प्राकृतिक वनस्पति से तात्पर्य मानव के हस्तक्षेप के बिना प्राकृतिक रूप से उगने वाले वनस्पति समुदाय से है। यह वनस्पति जलवायु, मृदा तथा भू-आकृति के अनुकूल स्वाभाविक रूप से विकसित होती है। भारत की प्राकृतिक वनस्पति अत्यंत विविध है, क्योंकि भारत में जलवायु, वर्षा, तापमान तथा मृदा की विविधता पाई जाती है। भारत में वनस्पति को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं – वर्षा, तापमान, मृदा, ऊंचाई तथा पवन। इस अध्याय में हम भारत की प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार, वनों का वितरण तथा वन संरक्षण का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
भारत में प्राकृतिक वनस्पति के अध्ययन को 'वनस्पति भूगोल' कहा जाता है। भारत में वर्षा की मात्रा के अनुसार वनस्पति का वितरण होता है। उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में घने वन, मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में शुष्क पर्णपाती वन तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कांटेदार वनस्पति पाई जाती है।
भारत में वनस्पति के वितरण को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं: 1. वर्षा – वर्षा की मात्रा वनस्पति के प्रकार को निर्धारित करती है। 200 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन, 100-200 सेंटीमीटर वाले क्षेत्रों में आर्द्र पर्णपाती वन, 70-100 सेंटीमीटर वाले क्षेत्रों में शुष्क पर्णपाती वन तथा 50-70 सेंटीमीटर वाले क्षेत्रों में कांटेदार वनस्पति पाई जाती है। 2. तापमान – तापमान के आधार पर उष्णकटिबंधीय, उपोष्ण, शीतोष्ण तथा पर्वतीय वनस्पति का विभाजन होता है। 3. मृदा – मृदा की प्रकृति वनस्पति के प्रकार को प्रभावित करती है। रेतीली मृदा में कांटेदार वनस्पति तथा जलोढ़ मृदा में आर्द्र वनस्पति पाई जाती है। 4. ऊंचाई – ऊंचाई के साथ वनस्पति में परिवर्तन होता है। पर्वतीय क्षेत्रों में तलहटी से शिखर तक वनस्पति के स्तर बदलते हैं। 5. भू-आकृति – ढाल तथा स्थलाकृति वनस्पति के वितरण को प्रभावित करती है।
भारत की प्राकृतिक वनस्पति को निम्नलिखित प्रमुख प्रकारों में बांटा गया है:
ये वन 200 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा तथा उच्च तापमान वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन वनों में वृक्ष साल भर हरे रहते हैं, इसलिए इन्हें 'सदाबहार' वन कहते हैं। ये वन पश्चिमी घाट, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तथा पूर्वोत्तर भारत में पाए जाते हैं। इन वनों में सागौन, शीशम, महोगनी, रबर, आबनूस जैसे वृक्ष पाए जाते हैं। इन वनों की लकड़ी अत्यंत कठोर होती है। इन वनों में जैव विविधता सर्वाधिक होती है।
ये वन 100 से 200 सेंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन वनों को 'मानसूनी वन' भी कहते हैं। इन वनों में वृक्ष शुष्क ऋतु में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। ये भारत के सबसे व्यापक वन हैं। इनमें सागौन, शीशम, साल, महुआ, आम जैसे वृक्ष पाए जाते हैं। ये वन उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र तथा छत्तीसगढ़ में पाए जाते हैं।
ये वन 70 से 100 सेंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन वनों में वृक्षों के बीच दूरी अधिक होती है। इनमें खैर, टेसू, अमलतास जैसे वृक्ष पाए जाते हैं। ये वन पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक तथा तमिलनाडु में पाए जाते हैं।
यह वनस्पति 50 सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों (राजस्थान, गुजरात के कुछ भाग) में पाई जाती है। इनमें कांटेदार झाड़ियाँ, बबूल, खेजड़ी, बेर, कीकर जैसे पौधे पाए जाते हैं। ये पौधे शुष्क जलवायु में अनुकूलित होते हैं, जिनमें जल धारण करने की क्षमता होती है।
ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में ऊंचाई के अनुसार वनस्पति बदलती है। हिमालय में तलहटी से शिखर तक निम्नलिखित वनस्पति क्षेत्र मिलते हैं: 1. 1000-2000 मीटर तक – उपोष्ण वन (ओक, चीड़)। 2. 2000-3000 मीटर तक – शीतोष्ण वन (चीड़, देवदार, फर, स्प्रूस)। 3. 3000 मीटर से ऊपर – अल्पाइन वनस्पति (घास, झाड़ियाँ)।
मैंग्रोव वन नदी के मुहाने पर तथा समुद्री तट के ज्वारीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। ये वन खारे जल में उगते हैं। सुंदरबन (पश्चिम बंगाल) विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन क्षेत्र है। मैंग्रोव वनों में सुंदरी वृक्ष प्रमुख है। ये वन तटीय क्षेत्रों को सुनामी और चक्रवात से बचाते हैं।
ज्वारीय वन नदी डेल्टा क्षेत्रों में ज्वार-भाटा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में ये वन पाए जाते हैं।
भारत में वनों का क्षेत्रफल धीरे-धीरे घट रहा है। वनों की कटाई, शहरीकरण तथा औद्योगिकीकरण से वनों का क्षरण हो रहा है। भारत में वन संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय किए गए हैं: 1. वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 – इस अधिनियम के अंतर्गत बिना अनुमति के वनों की कटाई पर प्रतिबंध लगाया गया। 2. राष्ट्रीय वन नीति 1952 तथा 1988 – वन क्षेत्र को 33% तक बढ़ाने का लक्ष्य। 3. सामाजिक वानिकी (Social Forestry) – गांवों में वृक्षारोपण को बढ़ावा देना। 4. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 – वन्यजीवों और उनके आवासों का संरक्षण। 5. वृहत वृक्षारोपण अभियान – नए वृक्ष लगाने के कार्यक्रम।
वन भारतीय अर्थव्यवस्था तथा पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं: 1. वनों से लकड़ी, ईंधन, रबर, राल, गोंद, औषधियाँ तथा अन्य वन उत्पाद प्राप्त होते हैं। 2. वन आजीविका का साधन प्रदान करते हैं, विशेषकर आदिवासी समुदायों को। 3. वन ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं। 4. वन मृदा क्षरण को रोकते हैं तथा जल चक्र को नियंत्रित करते हैं। 5. वन वन्यजीवों का आवास प्रदान करते हैं। 6. वन तापमान को नियंत्रित करते हैं तथा प्रदूषण कम करते हैं।
| वन का प्रकार | वर्षा | क्षेत्र | प्रमुख वृक्ष |
|---|---|---|---|
| सदाबहार वन | 200+ सेमी | पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर | सागौन, महोगनी, रबर |
| आर्द्र पर्णपाती | 100-200 सेमी | मध्य भारत | सागौन, साल, शीशम |
| शुष्क पर्णपाती | 70-100 सेमी | पंजाब, कर्नाटक | खैर, टेसू |
| कांटेदार वनस्पति | 50 सेमी से कम | राजस्थान | बबूल, खेजड़ी |
| मैंग्रोव | ज्वारीय | सुंदरबन | सुंदरी |
| संरक्षण उपाय | वर्ष |
|---|---|
| वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम | 1972 |
| वन (संरक्षण) अधिनियम | 1980 |
| राष्ट्रीय वन नीति | 1952, 1988 |
भारत की प्राकृतिक वनस्पति जलवायु, वर्षा, तापमान, मृदा तथा ऊंचाई से नियंत्रित होती है। भारत में वर्षा के अनुसार सदाबहार, आर्द्र पर्णपाती, शुष्क पर्णपाती तथा कांटेदार वन पाए जाते हैं। पश्चिमी घाट तथा पूर्वोत्तर भारत में सदाबहार वन, मध्य भारत में आर्द्र पर्णपाती वन, राजस्थान में कांटेदार वनस्पति, हिमालय में पर्वतीय वन तथा सुंदरबन में मैंग्रोव वन पाए जाते हैं। आर्द्र पर्णपाती वन भारत के सबसे व्यापक वन हैं। वनों की कटाई से वन क्षेत्र घट रहा है, जिसके कारण वन (संरक्षण) अधिनियम 1980, राष्ट्रीय वन नीति तथा सामाजिक वानिकी जैसे उपाय किए गए हैं। वन ऑक्सीजन उत्पादन, मृदा संरक्षण, जल चक्र नियंत्रण तथा आजीविका के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। वन संरक्षण पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास के लिए अनिवार्य है।