किसी क्षेत्र की नदियों, उनकी सहायक नदियों तथा उनसे जुड़े जल निकायों की संपूर्ण व्यवस्था को 'अपवाह तंत्र' (Drainage System) कहते हैं। जिस क्षेत्र से होकर एक नदी तथा उसकी सहायक नदियाँ बहती हैं, उसे 'अपवाह बेसिन' या 'नदी बेसिन' कहते हैं। भारत का अपवाह तंत्र उसकी भू-आकृति से निकटता से जुड़ा हुआ है। भारत की नदियों को उनकी उत्पत्ति, प्रवाह तथा मार्ग के आधार पर मुख्यतः दो भागों में बांटा गया है – हिमालयी नदियाँ तथा प्रायद्वीपीय नदियाँ। इस अध्याय में हम भारत के अपवाह तंत्र, नदियों के प्रकार तथा प्रमुख नदियों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
भारत का अपवाह तंत्र बहुत जटिल है, जिसमें हजारों नदियाँ और उनकी सहायक नदियाँ शामिल हैं। भारत की प्रमुख नदियों में गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा, तापी, महानदी आदि शामिल हैं। भारत की अधिकांश नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, जबकि कुछ (नर्मदा, तापी, साबरमती) अरब सागर में गिरती हैं।
2. अपवाह तंत्र के प्रकार
भारत की नदियों को उनकी उत्पत्ति, जल की प्रकृति, प्रवाह की प्रकृति तथा बेसिन के आधार पर दो मुख्य भागों में बांटा गया है:
1. हिमालयी अपवाह तंत्र (Himalayan Drainage) – हिमालय से निकलने वाली नदियाँ, जैसे गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र।
2. प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (Peninsular Drainage) – प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियाँ, जैसे गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा, तापी।
हिमालयी नदियों की विशेषताएँ
ये नदियाँ हिमालय के हिमनदों से निकलती हैं, इसलिए इनमें वर्ष भर जल प्रवाहित होता है।
ये नदियाँ अपने पहाड़ी मार्ग में गहरी घाटियाँ, कैनियन, गॉर्ज बनाती हैं तथा मैदानों में विशाल डेल्टा बनाती हैं।
ये नदियाँ युवा नदियाँ हैं, जो अधिक मलबा ढोती हैं।
इन नदियों के उद्गम हिमालय में हैं।
गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ अंतरराष्ट्रीय नदियाँ हैं, क्योंकि ये कई देशों से होकर बहती हैं।
प्रायद्वीपीय नदियों की विशेषताएँ
ये नदियाँ प्रायद्वीपीय पठार से निकलती हैं तथा वर्षा के जल पर निर्भर करती हैं।
इन नदियों में जल की मात्रा मौसम के साथ बदलती है। मानसून के दौरान जल अधिक होता है।
ये नदियाँ प्राचीन नदियाँ हैं, जो लंबे काल से अस्तित्व में हैं। इनकी घाटियाँ परिपक्व हैं।
इन नदियों का मार्ग घुमावदार (meandering) नहीं होता, क्योंकि पठारी क्षेत्र में नदियाँ कठोर चट्टानों से होकर बहती हैं।
प्रायद्वीपीय नदियाँ अपवाह बेसिन के आधार पर प्रवाहित होती हैं।
हिमालयी अपवाह तंत्र में तीन प्रमुख नदी प्रणालियाँ शामिल हैं:
1. सिंधु प्रणाली
2. गंगा प्रणाली
3. ब्रह्मपुत्र प्रणाली
सिंधु प्रणाली
सिंधु नदी तिब्बत के मानसरोवर के निकट सिंगखा बाबा के पास से निकलती है। यह लगभग 2900 किलोमीटर लंबी है। सिंधु नदी तिब्बत में 'सिंगी खंबान' के नाम से जानी जाती है। भारत में सिंधु के प्रमुख सहायक नदियाँ हैं – झेलम, चिनाब, रावी, बियास तथा सतलुज। इन पाँच नदियों के कारण ही पंजाब क्षेत्र का नाम पड़ा (पंच + आब = पाँच जल)। सिंधु नदी अरब सागर में गिरती है। सतलुज सिंधु की सबसे लंबी सहायक नदी है।
गंगा प्रणाली
गंगा नदी उत्तराखंड के गंगोत्री हिमनद से निकलती है। अपने उद्गम स्थल पर इसे 'भागीरथी' कहा जाता है, जो देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर 'गंगा' कहलाती है। गंगा की प्रमुख सहायक नदियाँ हैं – यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी, गोमती, तथा दक्षिण से आने वाली सोन, चंबल, बेतवा। यमुना गंगा की सबसे लंबी सहायक नदी है। गंगा बांग्लादेश में प्रवेश कर ब्रह्मपुत्र से मिलकर विशाल डेल्टा बनाती है। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है। गंगा का जल संगम अंततः बंगाल की खाड़ी में होता है। गंगा को 'बिहार की शोक' कोसी नदी के कारण कहा जाता है, क्योंकि यह बिहार में बाढ़ लाती है।
ब्रह्मपुत्र प्रणाली
ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत में मानसरोवर के निकट चेमायुंगदुंग हिमनद से निकलती है। तिब्बत में इसे 'त्संगपो' कहा जाता है। यह अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, जहां इसे 'दिहांग' तथा असम में 'ब्रह्मपुत्र' कहा जाता है। ब्रह्मपुत्र असम में प्रवेश करने पर दुनिया की सबसे बड़ी नदी द्वीप 'माजुली' बनाती है। ब्रह्मपुत्र बांग्लादेश में 'जमुना' के नाम से प्रवाहित होती है और अंत में गंगा से मिलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ उनके प्रवाह के आधार पर दो भागों में बांटी जाती हैं:
1. पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ – नर्मदा और तापी।
2. पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ – गोदावरी, कृष्णा, महानदी, कावेरी।
पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ
नर्मदा – यह अमरकंटक पठार से निकलती है। यह विंध्य और सतपुड़ा के बीच की दरार घाटी (rift valley) से होकर बहती है। नर्मदा अरब सागर में गिरती है। यह भारत की सबसे बड़ी पश्चिम की ओर बहने वाली नदी है। नर्मदा अपने मार्ग में जलप्रपात और गहरी घाटियाँ बनाती है। नर्मदा पर प्रसिद्ध 'धुआँधार जलप्रपात' स्थित है।
तापी – यह मध्य प्रदेश के बेतुल जिले से निकलती है तथा खंभात की खाड़ी में गिरती है। यह नर्मदा के समान दरार घाटी से होकर बहती है।
पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ
गोदावरी – यह महाराष्ट्र के नासिक जिले के त्र्यंबकेश्वर से निकलती है। यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है (लगभग 1465 किलोमीटर)। इसे 'दक्षिण गंगा' भी कहा जाता है। गोदावरी बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
कृष्णा – यह महाराष्ट्र के महाबलेश्वर से निकलती है। यह प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी सबसे लंबी नदी है। कृष्णा नदी बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
महानदी – यह छत्तीसगढ़ के सिहावा से निकलती है। 'महानदी' का शाब्दिक अर्थ है 'महान नदी'। यह बंगाल की खाड़ी में गिरती है तथा अपने मुहाने पर डेल्टा बनाती है। हीराकुड बांध महानदी पर स्थित है।
कावेरी – यह कर्नाटक के ब्रह्मगिरि पहाड़ियों से निकलती है। कावेरी के डेल्टा क्षेत्र को 'दक्षिण भारत का धान का कटोरा' कहा जाता है। कावेरी बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
पश्चिम की ओर बहने वाली लघु नदियाँ – पश्चिमी घाट से निकलने वाली लघु नदियाँ (जैसे मांडवी, जुआरी) अरब सागर में गिरती हैं।
5. भारतीय अपवाह तंत्र की अन्य विशेषताएँ
भारत की नदियों में अंतर्जातीय नदियाँ भी हैं, जो किसी समुद्र में नहीं गिरतीं, बल्कि अंतर्देशीय बेसिनों में विलीन हो जाती हैं। राजस्थान की घग्गर नदी और लूनी नदी अंतर्जातीय नदियाँ हैं। लूनी नदी रेतीले क्षेत्रों में बहकर समाप्त हो जाती है। भारत के अपवाह तंत्र में अनेक झीलें भी शामिल हैं, जिनमें सांभर झील (भारत की सबसे बड़ी खारी झील), चिल्का झील (लगून), वुलर झील (मीठे जल की सबसे बड़ी झील), डल झील प्रमुख हैं।
भारतीय नदियों का आर्थिक महत्व अत्यधिक है। ये नदियाँ सिंचाई, जल विद्युत, पेयजल, नौवहन तथा मत्स्य पालन के लिए उपयोगी हैं। भारत की प्रमुख नहरों का निर्माण नदियों से किया गया है। गंगा, यमुना जैसी नदियाँ सांस्कृतिक रूप से भी पवित्र मानी जाती हैं।
त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ
नदी प्रणाली
उद्गम
मुहाना
सिंधु
तिब्बत (मानसरोवर)
अरब सागर
गंगा
गंगोत्री हिमनद
बंगाल की खाड़ी
ब्रह्मपुत्र
चेमायुंगदुंग हिमनद
बंगाल की खाड़ी
गोदावरी
त्र्यंबकेश्वर
बंगाल की खाड़ी
नर्मदा
अमरकंटक
अरब सागर
नदी
उपनाम/विशेषता
गोदावरी
दक्षिण गंगा, सबसे लंबी प्रायद्वीपीय नदी
कोसी
बिहार की शोक
यमुना
गंगा की सबसे लंबी सहायक नदी
कावेरी
धान का कटोरा (डेल्टा क्षेत्र)
माइंड मैप
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महत्वपूर्ण आरेख (SVG)
सामान्य गलतियाँ
गंगा के उद्गम को केवल गंगोत्री कहना अधूरा है; नदी गंगोत्री हिमनद से निकलती है, और उद्गम पर इसे 'भागीरथी' कहा जाता है।
गोदावरी को हिमालयी नदी बताना गलत है; गोदावरी प्रायद्वीपीय नदी है, जो त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र) से निकलती है।
नर्मदा को बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदी बताना गलत है; नर्मदा अरब सागर में गिरती है।
यमुना को गंगा की छोटी सहायक नदी बताना गलत है; यमुना गंगा की सबसे लंबी सहायक नदी है।
ब्रह्मपुत्र को तिब्बत में 'गंगा' नाम से जाना जाता है, यह गलत है; तिब्बत में इसे 'त्संगपो' कहा जाता है।
सांभर झील को मीठे जल की झील बताना गलत है; सांभर झील भारत की सबसे बड़ी खारी झील है। वुलर झील मीठे जल की सबसे बड़ी झील है।
सिंधु की सहायक नदियों में कोसी को शामिल करना गलत है; कोसी गंगा की सहायक नदी है। सिंधु की पाँच सहायक नदियाँ झेलम, चिनाब, रावी, बियास और सतलुज हैं।
परीक्षा युक्तियाँ
हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियों के अंतर को सारणी में लिखें।
प्रत्येक नदी के उद्गम और मुहाने का उल्लेख करें।
सिंधु की पाँच सहायक नदियों (झेलम, चिनाब, रावी, बियास, सतलुज) के नाम याद रखें।
गंगा प्रणाली में यमुना, घाघरा, कोसी, सोन के नाम लिखें।
नदियों के उपनाम (गोदावरी-दक्षिण गंगा, कोसी-बिहार की शोक) लिखें।
प्रायद्वीपीय नदियों के उद्गम (त्र्यंबकेश्वर, महाबलेश्वर, अमरकंटक) लिखें।
अंतर्जातीय नदियों (घग्गर, लूनी) का उल्लेख करें तथा प्रमुख झीलों के नाम लिखें।
निष्कर्ष
भारत का अपवाह तंत्र उसकी भू-आकृति से निकटता से जुड़ा है। भारत की नदियाँ मुख्यतः दो प्रकार की हैं – हिमालयी नदियाँ तथा प्रायद्वीपीय नदियाँ। हिमालयी नदियाँ (गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र) हिमनदों से निकलती हैं और वर्ष भर जल प्रवाहित करती हैं, जबकि प्रायद्वीपीय नदियाँ (गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा, तापी, महानदी, कावेरी) पठार से निकलती हैं और वर्षा जल पर निर्भर करती हैं। गंगा भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी है, जो बंगाल की खाड़ी में गिरती है। गोदावरी प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है, जिसे 'दक्षिण गंगा' कहते हैं। नर्मदा और तापी अरब सागर में गिरती हैं। भारतीय नदियाँ सिंचाई, जल विद्युत, पेयजल तथा नौवहन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अपवाह तंत्र का ज्ञान जल संसाधन प्रबंधन और कृषि नियोजन के लिए आवश्यक है।