यह अध्याय 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति का वर्णन करता है। लगभग 190 वर्षों (1757-1947) की ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार केवल ब्रिटेन के आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए रखा गया। ब्रिटिश नीतियाँ भारत के विकास के बजाय उसके शोषण पर केंद्रित थीं। स्वतंत्रता के समय अर्थव्यवस्था पिछड़ी हुई, गरीब और असंतुलित थी, जिसमें कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, अविकसित उद्योग, कमजोर अवसंरचना और निम्न जीवन स्तर था।
2. स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था का ढाँचा (Structure of the Economy)
निम्न राष्ट्रीय आय: राष्ट्रीय आय बहुत निम्न स्तर पर थी। प्रति व्यक्ति आय अत्यंत कम थी।
कृषि पर निर्भरता: लगभग 70% से 75% जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी।
कृषि में ठहराव (Stagnation): कृषि उत्पादन में वृद्धि नहीं हो रही थी, फसल की पैदावार बहुत कम थी।
औद्योगिक अविकास: आधुनिक उद्योग बहुत कम संख्या में थे; हस्तशिल्प उद्योग नष्ट हो चुके थे।
निम्न जीवन स्तर: गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण और निम्न स्वास्थ्य सुविधाएँ।
3. कृषि क्षेत्र की स्थिति (Agricultural Sector)
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान थी, फिर भी कृषि क्षेत्र में गहरा ठहराव था। इसके कारण:
1. ज़मींदारी व्यवस्था: ब्रिटिश सरकार ने ज़मींदार, तालुकदार, जागीरदार आदि की व्यवस्था बनाई, जिसमें किसान केवल बटाईदार थे। किसानों की फसल का बड़ा हिस्सा ज़मींदारों और सरकार को चला जाता था।
2. व्यावसायिक फसलों की ओर झुकाव: किसानों को कपास, जूट, गन्ना आदि व्यावसायिक फसलें उगाने के लिए विवश किया गया, जिससे खाद्यान्न उत्पादन घटा।
3. भारतीय किसानों पर करों का बोझ: भूमि कर बहुत अधिक था।
4. न्यून पूँजी और तकनीकी पिछड़ापन: किसानों के पास पूँजी नहीं थी और खेती की पुरानी विधियाँ प्रयुक्त होती थीं।
5. कृषि उत्पादों के मूल्य का पतन: भारत से कृषि कच्चा माल निर्यात किया जाता था और तैयार माल आयात किया जाता था, जिससे व्यापार घाटा बढ़ता था।
परिणामस्वरूप, 1947 तक कृषि में ठहराव, गरीब किसान और भूखमरी की स्थिति बनी रही।
4. औद्योगिक क्षेत्र की स्थिति (Industrial Sector)
हस्तशिल्प उद्योगों का पतन: ब्रिटिश नीतियों (मुक्त आयात, ब्रिटिश सामानों की बाढ़) के कारण भारतीय हस्तशिल्प उद्योग (बुनकर, बढ़ई, लुहार) लगभग नष्ट हो गए। प्रसिद्ध भारतीय कपड़ा, रेशम और मिट्टी के बर्तन उद्योगों का पतन हुआ।
आधुनिक उद्योगों की शुरुआत: 1850 के दशक में बंबई में पहली सूती कपड़ा मिल और 1854 में बंगाल में जूट मिलों की स्थापना हुई। टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना 1907 में हुई।
ब्रिटिश नीतियों का प्रभाव: भारत में आधुनिक उद्योगों की स्थापना केवल उन्हीं क्षेत्रों में होने दी गई जो ब्रिटेन के लिए प्रतिस्पर्धी नहीं थे। ब्रिटिश सरकार का आयात निर्यात नीति और तकनीकी सहायता की कमी औद्योगिक विकास में बाधक रही।
1947 तक आधुनिक उद्योगों में रोजगार बहुत कम था, केवल 2% से 3% जनसंख्या ही औद्योगिक क्षेत्र में थी।
5. विदेशी व्यापार की स्थिति (Foreign Trade)
भारत कच्चे माल का निर्यातक और तैयार माल का आयातक बन गया था।
निर्यात में कपास, जूट, चाय, नील, मसाले शामिल थे।
आयात में ब्रिटेन से तैयार कपड़ा, मशीनें, विलासिता के सामान।
व्यापार अधिशेष (surplus) था, परंतु इस अधिशेष का उपयोग भारत में पूँजी निर्माण के बजाय ब्रिटेन में प्रशासनिक व्यय (घरेलू व्यय, युद्ध व्यय) को पूरा करने में किया जाता था। इसे 'एकतरफा प्रवाह' (one-way flow) कहा गया।
भारत का व्यापार मुख्यतः ब्रिटेन के साथ था और व्यापार की शर्तें ब्रिटेन के अनुकूल थीं।
6. जनसांख्यिकीय स्थिति (Demographic Condition)
निम्न जीवन प्रत्याशा: 1947 के समय जीवन प्रत्याशा लगभग 32 वर्ष थी।
उच्च शिशु मृत्यु दर: शिशु मृत्यु दर 218 प्रति हजार थी।
निम्न साक्षरता: साक्षरता दर केवल लगभग 16% थी (1941 की जनगणना अनुसार)।
उच्च जन्म दर और मृत्यु दर: जन्म दर लगभग 48 प्रति हजार और मृत्यु दर लगभग 40 प्रति हजार थी।
औसत आयु बहुत कम थी और स्वास्थ्य सुविधाएँ अत्यंत सीमित थीं।
7. व्यावसायिक ढाँचा (Occupational Structure)
ब्रिटिश शासन के दौरान प्राथमिक क्षेत्र (कृषि) में रोजगार का हिस्सा बढ़ा, जबकि द्वितीयक (उद्योग) और तृतीयक (सेवा) क्षेत्रों में घट गया। यह एक विकृत (distorted) व्यावसायिक ढाँचा था।
स्वतंत्रता के समय कृषि पर अत्यधिक दबाव था, क्योंकि उद्योग पतन से बेरोजगार लोग कृषि की ओर लौट रहे थे।
8. अवसंरचना की स्थिति (Infrastructure)
रेलवे: 1853 में पहली रेलवे लाइन (मुंबई-ठाणे) बिछाई गई, परंतु रेलवे का निर्माण मुख्यतः ब्रिटिश आर्थिक हितों के लिए हुआ।
संचार, बिजली, सड़कें और बंदरगाह सीमित थे।
ब्रिटिश शासन ने अवसंरचना का विकास अपने व्यापार और सैन्य उद्देश्यों के लिए किया, भारत के विकास के लिए नहीं।
9. विरासत (The Legacy)
स्वतंत्रता के समय की अर्थव्यवस्था की मुख्य समस्याएँ थीं - गरीबी, बेरोजगारी, कम राष्ट्रीय आय, कृषि का ठहराव, कमजोर औद्योगिक आधार और निम्न जीवन स्तर। नेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (NDP) में कृषि का योगदान सबसे अधिक था, फिर सेवा क्षेत्र और उद्योग का। 1900 से 1947 तक प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि लगभग शून्य रही।
त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ
तालिका 1: विभिन्न क्षेत्रों की स्थिति
क्षेत्र
स्वतंत्रता के समय स्थिति
कृषि
ठहराव, ज़मींदारी व्यवस्था
उद्योग
हस्तशिल्प पतन, निम्न आधुनिक उद्योग
विदेशी व्यापार
कच्चा माल निर्यात, तैयार माल आयात
जनसंख्या
उच्च जन्म/मृत्यु दर, निम्न साक्षरता
अवसंरचना
अविकसित, ब्रिटिश हितों के लिए
तालिका 2: प्रमुख आँकड़े (लगभग)
संकेतक
मान
कृषि पर निर्भर जनसंख्या
~70-75%
जीवन प्रत्याशा
~32 वर्ष
शिशु मृत्यु दर
218 प्रति हजार
साक्षरता दर
~16%
जन्म दर
~48 प्रति हजार
माइंड मैप
graph TD
A["स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था"] --> B["कृषि: ठहराव, ज़मींदारी"]
A --> C["उद्योग: हस्तशिल्प पतन"]
A --> D["विदेशी व्यापार: कच्चा माल निर्यात"]
A --> E["जनसांख्यिकी: निम्न जीवन स्तर"]
A --> F["व्यावसायिक ढाँचा: विकृत"]
A --> G["अवसंरचना: अविकसित"]
B --> H["कारण: ज़मींदारी, व्यावसायिक फसलें"]
C --> I["कारण: मुक्त आयात, ब्रिटिश नीति"]
महत्वपूर्ण आरेख (SVG)
आरेख 1: व्यावसायिक ढाँचा (1947)
आरेख 2: विदेशी व्यापार का एकतरफा प्रवाह
सामान्य गलतियाँ
ज़मींदारी व्यवस्था के पक्ष में भ्रम: कुछ विद्यार्थी सोचते हैं कि ज़मींदारी से किसान लाभान्वित हुए, जबकि किसान शोषित थे।
हस्तशिल्प पतन का कारण: हस्तशिल्प पतन का मुख्य कारण मुक्त आयात नीति थी, इसे भूलना।
व्यापार अधिशेष की गलत व्याख्या: अधिशेष के बावजूद भारत लाभान्वित नहीं हुआ, यह बिंदु छूट जाता है।
साक्षरता और जीवन प्रत्याशा के आँकड़े: ~16% साक्षरता और ~32 वर्ष जीवन प्रत्याशा को गलत लिखना।
TISCO की स्थापना वर्ष: 1907 की स्थापना को गलत लिखना।
व्यावसायिक ढाँचे की दिशा: प्राथमिक क्षेत्र का हिस्सा बढ़ा (घटा नहीं), यह उलट लिखना।
परीक्षा युक्तियाँ
कृषि ठहराव के 4-5 कारण विस्तार से लिखें।
हस्तशिल्प पतन और आधुनिक उद्योगों (TISCO 1907) के स्थापना वर्ष याद रखें।
जनसांख्यिकीय आँकड़े (जीवन प्रत्याशा 32 वर्ष, शिशु मृत्यु दर 218) तालिका में लिखें।
'एकतरफा प्रवाह' (one-way flow) की अवधारणा को उदाहरण सहित समझाएँ।
व्यावसायिक ढाँचे के विकृत होने की व्याख्या करें।
विरासत (legacy) के रूप में विरासत में मिली समस्याओं (गरीबी, बेरोजगारी) का उल्लेख करें।
निष्कर्ष
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था का ढाँचा औपनिवेशिक शोषण के कारण पिछड़ा और असंतुलित था। कृषि में ठहराव, हस्तशिल्प उद्योगों का पतन, विकृत विदेशी व्यापार, निम्न जीवन स्तर और विकृत व्यावसायिक ढाँचा इसकी मुख्य विशेषताएँ थीं। लगभग 190 वर्षों के ब्रिटिश शासन ने भारत की संपदा को नष्ट किया। यही कारण है कि स्वतंत्र भारत को अपने विकास के लिए बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। अगले अध्याय में हम 1950 से 1990 तक की योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के प्रयासों का अध्ययन करेंगे।