पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अध्ययन भूगोल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। मनुष्य की प्रत्यक्ष पहुंच पृथ्वी के आंतरिक भाग तक नहीं है। सबसे गहरा विज्ञानिक बोरहोल (कोला, रूस) लगभग 12 किलोमीटर गहरा है, जो पृथ्वी की त्रिज्या (लगभग 6371 किलोमीटर) की तुलना में नगण्य है। अतः पृथ्वी के आंतरिक भाग की जानकारी अप्रत्यक्ष विधियों से प्राप्त की जाती है। इन विधियों में भूकंपीय तरंगों का अध्ययन (Seismology), उल्कापिंडों (Meteorites) का अध्ययन, पृथ्वी के घनत्व और गुरुत्वाकर्षण का अध्ययन तथा चट्टानों के विश्लेषण प्रमुख हैं। इन विधियों के आधार पर ही वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की आंतरिक संरचना को तीन मुख्य परतों में बांटा है – भूपर्पटी (Crust), मेंटल (Mantle) और क्रोड (Core)। इस अध्याय में हम पृथ्वी की आंतरिक संरचना, इसकी परतों की विशेषताओं, घनत्व, तापमान तथा दाब का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
पृथ्वी की सतह का लगभग 71% भाग महासागरों से घिरा है तथा 29% भाग भूमि से। पृथ्वी की सतह से भीतर की ओर तापमान तथा दाब में निरंतर वृद्धि होती जाती है। सतह पर तापमान लगभग 15 डिग्री सेल्सियस होता है, जो केंद्र की ओर बढ़कर लगभग 6000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। पृथ्वी का औसत घनत्व लगभग 5.5 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है, जबकि सतह की चट्टानों का घनत्व लगभग 2.7 से 3.0 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है। इस घनत्व में अंतर से पता चलता है कि पृथ्वी के केंद्र की ओर भारी तत्वों (जैसे लोहा और निकल) का घनत्व अधिक है।
पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के लिए मुख्य रूप से दो प्रकार की विधियाँ उपयोग में लाई जाती हैं – प्रत्यक्ष साक्ष्य तथा अप्रत्यक्ष साक्ष्य। प्रत्यक्ष साक्ष्य में ज्वालामुखी विस्फोटों से निकला मैग्मा, खदानों से प्राप्त चट्टानों के नमूने तथा गहरे बोरहोल से प्राप्त सामग्री शामिल है। इन प्रत्यक्ष साक्ष्यों से केवल पृथ्वी के ऊपरी भाग की जानकारी मिलती है। पृथ्वी के गहरे आंतरिक भाग की जानकारी अप्रत्यक्ष विधियों से मिलती है, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं:
भूकंपीय तरंगों का अध्ययन – यह पृथ्वी के आंतरिक भाग के अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण विधि है। भूकंप के समय दो प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती हैं – P (प्राथमिक) तरंगें और S (द्वितीयक) तरंगें। P तरंगें अनुदैर्ध्य तरंगें होती हैं जो ठोस, तरल और गैस, तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं। S तरंगें अनुप्रस्थ तरंगें होती हैं जो केवल ठोस माध्यम से गुजर सकती हैं। जब S तरंगें तरल माध्यम में पहुंचती हैं, तो वे अवशोषित हो जाती हैं। S तरंगों के अवशोषण से यह ज्ञात हुआ कि पृथ्वी का बाहरी क्रोड तरल अवस्था में है। इसके अतिरिक्त, तरंगों के वेग में परिवर्तन से विभिन्न परतों की सीमाओं का पता चलता है।
उल्कापिंडों का अध्ययन – पृथ्वी पर गिरने वाले उल्कापिंडों की संरचना से पृथ्वी के आंतरिक भाग की संरचना का अनुमान लगाया जाता है, क्योंकि उल्कापिंड उसी सामग्री से बने होते हैं जिससे सौरमंडल का निर्माण हुआ था। उल्कापिंडों में पाए जाने वाले लौह-निकल मिश्रण से यह अनुमान लगाया गया कि पृथ्वी का क्रोड लोहे और निकल से बना है।
अन्य अप्रत्यक्ष विधियाँ – पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण, घनत्व और दाब के अध्ययन से भी आंतरिक संरचना की जानकारी मिलती है। पृथ्वी के केंद्र में दाब अत्यधिक होता है, जो लगभग 3.6 लाख वायुमंडल के बराबर है। इसी प्रकार पृथ्वी के औसत घनत्व 5.5 ग्राम/घन सेंटीमीटर तथा सतही चट्टानों के घनत्व 2.7 ग्राम/घन सेंटीमीटर के अंतर से यह स्पष्ट होता है कि गहराई के साथ घनत्व बढ़ता जाता है।
भूपर्पटी पृथ्वी की सबसे बाहरी तथा सबसे पतली परत है। इसकी मोटाई औसतन 8 से 40 किलोमीटर है। महासागरीय भागों में यह परत लगभग 5 से 8 किलोमीटर मोटी होती है, जबकि महाद्वीपीय भागों में इसकी मोटाई लगभग 35 से 40 किलोमीटर तक होती है। पर्वतीय क्षेत्रों में, जैसे हिमालय में, यह 70 किलोमीटर तक मोटी हो सकती है। भूपर्पटी मुख्य रूप से सिलिकेट खनिजों से बनी होती है। महाद्वीपीय भूपर्पटी मुख्यतः ग्रेनाइट (सिलिका और एल्युमिनियम) से बनी होती है, जिसे 'सियाल' (Sial) कहते हैं, जबकि महासागरीय भूपर्पटी मुख्यतः बेसाल्ट (सिलिका और मैग्नीशियम) से बनी होती है, जिसे 'सिमा' (Sima) कहते हैं। भूपर्पटी में कार्बनिक पदार्थ तथा जल की मात्रा सर्वाधिक होती है। भूपर्पटी की निचली सीमा को 'मोहोरोविसिक असातत्य' (Mohorovicic discontinuity, संक्षेप में मोहो) कहते हैं।
भूपर्पटी के नीचे लगभग 35 किलोमीटर से लेकर 2900 किलोमीटर तक की परत को मेंटल कहते हैं। मेंटल की मोटाई लगभग 2850 किलोमीटर है, जो पृथ्वी के आयतन का लगभग 84% है। मेंटल की ऊपरी परत को 'एस्थेनोस्फीयर' कहते हैं, जिसमें आंशिक रूप से पिघला हुआ मैग्मा विद्यमान रहता है। एस्थेनोस्फीयर के ऊपर स्थित भूपर्पटी और ठोस ऊपरी मेंटल को मिलाकर 'स्थलमंडल' (Lithosphere) कहते हैं। मेंटल में सिलिका और मैग्नीशियम की प्रधानता होती है, इसलिए इसे 'सिमा' कहा जाता है। मेंटल की सबसे निचली सीमा को 'गुटेनबर्ग असातत्य' (Gutenberg discontinuity) कहते हैं, जो लगभग 2900 किलोमीटर की गहराई पर स्थित है। मेंटल में तापमान और दाब दोनों अत्यधिक होते हैं। तापमान लगभग 1000 से 3700 डिग्री सेल्सियस तक होता है। मेंटल में उपस्थित पदार्थों के संवहनी गति (convection currents) के कारण ही प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) की प्रक्रिया संचालित होती है।
मेंटल के नीचे स्थित केंद्रीय भाग को क्रोड कहते हैं। क्रोड की गहराई 2900 किलोमीटर से लेकर 6371 किलोमीटर तक है। क्रोड मुख्य रूप से लोहा (Fe) और निकल (Ni) से बना है, इसलिए इसे 'निफे' (Nife) भी कहते हैं। क्रोड को दो भागों में बांटा गया है – बाहरी क्रोड तथा आंतरिक क्रोड। बाहरी क्रोड लगभग 2900 से 5150 किलोमीटर तक फैला हुआ है और यह तरल अवस्था में है, क्योंकि S तरंगें वहां अवशोषित हो जाती हैं। आंतरिक क्रोड लगभग 5150 किलोमीटर से केंद्र तक फैला हुआ है तथा यह अत्यधिक दाब के कारण ठोस अवस्था में है। केंद्र में तापमान लगभग 6000 डिग्री सेल्सियस है, जो सूर्य की सतह के तापमान के लगभग बराबर है। केंद्र पर दाब लगभग 3.6 मिलियन वायुमंडल (लगभग 360 लाख वायुमंडल) से अधिक होता है। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण बाहरी क्रोड में तरल लोहे के संचलन से होता है।
पृथ्वी की विभिन्न परतों के बीच की सीमाओं को 'असातत्य' कहते हैं। ये असातत्य उन स्थानों को दर्शाती हैं जहां भूकंपीय तरंगों के वेग में अचानक परिवर्तन होता है। प्रमुख असातत्य निम्नलिखित हैं: 1. मोहोरोविसिक असातत्य (मोहो) – भूपर्पटी और मेंटल के बीच की सीमा। 2. गुटेनबर्ग असातत्य – मेंटल और क्रोड के बीच की सीमा, जो 2900 किलोमीटर की गहराई पर स्थित है। 3. लेहमन असातत्य – बाहरी क्रोड और आंतरिक क्रोड के बीच की सीमा, जो लगभग 5150 किलोमीटर की गहराई पर है।
इसके अतिरिक्त मेंटल के भीतर कोंराड असातत्य (ऊपरी और निचले क्रस्ट के बीच) तथा रेपिटी असातत्य (ऊपरी और निचले मेंटल के बीच) भी पाई जाती हैं।
आधुनिक भू-वैज्ञानिक अध्ययनों से पृथ्वी की आंतरिक संरचना की नई जानकारियां प्राप्त हुई हैं। भूकंपीय अनुचुंबकीय परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी का क्रोड लोहे और निकल से बना है। यह जानकारी उल्कापिंडों के अध्ययन से भी पुष्ट होती है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी के क्रोड में लोहे के साथ-साथ कुछ मात्रा में सल्फर और ऑक्सीजन भी हो सकता है। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन यह दर्शाता है कि बाहरी क्रोड में तरल लोहे का संचलन होता है, जो धारा उत्पन्न कर चुंबकीय क्षेत्र (जियोडायनेमो प्रभाव) का निर्माण करता है। अतः पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की उत्पत्ति बाहरी क्रोड से मानी जाती है।
| परत | गहराई | संरचना | औसत मोटाई |
|---|---|---|---|
| भूपर्पटी (Crust) | 0-35 किमी | सियाल (ग्रेनाइट) और सिमा (बेसाल्ट) | 8-40 किमी |
| मेंटल (Mantle) | 35-2900 किमी | सिलिका और मैग्नीशियम | लगभग 2850 किमी |
| क्रोड (Core) | 2900-6371 किमी | लोहा और निकल (निफे) | लगभर 3471 किमी |
| असातत्य | स्थिति | गहराई |
|---|---|---|
| मोहोरोविसिक (मोहो) | भूपर्पटी और मेंटल के बीच | लगभग 35 किमी |
| गुटेनबर्ग | मेंटल और क्रोड के बीच | लगभग 2900 किमी |
| लेहमन | बाहरी और आंतरिक क्रोड के बीच | लगभग 5150 किमी |
पृथ्वी की आंतरिक संरचना प्रत्यक्ष रूप से देखने योग्य नहीं है, फिर भी भूकंपीय तरंगों, उल्कापिंडों, घनत्व, गुरुत्वाकर्षण और तापमान के अध्ययन से इसके बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई है। पृथ्वी तीन मुख्य परतों – भूपर्पटी, मेंटल और क्रोड से बनी है। भूपर्पटी पृथ्वी की सबसे पतली परत है, जो सियाल और सिमा से बनी है। मेंटल पृथ्वी के आयतन का सबसे बड़ा भाग है, जिसमें एस्थेनोस्फीयर स्थित है। क्रोड लोहे और निकल से बना है, जिसका बाहरी भाग तरल तथा आंतरिक भाग ठोस है। विभिन्न असातत्यों (मोहो, गुटेनबर्ग, लेहमन) द्वारा इन परतों की सीमाओं को चिन्हित किया जाता है। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की उत्पत्ति बाहरी क्रोड के तरल लोहे के संचलन से मानी जाती है। इस अध्याय का ज्ञान प्लेट विवर्तनिकी, भूकंप, ज्वालामुखी तथा पृथ्वी के गतिशील स्वरूप को समझने के लिए आधारभूत है।