानिक प्रयोगों में छोटी एवं बड़ी राशियों को व्यक्त करने के लिए SI उपसर्गों का उपयोग होता है, जैसे नैनो ($10^{-9}$), माइक्रो ($10^{-6}$), मिली ($10^{-3}$), किलो ($10^3$), मेगा ($10^6$) आदि। उदाहरणार्थ, 1 नैनोमीटर = $10^{-9}$ मीटर और 1 मेगाग्राम = $10^6$ ग्राम।
सटीक मापन के लिए सार्थक अंकों (Significant Figures) का भी विशेष महत्व है। सार्थक अंकों का नियम बताता है कि किसी संख्या में कौन-से अंक विश्वसनीय हैं। शून्य के सार्थकता के नियमों में दाएँ तरफ के शून्य तभी सार्थक होते हैं जब दशमलव बिंदु उपस्थित हो, तथा बीच के शून्य सदैव सार्थक होते हैं। जोड़ने-घटाने में परिणाम में उतने ही दशमलव स्थान रखे जाते हैं जितने सबसे कम सटीक संख्या में होते हैं, जबकि गुणा-भाग में सबसे कम सार्थक अंकों वाली संख्या के बराबर सार्थक अंक रखे जाते हैं।
रसायन विज्ञान की नींव पाँच मूलभूत नियमों पर आधारित है, जिन्हें रासायनिक संयोजन के नियम कहा जाता है।
द्रव्यमान संरक्षण का नियम: लवाइजिए के इस नियम के अनुसार, किसी भी रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान का न तो निर्माण होता है और न ही विनाश। अभिक्रिया से पहले तथा बाद में द्रव्यों का कुल द्रव्यमान सदैव समान रहता है। अर्थात अभिकारकों का कुल द्रव्यमान = उत्पादों का कुल द्रव्यमान।
स्थिर अनुपात का नियम: प्राउस्ट के इस नियम के अनुसार, किसी भी रासायनिक यौगिक में संघटक तत्व सदैव एक निश्चित द्रव्यमान अनुपात में उपस्थित रहते हैं। उदाहरण के लिए जल में हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन का द्रव्यमान अनुपात सदैव 1:8 रहता है, चाहे जल कहीं से भी प्राप्त किया गया हो।
गुणित अनुपात का नियम: डाल्टन के इस नियम के अनुसार, जब दो तत्व आपस में संयोग कर एक से अधिक यौगिक बनाते हैं, तो एक निश्चित द्रव्यमान वाले किसी एक तत्व से संयोग करने वाले दूसरे तत्व के द्रव्यमानों का अनुपात सदैव छोटी पूर्ण संख्याओं का होता है। उदाहरण के लिए कार्बन एवं ऑक्सीजन से बनने वाले यौगिकों $CO$ तथा $CO_2$ में, कार्बन के समान द्रव्यमान से संयोग करने वाली ऑक्सीजन की मात्राओं का अनुपात 1:2 है।
व्युत्क्रम अनुपात का नियम: रिक्टर तथा वेन्जेल के अनुसार, जब दो तत्व A तथा B अलग-अलग तीसरे तत्व C के समान द्रव्यमान से संयोग करते हैं, तो उनके द्रव्यमानों का अनुपात वही होता है, जो A और B के आपस में संयोग करने पर होता है।
गैसीय आयतनों का नियम: गे-लुसाक के इस नियम के अनुसार, स्थिर ताप एवं दाब पर गैसें सदैव सरल पूर्णांक अनुपात में आयतनों के रूप में अभिक्रिया करती हैं। उदाहरण के लिए हाइड्रोजन के 2 आयतन तथा ऑक्सीजन के 1 आयतन से जलवाष्प के 2 आयतन बनते हैं, अर्थात 2:1:2।
1808 में जॉन डाल्टन ने परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जो रासायनिक संयोजन के नियमों की व्याख्या करता है। इसके मुख्य अभिगृहीत इस प्रकार हैं - सभी द्रव्य अत्यंत सूक्ष्म, अविभाज्य कणों परमाणुओं से मिलकर बने होते हैं। एक तत्व के सभी परमाणुओं के द्रव्यमान तथा रासायनिक गुणधर्म समान होते हैं। भिन्न तत्वों के परमाणु भिन्न-भिन्न होते हैं। रासायनिक अभिक्रिया में परमाणु न तो सर्जित होते हैं और न ही नष्ट होते हैं, बल्कि केवल पुनर्व्यवस्थित होते हैं। यौगिकों का निर्माण छोटी पूर्ण संख्याओं के अनुपात में परमाणुओं के संयोजन से होता है।
यद्यपि यह सिद्धांत रासायनिक संयोजन के नियमों की सफलतापूर्वक व्याख्या करता है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ हैं। डाल्टन के अनुसार परमाणु अविभाज्य है, किंतु आधुनिक विज्ञान ने सिद्ध किया कि परमाणु में इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन होते हैं, अर्थात परमाणु विभाज्य है। इसके अतिरिक्त समस्थानिकों (Isotopes) की खोज से यह भी सिद्ध हुआ कि एक ही तत्व के सभी परमाणुओं के द्रव्यमान समान नहीं होते।
परमाणुओं के द्रव्यमान अत्यंत सूक्ष्म होते हैं, अतः इन्हें सीधे ग्राम में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इसलिए इन्हें सापेक्ष मात्रकों में व्यक्त किया जाता है। परमाणु द्रव्यमान इकाई (u) को कार्बन-12 समस्थानिक के द्रव्यमान के 1/12वें भाग के रूप में परिभाषित किया गया है।
$$1 \text{ u} = \frac{1}{12} \times \text{ एक }^{12}C \text{ परमाणु का द्रव्यमान}$$
इस प्रकार किसी तत्व का परमाणु द्रव्यमान उस तत्व के एक परमाणु के द्रव्यमान का $^{12}C$ परमाणु के द्रव्यमान के 1/12वें भाग से अनुपात है। औसत परमाणु द्रव्यमान की गणना तत्व के सभी समस्थानिकों के द्रव्यमानों को उनकी प्रचुरता (Abundance) से गुणा कर योग करने पर प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए क्लोरीन के दो समस्थानिक $^{35}Cl$ (75.77%) तथा $^{37}Cl$ (24.23%) हैं, अतः इसका औसत परमाणु द्रव्यमान 35.5 u प्राप्त होता है।
आणविक द्रव्यमान किसी अणु में उपस्थित सभी परमाणुओं के परमाणु द्रव्यमानों का योग होता है। उदाहरण के लिए $H_2SO_4$ का आणविक द्रव्यमान = $2 \times 1 + 32 + 4 \times 16 = 98$ u। उन यौगिकों के लिए जो आयनिक प्रकृति के होते हैं, सूत्र इकाई द्रव्यमान का प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए $NaCl$ का सूत्र इकाई द्रव्यमान = $23 + 35.5 = 58.5$ u।
मोल पदार्थ की वह मात्रा है जिसमें कणों (परमाणु, अणु, आयन) की संख्या $^{12}C$ के ठीक 0.012 kg (12 g) में उपस्थित परमाणुओं की संख्या के बराबर होती है। इस संख्या को आवोगाद्रो स्थिरांक ($N_A$) कहते हैं, जिसका मान $6.022 \times 10^{23}$ है। किसी पदार्थ के एक मोल का ग्राम में द्रव्यमान उसका मोलर द्रव्यमान (M) कहलाता है, जो संख्यात्मक रूप से परमाणु या आणविक द्रव्यमान के बराबर होता है।
मोलों की संख्या ज्ञात करने के सूत्र:
$$n = \frac{m}{M} = \frac{N}{N_A} = \frac{V}{22.4 \text{ L}}$$
यहाँ $n$ मोलों की संख्या, $m$ दिया गया द्रव्यमान, $M$ मोलर द्रव्यमान, $N$ कणों की संख्या, $N_A$ आवोगाद्रो संख्या तथा $V$ गैस का आयतन (STP पर) है। STP पर किसी भी गैस का एक मोल 22.4 लीटर आयतन घेरता है। इसके अतिरिक्त प्रतिशत संघटन से यौगिक में प्रत्येक तत्व का प्रतिशत द्रव्यमान ज्ञात किया जाता है, और अनुभवजन्य सूत्र (Empirical Formula) परमाणुओं का सरलतम पूर्णांक अनुपात तथा अणुसूत्र (Molecular Formula) परमाणुओं की वास्तविक संख्या प्रदर्शित करता है। दोनों में संबंध निम्न है:
$$n = \frac{\text{आणविक द्रव्यमान}}{\text{अनुभवजन्य सूत्र द्रव्यमान}}$$
रासायनिक समीकरण संतुलित होने चाहिए, जिससे द्रव्यमान संरक्षण का नियम संतुष्ट होता है। स्टाइकियोमिति रासायनिक अभिक्रिया में अभिकारकों एवं उत्पादों की मात्राओं के बीच के संबंध का अध्ययन है। रासायनिक समीकरण में गुणांक (Coefficients) अणुओं की संख्या को प्रदर्शित करते हैं, जिनसे अभिकारकों तथा उत्पादों के मोल अनुपात ज्ञात होते हैं।
सीमांत अभिकर्मक (Limiting Reagent) वह अभिकर्मक है जो सबसे पहले पूर्ण रूप से व्यय हो जाता है और अभिक्रिया में बनने वाले उत्पाद की मात्रा को निर्धारित करता है। उदाहरण के लिए, जब 2 मोल $H_2$ तथा 1 मोल $O_2$ अभिक्रिया करते हैं, तो यदि $O_2$ अपूर्ण मात्रा में हो, तो $O_2$ सीमांत अभिकर्मक होगा। जब अभिक्रिया में वास्तव में प्राप्त उत्पाद की मात्रा, सैद्धांतिक रूप से परिकलित मात्रा से कम होती है, तो उनके अनुपात को प्रतिशत लब्धि (Percentage Yield) कहते हैं:
$$\text{प्रतिशत लब्धि} = \frac{\text{वास्तविक लब्धि}}{\text{सैद्धांतिक लब्धि}} \times 100$$
किसी विलयन में उपस्थित विलेय की मात्रा को व्यक्त करने की विभिन्न विधियाँ हैं। मोलरता (Molarity, M) प्रति लीटर विलयन में उपस्थित विलेय के मोलों की संख्या है। मोललता (Molality, m) प्रति किलोग्राम विलायक में उपस्थित विलेय के मोलों की संख्या है। मोल-अंश (Mole Fraction, $x$) विलेय के मोलों का कुल मोलों से अनुपात है। प्रतिशत संघटन द्रव्यमान प्रतिशत या आयतन प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है। मोलरता का तापमान पर निर्भर होना इसकी मुख्य सीमा है, जबकि मोललता तथा मोल-अंश तापमान से स्वतंत्र हैं।
| अवधारणा | सूत्र / परिभाषा | उदाहरण / मान |
|---|---|---|
| परमाणु द्रव्यमान इकाई (u) | $^{12}C$ के द्रव्यमान का 1/12 | 1 u |
| आवोगाद्रो संख्या ($N_A$) | एक मोल में कणों की संख्या | $6.022 \times 10^{23}$ |
| मोलों की संख्या | $n = m/M$ | 52 g He में $52/4 = 13$ मोल |
| STP पर गैस का मोलर आयतन | $22.4$ L | 1 मोल गैस |
| मोलरता | $M = n/V$ (लीटर में) | 0.5 M विलयन |
| मोललता | $m = n/\text{विलायक kg}$ | 1 m विलयन |
| प्रतिशत लब्धि | वास्तविक / सैद्धांतिक × 100 | 80% |
| नियम | प्रतिपादक | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| द्रव्यमान संरक्षण का नियम | लवाइजिए | द्रव्यमान निर्मित या नष्ट नहीं होता |
| स्थिर अनुपात का नियम | प्राउस्ट | तत्व निश्चित द्रव्यमान अनुपात में |
| गुणित अनुपात का नियम | डाल्टन | द्रव्यमान अनुपात छोटी पूर्ण संख्या |
| गैसीय आयतनों का नियम | गे-लुसाक | आयतन सरल पूर्णांक अनुपात में |
| व्युत्क्रम अनुपात का नियम | रिक्टर | तीसरे तत्व से अनुपात में समानता |
इस अध्याय में हमने रसायन विज्ञान की मूलभूत अवधारणाओं - द्रव्य का वर्गीकरण, SI मात्रक, रासायनिक संयोजन के नियम, डाल्टन का परमाणु सिद्धांत, परमाणु एवं आणविक द्रव्यमान, मोल संकल्पना, स्टाइकियोमिति तथा सांद्रण के मात्रकों - का अध्ययन किया। ये अवधारणाएँ रसायन विज्ञान की सभी शाखाओं की नींव हैं और इनके बिना उच्च कक्षाओं में किसी भी गणना को समझना कठिन है। मोल संकल्पना तथा स्टाइकियोमिति का दृढ़ ज्ञान रासायनिक अभिक्रियाओं की मात्रात्मक समझ प्रदान करता है। इस अध्याय की पकड़ मजबूत करने से बाद के सभी अध्यायों, विशेषकर साम्यावस्था, ऊष्मागतिकी तथा रेडॉक्स अभिक्रियाओं को समझना अत्यंत सरल हो जाएगा।