जैव विविधता (Biodiversity) पृथ्वी पर उपस्थित सभी प्रकार के जीवों – वनस्पतियों, जंतुओं, सूक्ष्म जीवों तथा उनके पारिस्थितिकी तंत्रों – की विविधता है। जैव विविधता शब्द का प्रयोग वाल्टर रोसेन (1985) द्वारा लोकप्रिय बनाया गया। जैव विविधता में आनुवंशिक विविधता, प्रजातीय विविधता तथा पारिस्थितिकी तंत्रीय विविधता तीन स्तर शामिल हैं। जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन के संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस अध्याय में हम जैव विविधता के अर्थ, स्तर, महत्व, वितरण, संकट तथा संरक्षण के उपायों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
पृथ्वी पर जीवों की विविधता अपार है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पृथ्वी पर लगभग 10 से 100 मिलियन प्रजातियाँ उपस्थित हैं, जिनमें से अब तक केवल लगभग 2 मिलियन प्रजातियों की ही पहचान की गई है। जैव विविधता विकास की प्रक्रिया का परिणाम है, जो अरबों वर्षों में विकसित हुई है।
जैव विविधता का अध्ययन तीन मुख्य स्तरों पर किया जाता है: 1. आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) – यह एक ही प्रजाति के विभिन्न जीवों के जीनों में पाई जाने वाली विविधता है। आनुवंशिक विविधता से जीव अपने पर्यावरण में अनुकूलन कर पाते हैं। उदाहरण के लिए, चावल की हजारों किस्में आनुवंशिक विविधता का परिणाम हैं। 2. प्रजातीय विविधता (Species Diversity) – यह किसी क्षेत्र में उपस्थित विभिन्न प्रजातियों की विविधता है। किसी क्षेत्र में जितनी अधिक प्रजातियाँ होंगी, वहाँ की प्रजातीय विविधता उतनी ही अधिक होगी। 3. पारिस्थितिकी तंत्रीय विविधता (Ecological Diversity) – यह किसी क्षेत्र में उपस्थित विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्रों की विविधता है। जैसे वन, घास के मैदान, मरुस्थल, आर्द्रभूमि, प्रवाल भित्तियाँ।
जैव विविधता पृथ्वी पर समान रूप से वितरित नहीं है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में सबसे अधिक जैव विविधता पाई जाती है। विषुवत रेखा के निकट के वर्षावनों में ध्रुवों की तुलना में कई गुना अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक जैव विविधता का कारण है – प्रचुर सौर ऊर्जा, पर्याप्त वर्षा, उच्च तापमान तथा लंबे विकासवादी इतिहास। अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र जैव विविधता से समृद्ध हैं। भारत विश्व के सर्वाधिक जैव विविधता वाले देशों में से एक है।
जैव विविधता के वे क्षेत्र जहां बड़ी संख्या में स्थानिक प्रजातियाँ (endemic species) पाई जाती हैं तथा जो गंभीर संकट में हैं, 'जैव विविधता हॉटस्पॉट' कहलाते हैं। विश्व में कुल 34 जैव विविधता हॉटस्पॉट पहचाने गए हैं। भारत में दो प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट हैं – (क) पूर्वी हिमालय और (ख) पश्चिमी घाट। इन हॉटस्पॉट क्षेत्रों में स्थानिक प्रजातियों की संख्या अत्यधिक है। हॉटस्पॉट क्षेत्रों का कुल क्षेत्रफल पृथ्वी की सतह का केवल लगभग 2% है, परंतु वहां विश्व की लगभग 50% स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
जैव विविधता मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं: 1. भोजन – जैव विविधता से हमें अनाज, फल, सब्जियाँ, मांस, मछली आदि मिलते हैं। 2. औषधियाँ – अनेक औषधियाँ वनस्पतियों और जीवों से प्राप्त होती हैं। आयुर्वेद, होम्योपैथी तथा आधुनिक चिकित्सा में जैव विविधता का बड़ा योगदान है। 3. आर्थिक संसाधन – लकड़ी, रेशा, रंग, रबर, ईंधन आदि वनस्पतियों से प्राप्त होते हैं। 4. पारिस्थितिकी सेवाएँ – जैव विविधता पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखती है। वन ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं, मृदा को स्थिर रखते हैं, जल चक्र को नियंत्रित करते हैं। 5. पर्यटन – वन्यजीव पर्यटन और पारिस्थितिकी पर्यटन से आय प्राप्त होती है। 6. सांस्कृतिक महत्व – कई संस्कृतियों में पेड़-पौधे और जानवर पवित्र माने जाते हैं।
जैव विविधता आज गंभीर संकट में है। इसके प्रमुख कारण हैं: 1. आवास विनाश (Habitat Loss) – वनों की कटाई, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण से जीवों के आवास नष्ट हो रहे हैं। यह जैव विविधता हानि का सबसे बड़ा कारण है। 2. शिकार और अवैध व्यापार – वन्यजीवों का शिकार तथा उनके अंगों का अवैध व्यापार (हाथी दांत, बाघ की खाल) जैव विविधता के लिए खतरा है। 3. प्रदूषण – जल, वायु और मृदा प्रदूषण से जीवों की मृत्यु होती है। 4. जलवायु परिवर्तन – जलवायु परिवर्तन से जीवों के आवास और प्रवास चक्र प्रभावित हो रहे हैं। 5. विदेशी प्रजातियों का आक्रमण (Invasive Species) – विदेशी प्रजातियों के आने से स्थानीय प्रजातियों का अस्तित्व संकट में पड़ता है। 6. अति-शोषण – प्राकृतिक संसाधनों का अधिक दोहन।
जैव विविधता के संरक्षण के दो मुख्य उपाय हैं – (क) स्थाने संरक्षण (In-situ Conservation) तथा (ख) बहिःस्थान संरक्षण (Ex-situ Conservation)।
इस विधि में जीवों और वनस्पतियों का उनके प्राकृतिक आवासों में ही संरक्षण किया जाता है। इसके अंतर्गत राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, बायोस्फियर रिजर्व, वन संरक्षित क्षेत्र तथा सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र शामिल हैं। भारत में 500 से अधिक वन्यजीव अभयारण्य और 100 से अधिक राष्ट्रीय उद्यान हैं। जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान है। भारत में 18 बायोस्फियर रिजर्व हैं।
इस विधि में जीवों का संरक्षण उनके प्राकृतिक आवासों के बाहर विशेष संस्थानों में किया जाता है। इसके अंतर्गत चिड़ियाघर, वनस्पति उद्यान, जीन बैंक, बीज बैंक तथा क्रायोप्रिजर्वेशन (अति निम्न तापमान पर संरक्षण) शामिल हैं। जीन बैंकों में विभिन्न प्रजातियों के बीजों और जीनों का संरक्षण किया जाता है।
भारत में जैव विविधता के संरक्षण के लिए वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 तथा राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (2003) की स्थापना की गई है। 'प्रोजेक्ट टाइगर' (1973), 'प्रोजेक्ट एलिफेंट' (1992) भारत के महत्वपूर्ण संरक्षण कार्यक्रम हैं।
विश्व में जैव विविधता का क्षरण (Loss) तेजी से हो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार वर्तमान में विलुप्त होने की दर प्राकृतिक दर से कई गुना अधिक है। आईयूसीएन (IUCN) की लाल सूची में विश्व की हजारों प्रजातियाँ संकटग्रस्त के रूप में सूचीबद्ध हैं। भारत में बंगाल टाइगर, एशियाई हाथी, एक सींग वाला गैंडा, भारतीय गिद्ध जैसी प्रजातियाँ संकटग्रस्त हैं। जैव विविधता के क्षरण से पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाएँ कमजोर पड़ती हैं तथा खाद्य सुरक्षा पर संकट उत्पन्न होता है।
| विविधता का स्तर | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|
| आनुवंशिक विविधता | एक ही प्रजाति के जीवों में जीन की विविधता | चावल की हजारों किस्में |
| प्रजातीय विविधता | क्षेत्र में उपस्थित विभिन्न प्रजातियाँ | विभिन्न पशु-पक्षी |
| पारिस्थितिकी तंत्रीय विविधता | विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र | वन, मरुस्थल, आर्द्रभूमि |
| संरक्षण विधि | प्रकार | उदाहरण |
|---|---|---|
| स्थाने संरक्षण | प्राकृतिक आवास में | राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य |
| बहिःस्थान संरक्षण | आवास के बाहर | चिड़ियाघर, जीन बैंक |
जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन की विविधता है, जो आनुवंशिक, प्रजातीय तथा पारिस्थितिकी तंत्रीय तीन स्तरों पर पाई जाती है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में जैव विविधता सर्वाधिक है। विश्व में 34 जैव विविधता हॉटस्पॉट हैं, जिनमें से भारत में दो हैं। जैव विविधता भोजन, औषधियाँ, आर्थिक संसाधन तथा पारिस्थितिकी सेवाएँ प्रदान करती है। परंतु आवास विनाश, शिकार, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन तथा विदेशी प्रजातियों के कारण जैव विविधता तेजी से घट रही है। संरक्षण के लिए स्थाने (राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, बायोस्फियर रिजर्व) तथा बहिःस्थान (चिड़ियाघर, जीन बैंक) उपाय अपनाए जाते हैं। रामसर कन्वेंशन, CITES, जैव विविधता कन्वेंशन जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों तथा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 और प्रोजेक्ट टाइगर जैसे राष्ट्रीय प्रयासों से जैव विविधता के संरक्षण का प्रयास किया जा रहा है। जैव विविधता का संरक्षण पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।