महाद्वीपों और महासागरों का वर्तमान वितरण पृथ्वी की सतह का एक महत्वपूर्ण लक्षण है। पृथ्वी की सतह का लगभग 29% भाग महाद्वीपों से तथा लगभग 71% भाग महासागरों से ढका हुआ है। उत्तरी गोलार्ध में महाद्वीपों का क्षेत्रफल अधिक है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में महासागरों का क्षेत्रफल अधिक है। यह विषम वितरण प्राचीन काल से ही वैज्ञानिकों के लिए जिज्ञासा का विषय रहा है। महाद्वीपों और महासागरों के वितरण की व्याख्या के लिए अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं – महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) और प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory)। इन सिद्धांतों से पृथ्वी के गतिशील स्वरूप, महाद्वीपों की स्थिति में परिवर्तन तथा महासागरों के विस्तार को समझा जाता है। इस अध्याय में हम इन सिद्धांतों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
पृथ्वी की सतह के वर्तमान स्वरूप को देखकर यह प्रतीत होता है कि महाद्वीप और महासागर स्थिर हैं, परंतु वैज्ञानिक तथ्य इसके विपरीत हैं। पृथ्वी की सतह निरंतर गतिशील है। लाखों वर्षों में महाद्वीपों की स्थिति बदलती रही है। यही कारण है कि महाद्वीपों के किनारों के आकार आपस में इस प्रकार मिलते हैं कि वे एक बड़े जिग-सॉ पहेली (jigsaw puzzle) की तरह जुड़ते दिखते हैं। उदाहरण के लिए, दक्षिण अमेरिका का पूर्वी तट और अफ्रीका का पश्चिमी तट आपस में बिल्कुल फिट बैठते हैं।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को जर्मन वैज्ञानिक अल्फ्रेड वेगनर (Alfred Wegener) ने 1912 में प्रस्तुत किया। वेगनर के अनुसार, लगभग 20 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी की सभी भूमि एक विशाल महाद्वीप के रूप में संयुक्त थी, जिसे उन्होंने 'पैंजिया' (Pangaea) नाम दिया। इस विशाल महाद्वीप के चारों ओर एक विशाल महासागर था, जिसे 'पैंथलासा' (Panthalassa) कहा गया। बाद में पैंजिया दो भागों में विभक्त हो गया – उत्तरी भाग 'लॉरेशिया' (Laurasia) और दक्षिणी भाग 'गोंडवानालैंड' (Gondwanaland)। इन दोनों भागों के बीच में 'टेथिस सागर' (Tethys Sea) का निर्माण हुआ। वेगनर के अनुसार, इसके बाद ये महाद्वीप धीरे-धीरे अपनी वर्तमान स्थिति में विस्थापित होते चले गए। वेगनर ने अपने सिद्धांत के समर्थन में अनेक साक्ष्य प्रस्तुत किए।
वेगनर के सिद्धांत की सबसे बड़ी कमी यह थी कि वे महाद्वीपों को विस्थापित करने वाली शक्ति (mechanism) का स्पष्टीकरण नहीं दे सके। उन्होंने ज्वारीय शक्ति और पोलवाह (polflucht) शक्ति का उल्लेख किया, परंतु वैज्ञानिक इन शक्तियों को अपर्याप्त मानते हैं। वेगनर ने महाद्वीपों को 'पोलवाह बल' (pole-fleeing force) के कारण भूमध्य रेखा की ओर तथा 'पश्चिमवाह बल' (westward drift) के कारण पश्चिम की ओर गतिशील बताया।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के बाद वैज्ञानिकों ने महासागरों के निचले भाग का अध्ययन किया। 1960 के दशक में हैरी हेस (Harry Hess) ने 'समुद्र-तल प्रसार' (Sea-Floor Spreading) का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत के अनुसार, मध्य-महासागरीय कटकों (Mid-Oceanic Ridges) से नया मैग्मा बाहर निकलता है, जो दोनों ओर फैलकर नई समुद्री पर्पटी का निर्माण करता है। इस प्रक्रिया से महासागरीय तल का विस्तार होता है और महाद्वीप एक-दूसरे से दूर होते जाते हैं। समुद्र-तल प्रसार के प्रमाण महासागरीय तल की चट्टानों के अध्ययन से मिले, जिसमें पाया गया कि मध्य-महासागरीय कटकों के दोनों ओर चट्टानों की आयु सममित रूप से (symmetrically) बढ़ती जाती है। इसके अतिरिक्त महासागरीय तल पर पाई जाने वाली चुंबकीय पट्टियों (magnetic stripes) का प्रतिरूप भी इसका समर्थन करता है।
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत महाद्वीपीय विस्थापन और समुद्र-तल प्रसार दोनों को एकीकृत करता है। यह सिद्धांत 1960 के दशक के अंत में जे. टूज़ो विल्सन, जॉन टूज़ो तथा अन्य वैज्ञानिकों के कार्यों से विकसित हुआ। इस सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी का स्थलमंडल विभिन्न खंडों में विभाजित है, जिन्हें 'विवर्तनिक प्लेटें' (Tectonic Plates) कहते हैं। ये प्लेटें एस्थेनोस्फीयर के ऊपर तैरती हुई निरंतर गतिशील रहती हैं। पृथ्वी को मुख्य रूप से 7 बड़ी प्लेटों तथा कई छोटी प्लेटों में विभाजित किया गया है। प्रमुख प्लेटें हैं – यूरेशियाई प्लेट, उत्तर अमेरिकी प्लेट, दक्षिण अमेरिकी प्लेट, अफ्रीकी प्लेट, इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट, प्रशांत प्लेट तथा अंटार्कटिक प्लेट। भारत इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट का हिस्सा है।
प्लेटों के संचलन के आधार पर उनकी सीमाएँ तीन प्रकार की होती हैं: 1. अभिसरण सीमा (Convergent Boundary) – जब दो प्लेटें आपस में टकराती हैं। टकराव के स्थान पर पर्वतों का निर्माण होता है या एक प्लेट दूसरी के नीचे धंस जाती है (सबडक्शन)। हिमालय का निर्माण भारतीय और यूरेशियाई प्लेट के टकराव से हुआ। 2. अपसरण सीमा (Divergent Boundary) – जब दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं। इस स्थान पर मध्य-महासागरीय कटक बनते हैं तथा नई पर्पटी का निर्माण होता है। 3. अभिसंपीड़न सीमा या रूपांतरित सीमा (Transform Boundary) – जब दो प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर, परंतु विपरीत दिशा में खिसकती हैं। इस सीमा पर भूकंप की घटनाएं अधिक होती हैं, जैसे सैन एंड्रियास फॉल्ट।
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत से पृथ्वी की सतह पर होने वाली अनेक भूगर्भिक घटनाओं की व्याख्या की जाती है। इससे पर्वतों के निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी, सुनामी तथा भूकंपीय क्षेत्रों के वितरण को समझा जा सकता है। भूकंप और ज्वालामुखी अधिकतर प्लेट सीमाओं के पास ही केंद्रित होते हैं। प्रशांत महासागर के चारों ओर प्लेटों की अधिक सक्रियता के कारण 'प्रशांत वलय' (Pacific Ring of Fire) बना है, जहां विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी और भूकंप होते हैं।
पृथ्वी की सतह पर महाद्वीपों और महासागरों का वितरण असमान है। उत्तरी गोलार्ध को 'स्थल गोलार्ध' (Land Hemisphere) कहा जाता है क्योंकि वहां लगभग 61% स्थल भाग है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध को 'जल गोलार्ध' (Water Hemisphere) कहा जाता है क्योंकि वहां लगभग 81% भाग जल से ढका है। महासागरों के वितरण में भी असमानता है। प्रशांत महासागर सबसे बड़ा तथा सबसे गहरा महासागर है। प्रमुख महासागर इस प्रकार हैं – प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर, हिंद महासागर, दक्षिणी महासागर तथा आर्कटिक महासागर। महाद्वीपों की संख्या सात है – एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका। एशिया सबसे बड़ा महाद्वीप है, जबकि ऑस्ट्रेलिया सबसे छोटा महाद्वीप है।
| सिद्धांत | प्रस्तुतकर्ता | वर्ष | मुख्य विचार |
|---|---|---|---|
| महाद्वीपीय विस्थापन | अल्फ्रेड वेगनर | 1912 | पैंजिया का विभाजन होकर महाद्वीपों का विस्थापन |
| समुद्र-तल प्रसार | हैरी हेस | 1960 के दशक | मध्य-महासागरीय कटकों से नई पर्पटी का निर्माण |
| प्लेट विवर्तनिकी | जे. टूज़ो विल्सन आदि | 1960 के दशक | स्थलमंडल का प्लेटों में विभाजन तथा गति |
| प्लेट सीमा | प्रक्रिया | उदाहरण/परिणाम |
|---|---|---|
| अभिसरण सीमा | प्लेटों का टकराव | हिमालय का निर्माण, सबडक्शन |
| अपसरण सीमा | प्लेटों का दूर हटना | मध्य-महासागरीय कटक, नई पर्पटी |
| रूपांतरित सीमा | समानांतर विपरीत खिसकाव | सैन एंड्रियास फॉल्ट, भूकंप |
महाद्वीपों और महासागरों के वितरण का अध्ययन पृथ्वी के गतिशील स्वरूप को समझने में सहायक होता है। पृथ्वी की सतह स्थिर नहीं है, बल्कि निरंतर गतिशील है। वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत, हैरी हेस का समुद्र-तल प्रसार सिद्धांत तथा प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत पृथ्वी की सतह के विकास को स्पष्ट करते हैं। प्रारंभ में सभी महाद्वीप एक विशाल महाद्वीप 'पैंजिया' के रूप में संयुक्त थे, जो बाद में विभक्त होकर वर्तमान स्वरूप में आए। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत से भूकंप, ज्वालामुखी, पर्वत निर्माण और सुनामी जैसी घटनाओं की वैज्ञानिक व्याख्या होती है। प्रशांत वलय क्षेत्र प्लेटों की सक्रियता का प्रमुख उदाहरण है। यह अध्याय पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों तथा सतही परिवर्तनों के बीच संबंध स्थापित करता है और आगे के अध्यायों (भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ, भू-आकृतियाँ) को समझने का आधार प्रदान करता है।