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1. परिचय

पृथ्वी की सतह निरंतर परिवर्तनशील है। ये परिवर्तन दो प्रकार की शक्तियों द्वारा होते हैं – आंतरिक शक्तियाँ (endogenic forces) और बाह्य शक्तियाँ (exogenic forces)। आंतरिक शक्तियों की उत्पत्ति पृथ्वी के भीतर से होती है, जैसे भूकंप, ज्वालामुखी, प्लेट विवर्तनिकी। बाह्य शक्तियाँ पृथ्वी की सतह पर या उसके ऊपर कार्य करती हैं, जैसे वायु, जल, बर्फ और गुरुत्वाकर्षण। इन शक्तियों के कारण होने वाली प्रक्रियाओं को 'भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ' (Geomorphic Processes) कहते हैं। भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ पृथ्वी की सतह पर स्थलरूपों का निर्माण करती हैं तथा उनमें परिवर्तन लाती हैं। इस अध्याय में हम भू-आकृतिक प्रक्रियाओं – अपक्षय, ढाल प्रक्रियाएँ, अपरदन, संचयन, द्रव्यमान क्षरण तथा अवसादीकरण का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ दो मुख्य प्रकार की होती हैं – (क) स्थलरूप-निर्माण प्रक्रियाएँ (endogenic processes) और (ख) स्थलरूप-अपक्षय प्रक्रियाएँ (exogenic processes)। अंतर्जात प्रक्रियाओं में डायस्ट्रॉफिज्म (वलन, भ्रंशन) और ज्वालामुखीयता शामिल हैं। बाह्य प्रक्रियाओं में अपक्षय, द्रव्यमान क्षरण, अपरदन, संचयन और अवसादीकरण शामिल हैं। बाह्य प्रक्रियाएँ पृथ्वी की सतह को समतल बनाने की दिशा में कार्य करती हैं, जबकि आंतरिक प्रक्रियाएँ सतह पर ऊबड़-खाबड़ रूपों का निर्माण करती हैं। इन दोनों प्रक्रियाओं के बीच निरंतर प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।

2. अपक्षय (Weathering)

अपक्षय वह प्रक्रिया है जिसमें चट्टानें पृथ्वी की सतह पर या उसके निकट वायुमंडलीय एजेंटों (जल, वायु, तापमान, जैविक क्रियाएँ) के प्रभाव से टूट-फूटकर या विघटित होकर छोटे-छोटे कणों में बदल जाती हैं। अपक्षय में चट्टानों का विघटन या वियोजन होता है, परंतु उनके स्थानांतरण (transportation) में अपक्षय क्रिया का कोई भाग नहीं होता। अपक्षय के तीन मुख्य प्रकार हैं – भौतिक अपक्षय, रासायनिक अपक्षय और जैविक अपक्षय।

भौतिक अपक्षय (Physical Weathering)

भौतिक अपक्षय में चट्टानों का भौतिक रूप से टूटना होता है, जिसमें उनकी रासायनिक संरचना में कोई परिवर्तन नहीं होता। भौतिक अपक्षय की प्रमुख प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं: 1. अपघर्षण (Abrasion) – चट्टानों का आपस में या अन्य कणों से टकराकर घिसना। 2. अवशोषण (Exfoliation) – तापमान में परिवर्तन के कारण चट्टानों की बाहरी परतों का छिलकों की तरह उतरना। इसे 'छिलका उतारना' भी कहते हैं। 3. तापमान परिवर्तन – दिन में उच्च तापमान तथा रात में निम्न तापमान के कारण चट्टानों में खिंचाव और सिकुड़ाव होता है, जिससे चट्टानें टूटती हैं। यह मरुस्थलीय क्षेत्रों में अधिक सक्रिय होता है। 4. जमाव और पिघलाव (Freezing and Thawing) – चट्टानों की दरारों में जमा जल ठंड के कारण जमकर फैलता है, जिससे दरारें चौड़ी होती हैं। इसे 'हिमशिलन' (Frost Wedging) कहते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में यह प्रक्रिया अधिक सक्रिय है। 5. लवण क्रिया (Salt Crystallization) – गर्म मरुस्थलों में लवणों के जमाव के कारण चट्टानें टूटती हैं। 6. जैविक प्रक्रियाएँ – पेड़ों की जड़ें चट्टानों की दरारों में फैलकर उन्हें चौड़ा करती हैं।

रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering)

रासायनिक अपक्षय में चट्टानों की रासायनिक संरचना में परिवर्तन होता है। इसके प्रमुख कारक जल, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अम्ल हैं। रासायनिक अपक्षय की प्रमुख प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं: 1. विलयन (Solution) – कुछ खनिज जल में घुल जाते हैं। जैसे सेंधा नमक और जिप्सम। 2. कार्बोनेशन (Carbonation) – वायुमंडल की कार्बन डाइऑक्साइड जल में घुलकर कार्बोनिक अम्ल बनाती है, जो चूना पत्थर को विघटित करता है। कार्बोनेशन के कारण ही कार्स्ट भू-आकृतियाँ (गुफाएँ, घाटी, स्टैलैक्टाइट-स्टैलैग्माइट) बनती हैं। 3. हाइड्रेशन (Hydration) – जल के अणुओं के खनिजों में मिलने से उनके आयतन में वृद्धि होती है और चट्टानें टूटती हैं। 4. ऑक्सीकरण (Oxidation) – ऑक्सीजन के प्रभाव से लौह युक्त खनिजों में रासायनिक परिवर्तन होता है। लोहे के कणों पर जंग लग जाता है। 5. अपचयन (Reduction) – ऑक्सीजन की कमी की स्थिति में खनिजों का ऑक्सीकरण नहीं होता, जिससे उनके रंग और संरचना में परिवर्तन होता है। 6. हाइड्रोलिसिस (Hydrolysis) – जल के साथ खनिजों की रासायनिक अभिक्रिया से नए खनिजों का निर्माण होता है। फेल्सपार से काओलाइट (मृत्तिका) का निर्माण इसका उदाहरण है।

जैविक अपक्षय (Biological Weathering)

जैविक अपक्षय में जीवों (वनस्पतियों, जंतुओं, सूक्ष्म जीवों) की क्रियाओं द्वारा चट्टानों का विघटन होता है। पेड़ों की जड़ों का दबाव, जंतुओं द्वारा बिल खोदना, लाइकेन और काई द्वारा अम्ल का स्राव जैविक अपक्षय के उदाहरण हैं।

3. ढाल प्रक्रियाएँ और द्रव्यमान क्षरण (Mass Wasting)

ढाल एक ऐसी सतह है जो क्षैतिज स्तर से झुकी हुई होती है। ढाल प्रक्रियाओं में ढाल के नीचे की ओर वस्तुओं की गति होती है। जब चट्टानों या मृदा का विस्थापन गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में होता है, तो उसे 'द्रव्यमान क्षरण' (Mass Wasting) कहते हैं। द्रव्यमान क्षरण में अपरदनकारी एजेंटों (जल, वायु) की तुलना में गुरुत्वाकर्षण का अधिक योगदान होता है। द्रव्यमान क्षरण के प्रकार हैं: 1. मंद गति (Slow movements) – मृदा सर्पण (soil creep) तथा सोलिफ्लक्शन। मृदा सर्पण में ढाल पर मृदा की ऊपरी परत बहुत धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकती है। 2. तीव्र गति (Rapid movements) – भूस्खलन (landslides), चट्टान खिसकाव (rock slides) तथा मलबा बहाव (debris flow)। अधिक वर्षा, भूकंप तथा मानवीय क्रियाओं के कारण भूस्खलन होते हैं।

4. अपरदन (Erosion) और संचयन (Deposition)

अपरदन वह प्रक्रिया है जिसमें चट्टानों या मृदा के कणों को बहकर (जल, वायु, बर्फ द्वारा) एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है। अपरदन के एजेंट नदियाँ, पवन, हिमनद, समुद्री लहरें तथा भूजल हैं। अपक्षय के बाद चट्टानों के कण ढीले हो जाते हैं, और तब अपरदनकारी एजेंट उन्हें स्थानांतरित करते हैं। जब ये एजेंट अपनी गति को कम करते हैं, तो ढोए गए पदार्थ को जमा कर देते हैं; इस प्रक्रिया को 'संचयन' या 'निक्षेपण' (Deposition) कहते हैं। संचयन से मैदानी स्थलरूपों का निर्माण होता है, जैसे जलोढ़ पंख, वर्षा बेसिन, तटबंध। अपरदन और संचयन दोनों मिलकर पृथ्वी की सतह को समतल करते हैं। भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के कारण धरातल की ऊँची-नीची बनावट कम होती जाती है; इस प्रक्रिया को 'सामान्यीकरण' (gradation) कहते हैं।

अपरदन के प्रमुख एजेंट

  1. नदियाँ – नदी जल अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण का प्रमुख एजेंट है। नदी द्वारा अपरदन तीन प्रकार से होता है – घर्षण (abrasion), अपवाहन (attrition) और विलयन (solution)।
  2. पवन – शुष्क एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन प्रमुख एजेंट है। पवन द्वारा वहन (deflation) और घर्षण होता है।
  3. हिमनद – ठंडे प्रदेशों में हिमनद बर्फ के विशाल प्रवाह होते हैं जो चट्टानों को घिसकर अपरदन करते हैं।
  4. भूजल – चूना पत्थर वाले क्षेत्रों में भूजल विलयन द्वारा कार्स्ट भू-आकृतियाँ बनाता है।
  5. समुद्री लहरें – तटीय क्षेत्रों में लहरों द्वारा अपरदन होता है।

5. भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने वाले कारक

भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की गति और तीव्रता को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं: 1. जलवायु – जलवायु अपक्षय और अपरदन का सबसे महत्वपूर्ण नियंत्रक कारक है। उष्ण आर्द्र जलवायु में रासायनिक अपक्षय अधिक होता है, जबकि शुष्क और ठंडे क्षेत्रों में भौतिक अपक्षय प्रधान होता है। 2. स्थलाकृति – ढाल की तीव्रता तथा ऊँचाई अपरदन की दर को प्रभावित करती है। तीव्र ढाल पर अपरदन अधिक होता है। 3. चट्टानों की प्रकृति – चट्टानों की कठोरता, संरचना और परतें अपक्षय की दर निर्धारित करती हैं। कठोर चट्टानों में अपक्षय धीमा होता है। 4. वनस्पति आवरण – वनस्पति मृदा को स्थिर रखकर अपरदन को कम करती है। 5. समय – लंबे समय तक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ कार्य करने पर अधिक प्रभावी होती हैं।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

अपक्षय का प्रकार प्रमुख प्रक्रियाएँ विशेषता
भौतिक अपक्षय तापमान परिवर्तन, हिमशिलन, अवशोषण, लवण क्रिया संरचना में परिवर्तन नहीं होता
रासायनिक अपक्षय विलयन, कार्बोनेशन, ऑक्सीकरण, हाइड्रोलिसिस रासायनिक संरचना में परिवर्तन
जैविक अपक्षय जड़ों का दबाव, अम्ल स्राव, बिल खोदना जीवों द्वारा चट्टानों का विघटन
अपरदन एजेंट क्षेत्र मुख्य भू-आकृति
नदी आर्द्र प्रदेश घाटी, जलोढ़ पंख, डेल्टा
पवन शुष्क/मरुस्थलीय बलुचट्टान, स्तूप, रेत का टिब्बा
हिमनद उच्च अक्षांश/पर्वतीय U-आकार घाटी, हिमोढ़
भूजल चूना पत्थर क्षेत्र गुफाएँ, कार्स्ट भू-आकृति
समुद्री लहरें तटीय क्षेत्र क्लिफ, समुद्री सोपान

माइंड मैप

graph TD A["भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ"] --> B["अपक्षय"] A --> C["द्रव्यमान क्षरण"] A --> D["अपरदन"] A --> E["संचयन"] B --> B1["भौतिक अपक्षय"] B --> B2["रासायनिक अपक्षय"] B --> B3["जैविक अपक्षय"] B1 --> B1a["तापमान, हिमशिलन"] B2 --> B2a["कार्बोनेशन, ऑक्सीकरण"] D --> D1["नदी"] D --> D2["पवन"] D --> D3["हिमनद"] E --> E1["जलोढ़ पंख, तटबंध"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

अपक्षय के प्रकार अपक्षय भौतिक अपक्षय तापमान, हिमशिलन, अवशोषण रासायनिक अपक्षय विलयन, कार्बोनेशन, ऑक्सीकरण जैविक अपक्षय जड़ें, अम्ल स्राव, बिल खोदना महत्वपूर्ण तथ्य कार्बोनेशन से चूना पत्थर का विघटन होकर कार्स्ट भू-आकृतियाँ बनती हैं फेल्सपार के हाइड्रोलिसिस से काओलाइट (मृत्तिका) का निर्माण होता है भौतिक अपक्षय में रासायनिक संरचना अपरिवर्तित रहती है स्वर्ण नियम अपक्षय में पदार्थ स्थिर रहता है; परिवहन अपरदन का कार्य है।
अपरदन से संचयन तक की प्रक्रिया अपक्षय चट्टानों का टूटना अपरदन कणों का स्थानांतरण परिवहन जल/वायु द्वारा ढोना संचयन निक्षेपण अपरदन के प्रमुख एजेंट नदी | पवन | हिमनद | भूजल | समुद्री लहरें प्रत्येक एजेंट अपनी विशिष्ट भू-आकृतियों का निर्माण करता है संचयन से बनने वाली भू-आकृतियाँ जलोढ़ पंख | डेल्टा | तटबंध | रेत के टिब्बे | हिमोढ़ स्वर्ण नियम अपरदन और संचयन मिलकर धरातल को समतल (सामान्यीकरण) करते हैं।

सामान्य गलतियाँ

  1. अपक्षय और अपरदन को एक ही प्रक्रिया मान लेना सबसे आम गलती है; अपक्षय में पदार्थ का परिवहन नहीं होता, जबकि अपरदन में परिवहन होता है।
  2. भौतिक अपक्षय में रासायनिक संरचना में परिवर्तन मान लेना गलत है; भौतिक अपक्षय में केवल आकार का टूटना होता है।
  3. कार्बोनेशन को सिलिकेट चट्टानों से जोड़ना गलत है; कार्बोनेशन चूना पत्थर जैसी कार्बोनेट चट्टानों को विघटित करता है।
  4. द्रव्यमान क्षरण का कारण केवल पानी मान लेना गलत है; इसका मुख्य कारण गुरुत्वाकर्षण है।
  5. ऑक्सीकरण को जल की अभिक्रिया से जोड़ना गलत है; ऑक्सीकरण ऑक्सीजन के प्रभाव से होता है, जबकि हाइड्रोलिसिस जल से होता है।
  6. हिमशिलन (frost wedging) को केवल मरुस्थलीय क्षेत्रों में होने वाली प्रक्रिया बताना गलत है; यह पर्वतीय ठंडे क्षेत्रों में अधिक सक्रिय है।
  7. अपक्षय को केवल तापमान से जोड़कर रासायनिक एवं जैविक प्रक्रियाओं को अनदेखा करना गलत है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. अपक्षय के तीन प्रकारों के अंतर को सारणी में लिखें; यह उत्तर को स्पष्ट बनाता है।
  2. रासायनिक अपक्षय की प्रक्रियाओं के साथ उदाहरण (कार्बोनेशन-गुफा, हाइड्रोलिसिस-काओलाइट, ऑक्सीकरण-जंग) अवश्य लिखें।
  3. द्रव्यमान क्षरण में गुरुत्वाकर्षण की भूमिका को स्पष्ट करें तथा मंद और तीव्र गति के उदाहरण दें।
  4. अपरदन एजेंटों के साथ उनके क्षेत्र और भू-आकृतियाँ लिखें, क्योंकि यह बिंदु प्रायः परीक्षा में पूछा जाता है।
  5. अपक्षय और अपरदन में अंतर को स्पष्ट करने वाला एक तुलनात्मक कथन लिखें।
  6. भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने वाले कारकों में जलवायु को सबसे महत्वपूर्ण कारक बताएं।
  7. चित्रात्मक प्रस्तुति के लिए प्रक्रियाओं का क्रम (अपक्षय → अपरदन → परिवहन → संचयन) लिखें।

निष्कर्ष

भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ पृथ्वी की सतह को निरंतर रूपांतरित करती हैं। आंतरिक शक्तियाँ सतह पर ऊँचाई और विषमताएँ उत्पन्न करती हैं, जबकि बाह्य शक्तियाँ (अपक्षय, अपरदन, संचयन) सतह को समतल बनाने का कार्य करती हैं। अपक्षय के भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रकार चट्टानों को विघटित करते हैं, जिसके बाद अपरदनकारी एजेंट (नदी, पवन, हिमनद, भूजल, लहरें) उन कणों का परिवहन और निक्षेपण करते हैं। द्रव्यमान क्षरण में गुरुत्वाकर्षण के कारण चट्टानों और मृदा का ढाल के साथ विस्थापन होता है। जलवायु, स्थलाकृति, चट्टानों की प्रकृति, वनस्पति आवरण और समय भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की गति को नियंत्रित करते हैं। इस अध्याय का ज्ञान आगामी अध्याय 'भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास' को समझने के लिए आधारभूत है, क्योंकि उसमें इन्हीं प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप बनने वाली विभिन्न स्थलाकृतियों का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा।