🌍
🗺️
🧭
🏔️
🌋
← डैशबोर्ड पर वापस जाएँ
Font Size:

1. परिचय

भू-आकृतियाँ पृथ्वी की सतह के वे स्थलरूप हैं जो आंतरिक और बाह्य शक्तियों की क्रियाओं के फलस्वरूप बनते हैं। भू-आकृतियों के निर्माण में अपरदनकारी एजेंटों – नदी, पवन, हिमनद, भूजल और समुद्री लहरें – का महत्वपूर्ण योगदान होता है। ये एजेंट चट्टानों का अपरदन करके विभिन्न भू-आकृतियाँ बनाते हैं तथा अपरदित पदार्थ का संचयन करके भी अनेक स्थलरूपों का निर्माण करते हैं। प्रत्येक एजेंट अपनी विशिष्ट प्रकृति के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार की भू-आकृतियाँ बनाता है। इस अध्याय में हम नदियों, पवन, हिमनदों, भूजल तथा समुद्री लहरों द्वारा निर्मित विभिन्न भू-आकृतियों तथा उनके विकास का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

भू-आकृतियों के अध्ययन में दो प्रकार के स्थलरूपों का वर्णन किया जाता है – (क) अपरदनजन्य भू-आकृतियाँ तथा (ख) निक्षेपणजन्य भू-आकृतियाँ। अपरदनजन्य भू-आकृतियाँ एजेंटों द्वारा चट्टानों को घिसने से बनती हैं, जबकि निक्षेपणजन्य भू-आकृतियाँ ढोए गए पदार्थ के जमाव से बनती हैं। उदाहरण के लिए, नदी द्वारा बनी गॉर्ज (गहरी घाटी) अपरदनजन्य है, जबकि डेल्टा निक्षेपणजन्य भू-आकृति है।

2. नदी द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ

नदियाँ भूमि की सतह पर जल के प्रवाह द्वारा अपरदन, परिवहन और संचयन करती हैं। नदी के द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ दो भागों में विभाजित की जा सकती हैं – अपरदनजन्य तथा निक्षेपणजन्य।

नदी की अपरदनजन्य भू-आकृतियाँ

  1. घाटी (Valley) – नदी अपरदन से V-आकार की घाटियाँ बनती हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में नदी गहरी घाटी बनाती है। जब घाटी अत्यधिक गहरी और संकरी होती है, तो उसे 'गॉर्ज' (Gorge) या 'कैनियन' (Canyon) कहते हैं। ग्रांड कैनियन विश्व की सबसे प्रसिद्ध कैनियन है।
  2. जलप्रपात (Waterfall) – जब नदी का जल ऊँचाई से गिरता है, तो जलप्रपात बनता है। कठोर और नरम चट्टानों के अपरदन में अंतर के कारण जलप्रपात बनते हैं।
  3. रैपिड्स और पोट-होल्स (Rapids and Potholes) – नदी तल में कठोर चट्टानों के कारण रैपिड्स तथा जल के भँवरों द्वारा पोट-होल्स बनते हैं।
  4. प्लंज पूल – जलप्रपात के नीचे जल के गिरने से गहरा गड्ढा बनता है, जिसे प्लंज पूल कहते हैं।
  5. अंतर्जात घाटी (Intermontane Valley) – पहाड़ों के बीच की घाटियाँ।

नदी की निक्षेपणजन्य भू-आकृतियाँ

  1. जलोढ़ पंख (Alluvial Fans) – जब नदी पर्वतीय भाग से मैदानी भाग में प्रवेश करती है, तो उसके वेग में कमी आती है और वह मलबा अर्धवृत्ताकार रूप में जमा कर देती है। इसे जलोढ़ पंख कहते हैं।
  2. प्राकृतिक तटबंध (Natural Levees) – बाढ़ के समय नदी अपने किनारों पर जलोढ़ पदार्थ जमा करती है, जिससे प्राकृतिक तटबंध बनते हैं।
  3. गोखुर झील (Oxbow Lake) – नदी के मैदानी भाग में नदी मोड़ (meanders) बनाती है। जब मोड़ बहुत अधिक विकसित हो जाते हैं, तो वे नदी से अलग होकर घोड़े की नाल के आकार की झील बना देते हैं, जिसे गोखुर झील कहते हैं।
  4. डेल्टा (Delta) – जब नदी समुद्र या झील में गिरती है, तो उसके द्वारा ढोया गया जलोढ़ पदार्थ समुद्र में जमा होकर डेल्टा बनाता है। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है।
  5. बाढ़ के मैदान (Flood Plains) – नदी के दोनों किनारों पर बाढ़ के समय जलोढ़ पदार्थ का जमाव होता है, जिससे बाढ़ के मैदान बनते हैं।

3. पवन द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ

पवन शुष्क एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों का प्रमुख अपरदनकारी एजेंट है। मरुस्थल में वर्षा कम होती है तथा वनस्पति का आवरण नहीं होता, इसलिए पवन का अपरदन तथा परिवहन अधिक होता है। पवन द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ निम्नलिखित हैं:

पवन की अपरदनजन्य भू-आकृतियाँ

  1. चट्टानी खंभे (Rock Pedestals) – पवन के बहाव के कारण चट्टानों के आधार का अधिक अपरदन होता है, जिससे चट्टानें खंभे की तरह दिखती हैं।
  2. स्तूप (Zeugen) – कठोर और नरम चट्टानों की क्षैतिज परतों वाले क्षेत्रों में नरम परतों के अपरदन से स्तूप बनते हैं।
  3. बलुचट्टान (Inselberg) – मरुस्थल में कठोर चट्टानों के अवशेष, जो अपरदन से बच जाते हैं, ऊँचे टीलों की तरह दिखते हैं। इन्हें बलुचट्टान या इनसेलबर्ग कहते हैं।
  4. यारडांग (Yardang) – समानांतर चट्टानों के कटाव से बनने वाली लंबी संकरी लकीरें।
  5. पवन-अपघर्षण (Ventifacts) – पवन द्वारा घिसी हुई चट्टानें।

पवन की निक्षेपणजन्य भू-आकृतियाँ

  1. रेत के टिब्बे (Sand Dunes) – पवन द्वारा ढोई गई रेत के जमाव से टिब्बे बनते हैं। अर्धचंद्राकार टिब्बों को 'बरखान' (Barchan) कहते हैं।
  2. बालू की लहरें (Sand Ripples) – रेत के टिब्बों के नीचे छोटी लहरदार बनावट।
  3. लोस (Loess) – पवन द्वारा ढोई गई महीन मृदा का जमाव, जो उपजाऊ मृदा होती है। चीन में लोस का विशाल भंडार है।

4. हिमनद द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ

हिमनद बर्फ के विशाल प्रवाह हैं, जो उच्च अक्षांशों और ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। हिमनद अपरदन और निक्षेपण दोनों कार्य करते हैं।

हिमनद की अपरदनजन्य भू-आकृतियाँ

  1. यू-आकार घाटी (U-shaped Valley) – हिमनद की क्रिया से संकरी V-आकार घाटियाँ चौड़ी यू-आकार घाटियों में बदल जाती हैं। इन्हें हिमनदी घाटियाँ भी कहते हैं।
  2. सर्क (Cirque) – हिमनद द्वारा पर्वत के शिखर पर बनाया गया अर्धवृत्ताकार अवकाश (गड्ढा)।
  3. हॉर्न (Horn) – जब तीन या अधिक सर्क मिलकर एक नुकीली चोटी बनाते हैं, तो उसे हॉर्न कहते हैं। मैटरहॉर्न (स्विट्जरलैंड) इसका प्रसिद्ध उदाहरण है।
  4. अरेटे (Arete) – दो हिमनदों के बीच की नुकीली लकीर।
  5. हिमनदी फ़ियोर्ड – समुद्र में मिलने वाली गहरी हिमनदी घाटियाँ, जैसे नॉर्वे में।

हिमनद की निक्षेपणजन्य भू-आकृतियाँ

  1. हिमोढ़ (Moraines) – हिमनद द्वारा ढोए गए पदार्थ का जमाव। ये अंतस्थ, पार्श्व, मध्यस्थ और आधारस्थ हिमोढ़ होते हैं।
  2. एस्कर (Esker) – हिमनद के नीचे बहने वाले जल द्वारा बनाई गई लंबी संकरी लकीरें।
  3. ड्रमलिन (Drumlin) – हिमनदी मृदा का लंबी उलटी चम्मच के आकार का टीला।
  4. केम (Kame) – हिमनद के किनारे जमा हुआ मलबा।
  5. टिल और अर्धसरित प्रस्तर (Till and Erratics) – हिमनद द्वारा ढोए गए चट्टानी अवशेष।

5. भूजल द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ

भूजल चूना पत्थर वाले क्षेत्रों में विलयन (कार्बोनेशन) द्वारा विशेष भू-आकृतियाँ बनाता है। इन भू-आकृतियों को 'कार्स्ट भू-आकृतियाँ' कहते हैं। प्रमुख कार्स्ट भू-आकृतियाँ निम्नलिखित हैं: 1. सिंक होल (Sink Holes) – भूजल द्वारा चूना पत्थर का विलयन होने से सतह पर बने गड्ढे। 2. लैपीज़ (Lapies) – चूना पत्थर की सतह पर बनी संकरी खाइयाँ तथा लकीरें। 3. गुफाएँ (Caves) – भूजल द्वारा चूना पत्थर का विलयन होने से भूमिगत गुफाओं का निर्माण होता है। 4. स्टैलैक्टाइट (Stalactite) – गुफाओं की छत से लटकती हुई चूना पत्थर की संरचनाएँ। 5. स्टैलैग्माइट (Stalagmite) – गुफाओं के तल से ऊपर उठती हुई चूना पत्थर की संरचनाएँ। 6. कार्स्ट खिड़की तथा भूमिगत नदियाँ – चूना पत्थर क्षेत्रों में भूमिगत नदियाँ तथा उनके कारण बनी खिड़कियाँ।

6. समुद्री लहरों द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ

समुद्री लहरें तटीय क्षेत्रों में अपरदन और निक्षेपण का प्रमुख एजेंट हैं।

अपरदनजन्य भू-आकृतियाँ

  1. क्लिफ (Cliff) – समुद्री लहरों के लगातार टकराव से तट पर खड़ी चट्टानी दीवारें बनती हैं।
  2. समुद्री सोपान (Sea Caves) – क्लिफ में लहरों द्वारा बनाई गई गुफाएँ।
  3. समुद्री धनुष (Sea Arch) – क्लिफ में बने आर्क।
  4. स्टैक (Stack) – क्लिफ के अलग होने से बना खड़ा चट्टानी खंभा।
  5. समुद्री सोपान या वेव-कट प्लेटफार्म – लहरों के अपरदन से तट पर बना समतल मंच।

निक्षेपणजन्य भू-आकृतियाँ

  1. समुद्री तट (Beach) – लहरों द्वारा ढोए गए रेत और कंकड़ का जमाव।
  2. थूक (Spit) – तट से समुद्र की ओर बढ़ती हुई रेत की संकरी पट्टी।
  3. बार (Bar) – समुद्र में रेत की बाधा, जो खाड़ी को अलग करती है।
  4. लगून (Lagoon) – बार के पीछे बना उथला जल क्षेत्र। चिल्का झील (भारत) लगून का उदाहरण है।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

एजेंट अपरदनजन्य भू-आकृति निक्षेपणजन्य भू-आकृति
नदी गॉर्ज, जलप्रपात, कैनियन डेल्टा, गोखुर झील, जलोढ़ पंख
पवन बलुचट्टान, स्तूप, यारडांग रेत के टिब्बे, बरखान, लोस
हिमनद यू-आकार घाटी, सर्क, हॉर्न हिमोढ़, ड्रमलिन, एस्कर
भूजल गुफाएँ, सिंक होल, लैपीज़ स्टैलैक्टाइट, स्टैलैग्माइट
समुद्री लहरें क्लिफ, स्टैक, सी कैव समुद्री तट, थूक, बार, लगून
भू-आकृति विशेषता
गोखुर झील घोड़े की नाल के आकार की झील
बरखान अर्धचंद्राकार रेत का टिब्बा
हॉर्न तीन या अधिक सर्क से बनी नुकीली चोटी
लगून बार के पीछे बना उथला जल क्षेत्र

माइंड मैप

graph TD A["भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास"] --> B["नदी"] A --> C["पवन"] A --> D["हिमनद"] A --> E["भूजल"] A --> F["समुद्री लहरें"] B --> B1["डेल्टा, जलोढ़ पंख, गोखुर झील"] C --> C1["टिब्बे, बरखान, लोस"] D --> D1["यू-आकार घाटी, हिमोढ़"] E --> E1["गुफाएँ, स्टैलैक्टाइट"] F --> F1["क्लिफ, थूक, लगून"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

नदी द्वारा निर्मित भू-आकृतियाँ अपरदनजन्य नदी निक्षेपणजन्य गॉर्ज / कैनियन गहरी संकरी घाटी जलप्रपात पोट-होल्स डेल्टा जलोढ़ पंख गोखुर झील बाढ़ के मैदान महत्वपूर्ण उदाहरण ग्रांड कैनियन – विश्व की प्रसिद्ध कैनियन गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा – विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा स्वर्ण नियम नदी अपरदन से घाटियाँ तथा निक्षेपण से डेल्टा बनाती है।
प्रमुख भू-आकृतियों की पहचान हिमनद: हॉर्न और सर्क तीन या अधिक सर्क मिलकर नुकीली चोटी बनाते हैं भूजल: गुफाएँ विलयन से बनी भूमिगत गुफाएँ पवन: बरखान अर्धचंद्राकार रेत का टिब्बा समुद्री लहरें: क्लिफ लहरों के टकराव से खड़ी चट्टानी दीवार भूजल: स्टैलैक्टाइट गुफाओं की छत से लटकती संरचना भूजल: स्टैलैग्माइट गुफाओं के तल से ऊपर उठती संरचना स्वर्ण नियम हॉर्न = सर्क + सर्क; यू-आकार घाटी केवल हिमनद बनाता है।

सामान्य गलतियाँ

  1. यू-आकार घाटी को नदी द्वारा बनी घाटी बताना गलत है; नदी V-आकार घाटी बनाती है, जबकि यू-आकार घाटी हिमनद द्वारा बनती है।
  2. डेल्टा और गोखुर झील को अपरदनजन्य भू-आकृति बताना गलत है; ये दोनों निक्षेपणजन्य भू-आकृतियाँ हैं।
  3. स्टैलैक्टाइट और स्टैलैग्माइट को उलट-पुलट कर लिखना सामान्य गलती है; स्टैलैक्टाइट छत से लटकती है और स्टैलैग्माइट तल से उठती है।
  4. लोस को हिमनद द्वारा बनी भू-आकृति बताना गलत है; लोस पवन द्वारा ढोई गई महीन मृदा का जमाव है।
  5. कैनियन को हिमनदी भू-आकृति समझना गलत है; ग्रांड कैनियन नदी द्वारा बनी है।
  6. चिल्का झील को डेल्टा बताना गलत है; चिल्का एक लगून है, जो बार के पीछे बना उथला जल क्षेत्र है।
  7. सर्क और हॉर्न को एक ही भू-आकृति मान लेना गलत है; सर्क अर्धवृत्ताकार गड्ढा है, जबकि हॉर्न नुकीली चोटी है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. प्रत्येक एजेंट के अंतर्गत कम से कम तीन अपरदनजन्य और तीन निक्षेपणजन्य भू-आकृतियों के नाम लिखें।
  2. भू-आकृतियों के नाम के साथ एक-एक प्रसिद्ध उदाहरण (ग्रांड कैनियन, गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा, चिल्का लगून) लिखें।
  3. गोखुर झील के निर्माण की प्रक्रिया (मोड़ → कटाव → अलगाव) को क्रम में लिखें।
  4. कार्स्ट भू-आकृतियों का उल्लेख करते समय 'कार्बोनेशन' प्रक्रिया का नाम लिखें।
  5. हिमनदी भू-आकृतियों के अंतर्गत यू-आकार घाटी, सर्क, हॉर्न और हिमोढ़ अनिवार्य रूप से लिखें।
  6. तटीय भू-आकृतियों में लगून और बार की परिभाषा स्पष्ट करें तथा उदाहरण दें।
  7. चित्र के साथ उत्तर देते समय भू-आकृति का नाम और उसका एजेंट दोनों लिखें।

निष्कर्ष

भू-आकृतियाँ पृथ्वी की सतह के वे स्थलरूप हैं जो विभिन्न अपरदनकारी एजेंटों की क्रियाओं से बनती हैं। नदियाँ गॉर्ज, जलप्रपात, जलोढ़ पंख, गोखुर झील और डेल्टा बनाती हैं। पवन मरुस्थलीय क्षेत्रों में बलुचट्टान, स्तूप, यारडांग, रेत के टिब्बे और लोस का निर्माण करती है। हिमनद यू-आकार घाटी, सर्क, हॉर्न, अरेटे तथा हिमोढ़ जैसी भू-आकृतियाँ बनाते हैं। भूजल चूना पत्थर क्षेत्रों में कार्स्ट भू-आकृतियों – गुफाएँ, सिंक होल, स्टैलैक्टाइट-स्टैलैग्माइट – का निर्माण करता है। समुद्री लहरें क्लिफ, स्टैक, समुद्री तट, थूक और लगून जैसी तटीय भू-आकृतियाँ बनाती हैं। प्रत्येक एजेंट की भू-आकृतियों का ज्ञान परीक्षा के साथ-साथ पृथ्वी की सतह के निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए भी आवश्यक है। यह अध्याय पिछले अध्याय 'भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ' के ज्ञान का व्यावहारिक अनुप्रयोग प्रस्तुत करता है।