Comprehensive theory, key formulas, diagrams, and memory aids for सूचकांक (Index Numbers).
सूचकांक एक विशेष प्रकार की औसत संख्या है जो किसी चर (जैसे कीमत, मात्रा) में एक आधार वर्ष की तुलना में हुए सापेक्ष परिवर्तन को प्रतिशत में व्यक्त करती है। यह आर्थिक आँकड़ों में समय के साथ होने वाले परिवर्तनों की दिशा और सीमा का माप है। उदाहरण के लिए, थोक मूल्य सूचकांक (WPI) बताता है कि एक वर्ष में थोक कीमतों में कितने प्रतिशत का परिवर्तन हुआ। सूचकांक को प्रायः सूचकांक संख्या कहा जाता है।
सूचकांक की गणना के लिए किसी वर्ष को आधार वर्ष (base year) चुना जाता है जिसकी संख्या 100 मानी जाती है। आधार वर्ष की कीमतें सामान्य होनी चाहिए, न तो असामान्य रूप से उच्च और न ही निम्न।
$$ P_{01} = \frac{\sum P_1}{\sum P_0} \times 100 $$ यहाँ $P_1$ = चालू वर्ष की कीमतें, $P_0$ = आधार वर्ष की कीमतें। इसमें प्रत्येक वस्तु का महत्व समान माना जाता है।
$$ P_{01} = \frac{\sum \left(\frac{P_1}{P_0} \times 100\right)}{N} $$ यहाँ $N$ = वस्तुओं की संख्या। प्रत्येक वस्तु का मूल्य अनुपात निकालकर उनकी सरल औसत ली जाती है।
जब सभी वस्तुओं का महत्व (weight) समान न हो, तो भारित विधियों का प्रयोग होता है।
$$ P_{01} = \frac{\sum P_1 Q_0}{\sum P_0 Q_0} \times 100 $$ इसमें आधार वर्ष की मात्राएँ ($Q_0$) भार के रूप में प्रयुक्त होती हैं।
$$ P_{01} = \frac{\sum P_1 Q_1}{\sum P_0 Q_1} \times 100 $$ इसमें चालू वर्ष की मात्राएँ ($Q_1$) भार के रूप में प्रयुक्त होती हैं।
$$ P_{01} = \sqrt{\frac{\sum P_1 Q_0}{\sum P_0 Q_0} \times \frac{\sum P_1 Q_1}{\sum P_0 Q_1}} \times 100 $$ फिशर का सूचकांक लास्पेयर्स और पाशे सूचकांकों का ज्यामितीय माध्य है। इसे 'आदर्श' कहा जाता है क्योंकि यह समय और कारक उत्क्रमण परीक्षण (time and factor reversal tests) को संतुष्ट करता है।
सूचकांकों का सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक उपयोग मुद्रास्फीति की दर ज्ञात करना है। जब WPI या CPI में वर्ष दर वर्ष परिवर्तन की गणना की जाती है तो महँगाई की दर प्राप्त होती है। इसी आधार पर सरकार महंगाई भत्ता (DA) और वेतन संशोधन तय करती है। सूचकांकों का उपयोग मजदूरी, पेंशन और किराए के अनुबंधों (contracts) में भी होता है, जिन्हें कीमतों के बदलाव के अनुसार समायोजित किया जाता है। व्यवसायी सूचकांकों से अपने उत्पादों की कीमतों में आवश्यक समायोजन का अनुमान लगाते हैं। विशेषकर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) का उपयोग क्रय शक्ति के मापन के लिए किया जाता है, जिससे यह पता चलता है कि किसी निश्चित राशि से उपभोक्ता कितना सामान खरीद सकता है। इस प्रकार सूचकांकों का उपयोग आम जनता के जीवन से सीधे जुड़ा हुआ है।
सूचकांक को विश्वसनीय बनाने के लिए निम्नलिखित सावधानियाँ आवश्यक हैं: - आधार वर्ष सामान्य और स्थिर होना चाहिए, जिसमें न तो असाधारण उतार-चढ़ाव हों और न ही आपात स्थितियाँ। - वस्तुओं का चयन प्रतिनिधि (representative) होना चाहिए ताकि उपभोग के स्वरूप को सही ढंग से दर्शाया जा सके। - भार (weights) का निर्धारण वैज्ञानिक ढंग से होना चाहिए, जिसमें वस्तु का महत्व (जैसे उपभोग में हिस्सा) प्रतिबिंबित हो। - कीमतों का संग्रहण सुसंगत स्रोतों से होना चाहिए, अन्यथा आँकड़े भ्रामक हो जाते हैं। - सूचकांकों की समय-समय पर समीक्षा और आधार वर्ष का अद्यतन (revision) भी आवश्यक है, क्योंकि उपभोग के स्वरूप और अर्थव्यवस्था की संरचना बदलती रहती है।
| विधि | सूत्र | भार |
|---|---|---|
| सरल योग | ΣP₁/ΣP₀ × 100 | कोई भार नहीं |
| मूल्य अनुपातों की औसत | Σ(P₁/P₀ × 100)/N | कोई भार नहीं |
| लास्पेयर्स | ΣP₁Q₀/ΣP₀Q₀ × 100 | आधार वर्ष मात्रा |
| पाशे | ΣP₁Q₁/ΣP₀Q₁ × 100 | चालू वर्ष मात्रा |
| फिशर | √(L × P) | दोनों |
| सूचकांक | मापता है | प्रकाशक |
|---|---|---|
| WPI | थोक कीमतें | Office of Economic Adviser |
| CPI | खुदरा कीमतें | विभिन्न संस्थान |
| IIP | औद्योगिक उत्पादन | CSO |
graph TD
A["सूचकांक"] --> B["प्रकार"]
B --> C["मूल्य सूचकांक"]
B --> D["मात्रा सूचकांक"]
B --> E["मूल्य सूचकांक"]
A --> F["निर्माण विधियाँ"]
F --> G["सरल योग"]
F --> H["मूल्य अनुपातों की औसत"]
F --> I["लास्पेयर्स (आधार मात्रा)"]
F --> J["पाशे (चालू मात्रा)"]
F --> K["फिशर (√(L×P))"]
A --> L["WPI, CPI, IIP"]
A --> M["सीमाएँ"]
सूचकांक आर्थिक परिवर्तनों को मापने का महत्वपूर्ण औज़ार है। यह कीमतों, मात्राओं और मूल्यों में आधार वर्ष की तुलना में हुए सापेक्ष परिवर्तन को प्रतिशत में व्यक्त करता है। सरल विधियाँ और भारित विधियाँ (लास्पेयर्स, पाशे, फिशर) इसके निर्माण के मुख्य तरीके हैं। WPI, CPI और IIP भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख सूचकांक हैं। सूचकांकों का उपयोग मुद्रास्फीति, महंगाई भत्ता, क्रय शक्ति और आर्थिक नीति निर्माण में होता है, यद्यपि इनकी कुछ सीमाएँ भी हैं। अगले अध्याय में हम सांख्यिकीय औज़ारों के व्यावहारिक उपयोग का अध्ययन करेंगे।