"The Portrait of a Lady" कक्षा 11 की पाठ्यपुस्तक होर्नबिल (Hornbill) का पहला पाठ है, जिसे प्रसिद्ध भारतीय लेखक खुशवंत सिंह (Khushwant Singh) ने लिखा है। यह एक आत्मकथात्मक (autobiographical) रेखाचित्र है, जिसमें लेखक ने अपनी दादी के साथ बिताए गए अपने जीवन के अद्भुत पलों का वर्णन किया है। यह पाठ प्रेम, स्नेह, त्याग और जीवन के स्थायी मूल्यों की एक मार्मिक कहानी प्रस्तुत करता है।
यह रेखाचित्र एक साधारण भारतीय दादी के असाधारण व्यक्तित्व को उजागर करता है, जो अपने पूरे जीवन में परिवार और धर्म के प्रति समर्पित रही। लेखक ने अपनी दादी की छवि को इस तरह प्रस्तुत किया है कि वह हर पाठक के मन में दादी के प्रति गहरा स्नेह और सम्मान जगाती है। पाठ की भाषा सरल, प्रवाहमयी और आत्मीय है।
इस कहानी का महत्व इस बात में है कि यह हमें बताती है कि समय कितना भी बदल जाए, दादी-दादा जैसे बुज़ुर्गों के प्रति हमारा स्नेह, आदर और जुड़ाव ही जीवन का असली धन है। दादी की मृत्यु के बाद भी लेखक के मन में उनकी छवि अमर रहती है, जो इस बात का प्रमाण है कि सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता।
खुशवंत सिंह (1915–2014) आधुनिक भारतीय अंग्रेज़ी साहित्य के सबसे लोकप्रिय लेखकों में से एक हैं। वे एक प्रख्यात उपन्यासकार, पत्रकार और निबंधकार थे। उनका जन्म हड़ाली, पंजाब में हुआ था। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में "Train to Pakistan" (ट्रेन टू पाकिस्तान), "A History of Sikhs" (ए हिस्ट्री ऑफ़ सिख्स), "The Company of Women" आदि शामिल हैं।
वे अपनी सहज, व्यंग्यात्मक और हास्यपूर्ण लेखन शैली के लिए जाने जाते हैं। "The Portrait of a Lady" उनका एक ऐसा आत्मकथात्मक निबंध है जिसमें उन्होंने अपनी दादी के प्रति अपने गहरे प्रेम और श्रद्धा को व्यक्त किया है। 1974 में उन्हें पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
लेखक के माता-पिता शहर में रहते थे, इसलिए उनका पालन-पोषण पूरी तरह से उनकी दादी के हाथों में था। दादी बूढ़ी थीं, कद में छोटी, सफेद बालों वाली और सदा एक-सी छवि वाली। लेखक उन्हें हमेशा "पुरानी और झुर्रियों वाली" याद करता है। दादी के बारे में लेखक का पहला परिचय यह था कि वे लेखक को स्कूल तक छोड़ने जाती थीं और स्कूल के पास बने मंदिर में बैठकर भजन पढ़ती थीं।
दादी का जीवन अत्यंत सरल और अनुशासित था। वे रोज़ाना चरखा कातती थीं, माला जपती थीं और अपना सारा समय भक्ति और घरेलू कामों में बिताती थीं। लेखक उन्हें चरखा कातते हुए देखता था और वे उसे कहानियाँ भी सुनाती थीं। दादी किसी को भी पक्षियों को परेशान करने से रोकती थीं और अपने घर में आए लोगों का प्यार से स्वागत करती थीं।
जब लेखक के माता-पिता ने उन्हें शहर बुलाया, तो दादी भी उनके साथ शहर आ गईं। अब दादी का जीवन बदल गया। शहर में न चरखा था, न मंदिर में बैठने की व्यवस्था। दादी को यहाँ अधिक समय मिलता था, पर वे नई चीज़ें सीखने में उत्सुक नहीं थीं। वे लेखक के पढ़ने में सहायता करती थीं, पर उनकी आदतें पुरानी थीं।
जब लेखक को इंग्लिश स्कूल में दाखिला मिला, तो दादी को यह बात पसंद नहीं आई क्योंकि वहाँ संगीत और भौतिक विज्ञान जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। वे मानती थीं कि संगीत केवल लड़कियों और देवताओं के लिए उपयुक्त है। दादी अंग्रेज़ी पढ़ाने के तरीके को नहीं समझ पाती थीं और गाँव की शिक्षा को अधिक महत्व देती थीं।
समय बीतने के साथ लेखक विश्वविद्यालय पढ़ने चला गया और उसे अलग कमरा मिल गया। दादी और लेखक के बीच की दूरी बढ़ने लगी। अब दादी को सोने के लिए कमरे के बाहर सोने की आदत डालनी पड़ी। जब लेखक इंग्लैंड जाने वाला था, तो दादी ने उसे विदा करते समय हल्के से आशीर्वाद दिया।
जब लेखक इंग्लैंड से लौटकर आया, तो उसने पाया कि दादी बुखार से बीमार हो चुकी थीं। डॉक्टर ने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है, पर दादी ने कहा कि "मेरा जीवन समाप्त होने वाला है।" उन्होंने अपने आखिरी दिन भजन पढ़ते हुए बिताए। अगली सुबह लेखक को बताया गया कि दादी का निधन हो गया है। सुबह होते ही दादी ने अपने जीवन का अंतिम सांस लिया। लेखक के अनुसार, उस दिन सैकड़ों गौरैया (sparrows) घर में आ गईं और चुपचाप दादी के शरीर के चारों ओर बैठ गईं, मानो उन्हें श्रद्धांजलि दे रही हों। यह दृश्य अत्यंत मार्मिक और प्रतीकात्मक है।
| पात्र | विवरण |
|---|---|
| दादी | लेखक की दादी, सरल, धार्मिक, प्रेममयी और परंपरावादी महिला। वह अपने पूरे जीवन में चरखा कातती और माला जपती रहीं। |
| खुशवंत सिंह (लेखक) | कथाकार, जो अपनी दादी के साथ बचपन से जुड़ा रहा, पर धीरे-धीरे दादी से दूर होता चला गया। |
| लेखक के माता-पिता | शहर में रहने वाले, जिन्होंने लेखक को शहर बुला लिया और जीवन की दिशा बदल दी। |
| डॉक्टर | दादी की जाँच करने वाला चिकित्सक, जिसने कहा कि बुखार गंभीर नहीं है। |
इस पाठ का मुख्य भाव दादी और पोते के बीच के अटूट प्रेम और स्नेह को दर्शाना है। यह हमें बताता है कि समय, स्थान और पीढ़ी का अंतर चाहे कितना भी बड़ा हो, सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता। दादी की मृत्यु के बाद भी लेखक के मन में उनकी छवि जीवित है।
पाठ का संदेश यह है कि हमें अपने बुज़ुर्गों का सम्मान करना चाहिए और उनके आशीर्वाद को कभी भूलना नहीं चाहिए। यह हमें सिखाता है कि भौतिक सुख-सुविधाओं से बढ़कर पारिवारिक स्नेह और रिश्तों का महत्व है। पाठ में स्पैरो (गौरैया) पक्षियों का आना इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति भी दादी के निधन का शोक मना रही थी।
| चरण | स्थान | मुख्य गतिविधियाँ |
|---|---|---|
| बचपन | गाँव | लेखक को स्कूल छोड़ना, मंदिर में भजन पढ़ना, चरखा कातना |
| स्कूल जीवन | शहर | अंग्रेज़ी स्कूल का विरोध, संगीत को अनुचित मानना |
| विश्वविद्यालय | शहर | अलग कमरा, लेखक से बढ़ती दूरी |
| अंतिम समय | शहर | बुखार, भजन पढ़ना, मृत्यु |
| विशेषता | उदाहरण |
|---|---|
| धार्मिक | मंदिर में बैठकर भजन पढ़ना, माला जपना |
| परंपरावादी | संगीत की शिक्षा का विरोध करना |
| प्रेममयी | लेखक को स्कूल तक छोड़ना, कहानियाँ सुनाना |
| सरल | पुरानी आदतों को बनाए रखना, नई चीज़ें सीखने में अनिच्छुक |
"The Portrait of a Lady" एक ऐसा अमर रेखाचित्र है जो दादी के प्रति सच्चे स्नेह और सम्मान का प्रतीक बन गया है। यह पाठ हमें सिखाता है कि जीवन की दौड़ में हम अपने बुज़ुर्गों से कितने दूर होते जा रहे हैं और यह दूरी हमें उनके प्रति अपने कर्तव्यों से विमुख कर देती है। दादी का सरल, समर्पित और धार्मिक जीवन हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा है। यह पाठ साहित्य, भाषा और जीवन-मूल्यों का एक उत्कृष्ट संगम है, जिसे प्रत्येक विद्यार्थी को हृदय से पढ़ना चाहिए।