वायु अपने उच्च दाब वाले क्षेत्रों से निम्न दाब वाले क्षेत्रों की ओर सदैव गति करती है। वायु की इस गति को 'पवन' (Wind) कहते हैं। पवनों के इस व्यवस्थित प्रवाह को 'वायुमंडलीय परिसंचरण' (Atmospheric Circulation) कहते हैं। वायुदाब और पवनें मौसम एवं जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्व हैं। वायुमंडलीय परिसंचरण विश्व स्तर पर वायु की गति के प्रतिरूप (patterns) को निर्धारित करता है, जो विभिन्न प्रकार की पवनों – व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें, ध्रुवीय पछुआ पवनें – का कारण बनता है। मौसम प्रणालियों (Weather Systems) के अंतर्गत चक्रवात, प्रतिचक्रवात, वायु संहति तथा वायुमंडलीय विक्षोभों का अध्ययन किया जाता है। इस अध्याय में हम वायुदाब, पवनें, वायुदाब पट्टियाँ, वायु संहतियाँ तथा चक्रवात-प्रतिचक्रवात का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
पृथ्वी की सतह पर वायुदाब का वितरण असमान है। वायुदाब को वायुदाब मापी यंत्र 'बैरोमीटर' (Barometer) से मापा जाता है। वायुदाब की मानक इकाई 'मिलीबार' (mb) है, हालांकि आधुनिक माप में 'हेक्टोपास्कल' (hPa) भी प्रयोग होता है। समुद्र तल पर मानक वायुदाब लगभग 1013 मिलीबार (1013.25 hPa) होता है। वायुदाब ऊंचाई और तापमान से प्रभावित होता है। ऊंचाई बढ़ने के साथ वायुदाब घटता है।
किसी स्थान पर वायु द्वारा पृथ्वी की सतह पर लगाया जाने वाला दाब 'वायुदाब' कहलाता है। वायु का अपना भार होता है, जो पृथ्वी की सतह पर दाब उत्पन्न करता है। वायुदाब को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं:
पृथ्वी की सतह पर वायुदाब का वितरण विशेष पट्टियों के रूप में होता है। सूर्यातप के असमान वितरण तथा पृथ्वी के घूर्णन के कारण निम्नलिखित वायुदाब पट्टियाँ बनती हैं: 1. भूमध्यरेखीय निम्न दाब पट्टी (Equatorial Low) – विषुवत रेखा के दोनों ओर लगभग 0 से 5 डिग्री अक्षांशों के बीच। सूर्य की किरणें लगभग लंबवत पड़ने से सतह गर्म होती है, वायु ऊपर उठती है, अतः निम्न दाब पट्टी बनती है। इसे 'अश्वांतरीय दाब कटक' या 'डोलड्रम' (Doldrums) भी कहते हैं। 2. उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (Subtropical High) – लगभग 25 से 35 डिग्री अक्षांशों पर। भूमध्य रेखा से ऊपर उठी वायु ध्रुवों की ओर बहकर 25-35 डिग्री अक्षांशों पर नीचे उतरती है, जिससे उच्च दाब पट्टी बनती है। इसे 'अश्व अक्षांश' (Horse Latitudes) भी कहते हैं। 3. उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (Subpolar Low) – लगभग 60 से 65 डिग्री अक्षांशों पर। ठंडी ध्रुवीय वायु और गर्म उपोष्ण वायु के मिलने से वायु ऊपर उठती है, जिससे निम्न दाब पट्टी बनती है। 4. ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (Polar High) – ध्रुवों के आस-पास। अत्यधिक ठंड के कारण वायु भारी होकर नीचे बैठती है, जिससे उच्च दाब पट्टी बनती है।
वायु का उच्च दाब से निम्न दाब की ओर क्षैतिज प्रवाह 'पवन' कहलाता है। पवन की दिशा और गति वायुदाब के अंतर, पृथ्वी के घूर्णन (कोरिओलिस बल) तथा घर्षण से प्रभावित होती है। पवनों का वर्गीकरण तीन प्रकार से किया जाता है – नियमित पवनें, मौसमी पवनें तथा स्थानीय पवनें।
नियमित पवनें पूरे वर्ष एक ही दिशा में बहती हैं। इनमें प्रमुख हैं: 1. व्यापारिक पवनें (Trade Winds) – उपोष्ण उच्च दाब पट्टी से भूमध्यरेखीय निम्न दाब पट्टी की ओर बहने वाली पवनें। उत्तरी गोलार्ध में ये उत्तर-पूर्व से और दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण-पूर्व से बहती हैं। कोरिओलिस बल के कारण इनकी दिशा में विचलन होता है। व्यापारिक पवनें स्थिर गति वाली होती हैं, इसलिए इन्हें 'व्यापारिक' नाम दिया गया। 2. पछुआ पवनें (Westerlies) – उपोष्ण उच्च दाब पट्टी से उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी की ओर बहने वाली पवनें। ये पवनें उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण-पश्चिम से तथा दक्षिणी गोलार्ध में उत्तर-पश्चिम से बहती हैं। दक्षिणी गोलार्ध में महासागरों की अधिकता के कारण पछुआ पवनें अधिक प्रबल होती हैं, जिन्हें 'गरजते चालीसा' (Roaring Forties) भी कहते हैं। 3. ध्रुवीय पछुआ पवनें (Polar Easterlies) – ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी से उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी की ओर बहने वाली ठंडी पवनें।
पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न होने वाला विक्षेपक बल कोरिओलिस बल कहलाता है। यह बल पवन की दिशा को विचलित करता है। उत्तरी गोलार्ध में यह पवन को दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विचलित करता है। विषुवत रेखा पर कोरिओलिस बल शून्य होता है और ध्रुवों की ओर बढ़ता है। कोरिओलिस बल के कारण ही पवनें सीधे निम्न दाब की ओर नहीं बहतीं, बल्कि विचलित होकर बहती हैं।
मौसमी पवनें वर्ष के विभिन्न मौसमों में विपरीत दिशाओं में बहती हैं। मानसून इसका प्रमुख उदाहरण है। भारतीय मानसून ग्रीष्म और शीत ऋतु में अपनी दिशा बदलता है।
स्थानीय पवनें किसी विशेष क्षेत्र में स्थानीय कारणों से बहती हैं। इनमें समुद्री समीर (sea breeze) और स्थलीय समीर (land breeze), लू (गर्म पवन), फॉन (Foehn), चिनूक (Chinook), मिस्ट्रल (Mistral) आदि प्रमुख हैं। समुद्री समीर दिन में समुद्र से स्थल की ओर बहती है, जबकि स्थलीय समीर रात में स्थल से समुद्र की ओर बहती है।
वायु का वह विशाल विस्तार जिसके तापमान और आर्द्रता की विशेषताएँ स्थानीय रूप से समान होती हैं, 'वायु संहति' कहलाता है। वायु संहति की उत्पत्ति उन स्रोत क्षेत्रों (source regions) से होती है जहां वायु काफी समय तक स्थिर रहती है। स्रोत क्षेत्र के आधार पर वायु संहतियाँ दो प्रकार की होती हैं – ध्रुवीय वायु संहति (Polar air mass) तथा उष्णकटिबंधीय वायु संहति (Tropical air mass)। सतह की प्रकृति के आधार पर ये महाद्वीपीय (c) और समुद्री (m) प्रकार की होती हैं। इस प्रकार चार मुख्य प्रकार की वायु संहतियाँ बनती हैं – महाद्वीपीय ध्रुवीय (cP), समुद्री ध्रुवीय (mP), महाद्वीपीय उष्णकटिबंधीय (cT) और समुद्री उष्णकटिबंधीय (mT)। जब दो भिन्न वायु संहतियाँ आपस में मिलती हैं, तो उनके मध्य बनी सीमा को 'वायु अग्र' (Front) कहते हैं। वायु अग्र के दो प्रकार हैं – गर्म वायु अग्र (Warm Front) और ठंडा वायु अग्र (Cold Front)।
चक्रवात एक निम्न दाब की मौसम प्रणाली है, जिसमें वायु चारों ओर से केंद्र की ओर प्रवाहित होती है। उत्तरी गोलार्ध में चक्रवात की वायु वामावर्त (counterclockwise) दिशा में तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में प्रवाहित होती है। चक्रवातों के साथ तेज पवनें, भारी वर्षा और बादल छा जाते हैं। चक्रवात दो प्रकार के होते हैं – उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone) और शीतोष्ण चक्रवात (Temperate Cyclone)।
उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones) – ये चक्रवात उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों (5 से 30 डिग्री अक्षांश) में उत्पन्न होते हैं। इनके केंद्र में एक शांत क्षेत्र होता है, जिसे 'चक्रवात की आँख' (Eye of the Cyclone) कहते हैं। ये चक्रवात बहुत तेज पवनों (हरिकेन, टाइफून) वाले होते हैं। उत्तरी अटलांटिक में इन्हें 'हरिकेन', प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग में 'टाइफून' तथा हिंद महासागर में 'चक्रवात' कहते हैं।
शीतोष्ण चक्रवात (Temperate Cyclones) – ये चक्रवात 35 से 65 डिग्री अक्षांशों के मध्य शीतोष्ण क्षेत्रों में बनते हैं। इनका निर्माण गर्म और ठंडी वायु संहतियों के मिलने से होता है। इनमें वर्षा कम तीव्र परंतु लंबी अवधि की होती है।
प्रतिचक्रवात उच्च दाब की मौसम प्रणाली है, जिसमें वायु केंद्र से बाहर की ओर प्रवाहित होती है। उत्तरी गोलार्ध में वायु दक्षिणावर्त (clockwise) तथा दक्षिणी गोलार्ध में वामावर्त (counterclockwise) दिशा में प्रवाहित होती है। प्रतिचक्रवात से साफ मौसम, शांत पवनें और शुष्क स्थिति उत्पन्न होती है।
| वायुदाब पट्टी | अक्षांश | प्रकार |
|---|---|---|
| भूमध्यरेखीय निम्न दाब | 0-5 डिग्री | निम्न दाब (डोलड्रम) |
| उपोष्ण उच्च दाब | 25-35 डिग्री | उच्च दाब (अश्व अक्षांश) |
| उपध्रुवीय निम्न दाब | 60-65 डिग्री | निम्न दाब |
| ध्रुवीय उच्च दाब | 90 डिग्री | उच्च दाब |
| पवन | दिशा | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| व्यापारिक पवनें | उपोष्ण से भूमध्य रेखा की ओर | स्थिर गति, विचलन |
| पछुआ पवनें | उपोष्ण से उपध्रुवीय की ओर | दक्षिणी गोलार्ध में प्रबल (रोअरिंग फोर्टीज़) |
| ध्रुवीय पछुआ पवनें | ध्रुवों से उपध्रुवीय की ओर | ठंडी पवनें |
वायुमंडलीय परिसंचरण और मौसम प्रणालियाँ पृथ्वी के मौसम और जलवायु को नियंत्रित करती हैं। वायुदाब का असमान वितरण पवनों का कारण बनता है। सूर्यातप के असमान वितरण से चार प्रमुख वायुदाब पट्टियाँ बनती हैं – भूमध्यरेखीय निम्न दाब, उपोष्ण उच्च दाब, उपध्रुवीय निम्न दाब और ध्रुवीय उच्च दाब। इन पट्टियों के बीच व्यापारिक, पछुआ तथा ध्रुवीय पछुआ पवनें बहती हैं। कोरिओलिस बल पवनों की दिशा को विचलित करता है। मौसमी पवनों में मानसून तथा स्थानीय पवनों में समुद्री-स्थलीय समीर प्रमुख हैं। वायु संहतियों के मिलने से वायु अग्र बनते हैं, जिनसे शीतोष्ण चक्रवात उत्पन्न होते हैं। उष्णकटिबंधीय चक्रवातों में चक्रवात की आँख शांत क्षेत्र होती है। प्रतिचक्रवात साफ मौसम का कारण बनते हैं। यह अध्याय मौसम पूर्वानुमान और जलवायु के अध्ययन की नींव है।