परमाणु रासायनिक पदार्थ का सबसे छोटा कण है, किंतु यह स्वयं कई उप-परमाण्विक कणों से मिलकर बना होता है। परमाणु की संरचना का ज्ञान रसायन विज्ञान की समस्त अवधारणाओं - रासायनिक आबंधन, आवर्त सारणी, तत्वों के गुणधर्म - को समझने के लिए अनिवार्य है। इस अध्याय में हम उप-परमाण्विक कणों की खोज, परमाणु के विभिन्न मॉडल, क्वांटम यांत्रिकी के मूलभूत सिद्धांत, कक्षक तथा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास का अध्ययन करेंगे। प्रारंभ में परमाणु को अविभाज्य माना गया था, परंतु 19वीं एवं 20वीं शताब्दी के अनेक प्रयोगों ने सिद्ध किया कि परमाणु की अपनी आंतरिक संरचना है।
इलेक्ट्रॉन: 1897 में जे.जे. थॉमसन ने कैथोड किरणों के अध्ययन से इलेक्ट्रॉन की खोज की। कैथोड किरणें ऋणावेशित कणों की धारा हैं जो अत्यधिक कम दाब वाले विद्युत डिस्चार्ज नलिका में ऋणात्मक इलेक्ट्रोड (कैथोड) से उत्पन्न होती हैं। इलेक्ट्रॉन का आवेश $-1.602 \times 10^{-19}$ कूलॉम तथा द्रव्यमान $9.11 \times 10^{-31}$ किलोग्राम होता है। थॉमसन ने इलेक्ट्रॉन के आवेश-द्रव्यमान अनुपात ($e/m$) को मापा।
प्रोटॉन: यूजेन गोल्डस्टीन ने 1886 में एनोड किरणों (धनात्मक किरणों) की खोज की, जो धनावेशित कण हैं। इन्हीं में से प्रोटॉन की पहचान हुई। प्रोटॉन का आवेश $+1.602 \times 10^{-19}$ कूलॉम तथा द्रव्यमान $1.6726 \times 10^{-27}$ किलोग्राम होता है, जो इलेक्ट्रॉन से लगभग 1837 गुना अधिक है।
न्यूट्रॉन: 1932 में जेम्स चैडविक ने न्यूट्रॉन की खोज की। न्यूट्रॉन अनावेशित होता है तथा इसका द्रव्यमान प्रोटॉन के लगभग बराबर ($1.675 \times 10^{-27}$ kg) होता है। बेरिलियम पर अल्फा कणों की टक्कर से निकली अत्यंत भेदक किरणों के अध्ययन से चैडविक ने न्यूट्रॉन की खोज की।
परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या, प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है, अतः परमाणु विद्युतीय रूप से उदासीन होता है। किसी तत्व की परमाणु संख्या (Z) उसके प्रोटॉनों की संख्या होती है तथा द्रव्यमान संख्या (A) प्रोटॉनों एवं न्यूट्रॉनों की संख्या का योग होता है।
थॉमसन का मॉडल: थॉमसन ने परमाणु को एक गोलाकार क्षेत्र माना जिसमें धनावेश समान रूप से वितरित रहता है और ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन उसमें फल (किशमिश) की तरह धँसे होते हैं। इस मॉडल को 'प्लम पुडिंग मॉडल' भी कहते हैं। परंतु यह मॉडल रदरफोर्ड के प्रयोगों के परिणामों की व्याख्या नहीं कर सका।
रदरफोर्ड का अल्फा-कण प्रकीर्णन प्रयोग: रदरफोर्ड ने सोने की पतली पन्नी पर अल्फा कणों की बौछार की। उन्होंने पाया कि अधिकांश अल्फा कण बिना विचलन के गुजर जाते हैं, कुछ कण छोटे कोणों पर विचलित होते हैं तथा बहुत कम कण (लगभग 1 में 20000) 180° के कोण पर वापस लौट जाते हैं। इस प्रयोग के निष्कर्षों से परमाणु के नाभिक का ज्ञान हुआ। रदरफोर्ड के अनुसार परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त होता है, परमाणु के केंद्र में अत्यंत सूक्ष्म, धनावेशित एवं भारी नाभिक होता है, जिसमें संपूर्ण द्रव्यमान तथा धनावेश केंद्रित होता है। इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर निश्चित कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं। हालांकि रदरफोर्ड का मॉडल नाभिक की स्थिरता की व्याख्या नहीं कर पाया, क्योंकि विद्युतचुंबकीय सिद्धांत के अनुसार परिक्रमा करते इलेक्ट्रॉन से विकिरण उत्सर्जित होकर वह नाभिक में गिर जाना चाहिए।
बोर का मॉडल: 1913 में नील्स बोर ने हाइड्रोजन परमाणु का मॉडल प्रस्तुत किया। बोर के अभिगृहीत इस प्रकार हैं - इलेक्ट्रॉन केवल उन्हीं कक्षाओं में परिक्रमा कर सकता है जिनमें उसका कोणीय संवेग $h/2\pi$ का पूर्ण गुणक होता है ($mvr = nh/2\pi$)। इन कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का विकिरण नहीं करता। जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा कक्षा से निम्न ऊर्जा कक्षा में कूदता है, तो ऊर्जा का उत्सर्जन होता है, और विपरीत दिशा में ऊर्जा का अवशोषण होता है। बोर के मॉडल ने हाइड्रोजन की रेखा स्पेक्ट्रम की व्याख्या तो की, परंतु यह बहु-इलेक्ट्रॉन परमाणुओं तथा ज़ीमान एवं स्टार्क प्रभाव की व्याख्या नहीं कर सका।
विद्युतचुंबकीय विकिरण में विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्र एक-दूसरे के लंबवत दोलन करते हैं। प्रकाश की तरंग प्रकृति के अनुसार इसके गुणधर्म तरंगदैर्ध्य ($\lambda$), आवृत्ति ($\nu$) तथा वेग ($c$) से व्यक्त होते हैं:
$$c = \nu \lambda$$
विकिरण की ऊर्जा प्लांक के क्वांटम सिद्धांत से ज्ञात होती है:
$$E = h\nu = \frac{hc}{\lambda}$$
यहाँ $h$ प्लांक स्थिरांक है जिसका मान $6.626 \times 10^{-34}$ J s है। विकिरण से जुड़े प्रत्येक कण (फोटॉन) की ऊर्जा निरंतर नहीं बल्कि विविक्त (Discrete) होती है। प्रकाश विद्युत प्रभाव में आइंस्टीन ने यह सिद्ध किया कि धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन निकलने के लिए विकिरण की आवृत्ति का एक निश्चित न्यूनतम मान (थ्रेशोल्ड आवृत्ति) आवश्यक है। इससे प्रकाश की कण प्रकृति सिद्ध हुई।
हाइड्रोजन का रेखा स्पेक्ट्रम: हाइड्रोजन गैस के स्पेक्ट्रम में विविक्त रेखाएँ प्राप्त होती हैं, जिन्हें श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। लाइमन श्रेणी पराबैंगनी क्षेत्र में, बामर श्रेणी दृश्य क्षेत्र में, तथा पाश्चन, ब्रैकेट, फुंड श्रेणियाँ अवरक्त क्षेत्र में होती हैं। बामर की श्रेणी के लिए तरंग संख्या:
$$\bar{\nu} = \frac{1}{\lambda} = R_H \left( \frac{1}{2^2} - \frac{1}{n^2} \right)$$
यहाँ $R_H$ रिडबर्ग स्थिरांक है। लाइमन श्रेणी के लिए पहले कोष्ठक में $1/1^2$ तथा पाश्चन के लिए $1/3^2$ होता है। बोर ने इस स्पेक्ट्रम की व्याख्या करते हुए दर्शाया कि हाइड्रोजन की कक्षाओं की ऊर्जा $E_n = -13.6/n^2$ eV होती है।
बोर मॉडल की सीमाओं के कारण विल्सन एवं सोमरफेल्ड तथा बाद में क्वांटम यांत्रिकी का विकास हुआ। डी-ब्रोगली समीकरण के अनुसार गतिशील कण की तरंगदैर्ध्य:
$$\lambda = \frac{h}{mv}$$
हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत: इसके अनुसार इलेक्ट्रॉन जैसे सूक्ष्म कण की स्थिति ($\Delta x$) तथा संवेग ($\Delta p$) में अनिश्चितता को एक साथ यथार्थ रूप से ज्ञात नहीं किया जा सकता:
$$\Delta x \cdot \Delta p \ge \frac{h}{4\pi}$$
श्रोडिंगर तरंग समीकरण से परमाणु में इलेक्ट्रॉन के व्यवहार का वर्णन तरंग फलन ($\Psi$) द्वारा होता है। $|\Psi|^2$ किसी बिंदु पर इलेक्ट्रॉन मिलने की प्रायिकता घनत्व देता है। कक्षक (Orbital) त्रि-आयामी क्षेत्र है जहाँ इलेक्ट्रॉन मिलने की प्रायिकता अधिकतम होती है। कक्षकों की पहचान तीन क्वांटम संख्याओं से होती है:
मुख्य क्वांटम संख्या ($n$): $n$ = 1, 2, 3... जो ऊर्जा स्तर तथा कोश को दर्शाती है।
अज़ीमुथल क्वांटम संख्या ($l$): $l$ = 0 से $n-1$ तक। $l$ = 0 (s), 1 (p), 2 (d), 3 (f) कक्षकों को दर्शाता है तथा कक्षक का आकार निर्धारित करता है।
चुंबकीय क्वांटम संख्या ($m_l$): $m_l$ = $-l$ से $+l$ तक, जो कक्षक का अभिविन्यास दर्शाती है। प्रत्येक उपकोश में कक्षकों की संख्या $2l+1$ होती है।
प्रचक्रण क्वांटम संख्या ($m_s$): $m_s$ = +1/2 या -1/2, जो इलेक्ट्रॉन के चक्रण की दिशा दर्शाती है।
परमाणु में इलेक्ट्रॉनों का वितरण निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित होता है:
ऑफबाऊ सिद्धांत: इलेक्ट्रॉन सबसे पहले निम्नतम ऊर्जा वाले कक्षकों में भरते हैं। कक्षकों की ऊर्जा क्रम इस प्रकार है - 1s, 2s, 2p, 3s, 3p, 4s, 3d, 4p, 5s, 4d, 5p, 6s, 4f, 5d, 6p, 7s, 5f, 6d, 7p।
पाउली का अपवर्जन सिद्धांत: किसी परमाणु में दो इलेक्ट्रॉनों की चारों क्वांटम संख्याएँ समान नहीं हो सकतीं। अतः किसी कक्षक में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं, वे भी विपरीत प्रचक्रण के साथ।
हुंड का अधिकतम बहुलता नियम: समान ऊर्जा वाले कक्षकों (जैसे तीनों 2p) में इलेक्ट्रॉन पहले एक-एक करके अयुग्मित होकर भरते हैं, तब युग्म बनाते हैं।
इन नियमों से परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखा जाता है। उदाहरण के लिए, $Na$ ($Z=11$) का विन्यास $1s^2 2s^2 2p^6 3s^1$ है। कुछ तत्वों जैसे $Cr$ ($3d^5 4s^1$) तथा $Cu$ ($3d^{10} 4s^1$) में अर्ध-भरे तथा पूर्ण भरे d कक्षक की अतिरिक्त स्थायित्व के कारण इलेक्ट्रॉन का असामान्य विस्थापन होता है।
| कण | खोजकर्ता | आवेश | द्रव्यमान |
|---|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉन | जे.जे. थॉमसन | $-1.602 \times 10^{-19}$ C | $9.11 \times 10^{-31}$ kg |
| प्रोटॉन | गोल्डस्टीन | $+1.602 \times 10^{-19}$ C | $1.6726 \times 10^{-27}$ kg |
| न्यूट्रॉन | चैडविक | शून्य | $1.675 \times 10^{-27}$ kg |
| क्वांटम संख्या | प्रतीक | मान | महत्व |
|---|---|---|---|
| मुख्य | $n$ | 1, 2, 3... | ऊर्जा कोश |
| अज़ीमुथल | $l$ | 0 से $n-1$ | कक्षक का आकार (s, p, d, f) |
| चुंबकीय | $m_l$ | $-l$ से $+l$ | अभिविन्यास |
| प्रचक्रण | $m_s$ | +1/2, -1/2 | चक्रण दिशा |
| श्रेणी | क्षेत्र | $n$ मान |
|---|---|---|
| लाइमन | पराबैंगनी | 1 से 2, 3, 4... |
| बामर | दृश्य | 2 से 3, 4, 5... |
| पाश्चन | अवरक्त | 3 से 4, 5, 6... |
| ब्रैकेट | अवरक्त | 4 से 5, 6, 7... |
| फुंड | अवरक्त | 5 से 6, 7, 8... |
इस अध्याय में हमने परमाणु की आंतरिक संरचना का विस्तृत अध्ययन किया - इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन की खोज से लेकर थॉमसन, रदरफोर्ड तथा बोर के मॉडल तक। आधुनिक क्वांटम यांत्रिकीय मॉडल में डी-ब्रोगली की द्वैत प्रकृति, हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत तथा श्रोडिंगर का तरंग समीकरण परमाणु के सटीक चित्र को प्रस्तुत करते हैं। चारों क्वांटम संख्याओं का ज्ञान कक्षकों की पूर्ण पहचान देता है तथा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के नियम तत्वों के रासायनिक गुणधर्मों की व्याख्या करते हैं। यह अध्याय अगले अध्यायों - आवर्त सारणी तथा रासायनिक आबंधन - के लिए आधार तैयार करता है, क्योंकि किसी तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ही उसके व्यवहार को निर्धारित करता है।