पृथ्वी की उत्पत्ति और विकास के संबंध में प्रारंभ से ही मानव की जिज्ञासा रही है। प्राचीन काल में इस प्रश्न के उत्तर पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं में खोजे जाते थे। विभिन्न सभ्यताओं में पृथ्वी की उत्पत्ति के बारे में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित थीं। बाद में वैज्ञानिकों ने इस समस्या का हल ढूंढने का प्रयास किया और अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए। आधुनिक विज्ञान में पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंध में सर्वाधिक मान्य सिद्धांत 'आधुनिक द्विग्रह परिकल्पना' (Modern Nebular Hypothesis) है। यह परिकल्पना जर्मन विद्वान इमैनुएल कांट तथा फ्रांसीसी गणितज्ञ पियरे साइमन लाप्लास से संबंधित है। इसके अनुसार, पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों का निर्माण एक घूमते हुए नीहारिका (Nebula) यानी गैस और धूल के बादल से हुआ। इस अध्याय में हम पृथ्वी की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धांतों, पृथ्वी के विकास की अवस्थाओं तथा उससे जुड़े प्रमुख घटनाक्रम का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंध में दिए गए अनेक सिद्धांतों को दो मुख्य वर्गों में बांटा जा सकता है – (क) द्विग्रह परिकल्पना (Nebular Hypothesis) तथा (ख) ग्रहों का अभिग्रहण या सूर्य-केन्द्रित सिद्धांत। द्विग्रह परिकल्पना में ग्रहों का निर्माण सूर्य के साथ-साथ एक ही गैसीय बादल से होता है, जबकि अभिग्रहण सिद्धांत के अनुसार ग्रहों का निर्माण सूर्य से अलग होकर हुआ है। इसी प्रकार अनेक वैज्ञानिकों ने विभिन्न कालों में अपने-अपने सिद्धांत दिए हैं, जिनमें प्रत्येक सिद्धांत की अपनी विशेषताएँ और कमियाँ हैं।
पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंध में सबसे प्राचीन वैज्ञानिक सिद्धांत जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट (1755) और फ्रांसीसी गणितज्ञ पियरे साइमन लाप्लास (1796) द्वारा दिया गया 'द्विग्रह परिकल्पना' है। इस परिकल्पना के अनुसार, प्रारंभ में अंतरिक्ष में एक विशाल गैसीय बादल था जिसे 'नीहारिका' कहा गया। यह नीहारिका धीरे-धीरे ठंडी होकर सिकुड़ने लगी और इसका घूर्णन तेज होने लगा। घूर्णन की गति बढ़ने के कारण इससे बाहरी भाग अलग होकर छल्लों (rings) में परिणत हो गए। इन्हीं छल्लों से बाद में ग्रहों का निर्माण हुआ। परंतु इस परिकल्पना में यह समस्या उत्पन्न हुई कि सूर्य के घूर्णन की गति उस गति के अनुरूप नहीं है जो इस परिकल्पना से अपेक्षित है। इसीलिए वैज्ञानिकों ने बाद में इस परिकल्पना में सुधार किए।
बाद में चैंबरलिन और मोल्टन (1900) ने 'ग्रहाणु परिकल्पना' (Planetesimal Hypothesis) प्रस्तुत की, जिसके अनुसार सूर्य के समीप से गुजरते हुए किसी तारे ने सूर्य के कुछ भाग को बाहर निकाल दिया, और उसी पदार्थ से ग्रहों का निर्माण हुआ। इसके पश्चात जेम्स जींस और हेरोल्ड जेफ्रीज़ (1925) ने 'ज्वारीय परिकल्पना' (Tidal Hypothesis) प्रस्तुत की। इसके अनुसार, सूर्य के समीप से गुजरते हुए एक बड़े तारे के गुरुत्वाकर्षण के कारण सूर्य से लावा बाहर निकला, जिससे ग्रहों का निर्माण हुआ। फ्रेड हॉयल (1950) ने 'सुपरनोवा परिकल्पना' प्रस्तुत की, जिसके अनुसार सूर्य का कोई साथी तारा विस्फोट (सुपरनोवा) हुआ और उसके टुकड़ों से ग्रहों का निर्माण हुआ। इन सभी सिद्धांतों की कुछ न कुछ कमियाँ थीं। अंततः 1950 के दशक में ओटो श्मिट और कार्ल वेशसाल्टर ने 'आधुनिक द्विग्रह परिकल्पना' का संशोधित रूप प्रस्तुत किया। इसके अनुसार, लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व एक घूमते हुए गैस-धूल के बादल (सौर नीहारिका) से सूर्य तथा ग्रहों का निर्माण एक साथ हुआ। इस बादल का केंद्रीय भाग सूर्य बना तथा बाहरी भाग से ग्रहों की उत्पत्ति हुई। यही परिकल्पना आज सर्वाधिक मान्य है।
आधुनिक युग में ग्रहों की उत्पत्ति को समझने के लिए विभिन्न अंतरिक्ष यानों द्वारा प्राप्त आंकड़ों का उपयोग किया गया है। अंतरिक्ष में गैस और धूल के बादलों के अवलोकन से वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि नवजात तारों के चारों ओर पदार्थ की परिक्रमा करती हुई चक्रिकाएँ (accretion disks) पाई जाती हैं। इन चक्रिकाओं में पदार्थ धीरे-धीरे संघनित होकर छोटे-छोटे पिंडों (planetesimals) का निर्माण करता है, जो आपस में टकराकर बड़े पिंडों में विकसित होते हैं और अंततः ग्रहों का रूप लेते हैं। इस प्रक्रिया को 'अभिवर्धन' (accretion) कहा जाता है। इसी तरह, चंद्रमा की उत्पत्ति के संबंध में सबसे अधिक मान्य सिद्धांत 'महा-टक्कर सिद्धांत' (Giant Impact Hypothesis) है, जिसके अनुसार लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व मंगल के आकार के एक पिंड (जिसे 'थिया' कहा गया) के पृथ्वी से टकराने पर उसका कुछ भाग अंतरिक्ष में निकला, जिससे चंद्रमा का निर्माण हुआ। इस सिद्धांत से चंद्रमा की चट्टानों में मिली सामग्री की समानता की व्याख्या होती है।
पृथ्वी के विकास का अध्ययन करने के लिए यह जानना आवश्यक है कि आज पृथ्वी की सतह पर जो स्थिति दिखती है वह धीरे-धीरे विकसित हुई है। प्रारंभ में पृथ्वी एक पिघली हुई अवस्था में थी। जब यह ठंडी होने लगी, तब इसके बाहरी भाग में ठोस परत का निर्माण हुआ। इस परत को 'क्रस्ट' या भूपर्पटी कहते हैं। समय के साथ-साथ पृथ्वी के भीतर स्थित गर्म पदार्थ (मैग्मा) बाहर निकलकर जमा होता गया। ज्वालामुखी विस्फोटों के कारण गैसों का उत्सर्जन हुआ, जिससे वायुमंडल का निर्माण हुआ। प्रारंभिक वायुमंडल में ऑक्सीजन नहीं थी; इसमें हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन, अमोनिया तथा जलवाष्प जैसी गैसें थीं। पृथ्वी के ठंडा होने पर जलवाष्प संघनित हुआ और वर्षा के रूप में गिरा, जिससे महासागरों का निर्माण हुआ। इस प्रकार स्थलमंडल, वायुमंडल और जलमंडल का क्रमशः विकास हुआ। इसके बाद जैवमंडल का विकास हुआ, जिसमें जीवों की उत्पत्ति हुई।
वायुमंडल के विकास की तीन अवस्थाएँ मानी जाती हैं। पहली अवस्था में प्रारंभिक वायुमंडल का निर्माण सूर्य की हाइड्रोजन तथा हीलियम गैसों से हुआ, परंतु यह वायुमंडल कुछ ही समय में लुप्त हो गया क्योंकि सूर्य से आने वाली ऊर्जा से ये हल्की गैसें बाहर निकल गईं। दूसरी अवस्था में ज्वालामुखी विस्फोटों से निकली गैसों (जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, मीथेन, अमोनिया) से वायुमंडल का निर्माण हुआ। तीसरी अवस्था में जलवायु ठंडी होने पर जलवाष्प संघनित हुआ, और वर्षा से महासागरों का निर्माण हुआ। इसके पश्चात प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया से ऑक्सीजन का उत्पादन हुआ। लगभग 2 अरब वर्ष पूर्व आज के वायुमंडल की स्थिति विकसित हुई, जिसमें नाइट्रोजन (78%) और ऑक्सीजन (21%) प्रमुख गैसें हैं।
पृथ्वी के ठंडा होने पर वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प संघनित होकर बादलों में बदल गया। बादलों से लगातार वर्षा हुई और निम्न भू-भागों में जल एकत्र होता गया। इस प्रकार प्राथमिक महासागरों का निर्माण हुआ। यह प्रक्रिया लगभग 3.8 अरब वर्ष पूर्व प्रारंभ हुई थी। महासागरों में घुले खनिज लवणों के कारण समुद्री जल खारा हुआ। इस प्रकार जलमंडल का विकास स्थलमंडल और वायुमंडल के विकास के साथ-साथ हुआ।
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवन की उत्पत्ति लगभग 3.5 से 4 अरब वर्ष पूर्व महासागरों में हुई। वैज्ञानिकों के अनुसार जीवन का विकास क्रमिक रूप से हुआ। जलवायु और पर्यावरणीय परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ जीवों में विकास हुआ। सबसे पहले जलीय जीवों की उत्पत्ति हुई, फिर स्थलीय जीवों की। इस प्रकार जैवमंडल का विकास स्थलमंडल, जलमंडल और वायुमंडल के विकास के बाद हुआ।
पृथ्वी की आयु का निर्धारण 'रेडियोमेट्रिक काल-निर्धारण' (Radiometric Dating) विधि से किया गया है। इस विधि में चट्टानों में उपस्थित रेडियोधर्मी तत्वों (जैसे यूरेनियम, पोटैशियम, कार्बन-14) के क्षय के आधार पर चट्टानों की आयु ज्ञात की जाती है। रेडियोमेट्रिक काल-निर्धारण के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष है। सबसे पुरानी ज्ञात चट्टानों की आयु लगभग 4 अरब वर्ष है, जबकि पृथ्वी पर मिले सबसे पुराने खनिज कण (ज़िरकोन) की आयु लगभग 4.4 अरब वर्ष बताई जाती है। चंद्रमा से प्राप्त चट्टानों के नमूनों की आयु भी लगभग 4.4 से 4.5 अरब वर्ष मापी गई है। पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास को 'भूवैज्ञानिक समयमान' (Geological Time Scale) में बांटा गया है, जिसमें युगों (Eras), कल्पों (Periods) और युगान्तरों (Epochs) का विभाजन किया गया है। इस समयमान के माध्यम से पृथ्वी पर जीवन के विकास और भूवैज्ञानिक घटनाओं का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है।
| सिद्धांत | प्रस्तुतकर्ता | वर्ष | मुख्य विचार |
|---|---|---|---|
| द्विग्रह परिकल्पना | इमैनुएल कांट | 1755 | गैसीय नीहारिका से ग्रहों का निर्माण |
| द्विग्रह परिकल्पना | लाप्लास | 1796 | सिकुड़ती नीहारिका से छल्ले बनकर ग्रहों का निर्माण |
| ग्रहाणु परिकल्पना | चैंबरलिन और मोल्टन | 1900 | सूर्य के निकट से गुजरते तारे से पदार्थ निकलकर ग्रहों का निर्माण |
| ज्वारीय परिकल्पना | जेम्स जींस और हेरोल्ड जेफ्रीज़ | 1925 | तारे के गुरुत्वाकर्षण से निकले लावा से ग्रहों का निर्माण |
| सुपरनोवा परिकल्पना | फ्रेड हॉयल | 1950 | साथी तारे के विस्फोट से ग्रहों का निर्माण |
| मंडल | विकास का माध्यम | विशेषता |
|---|---|---|
| स्थलमंडल | पृथ्वी के ठंडा होने से | भूपर्पटी का निर्माण |
| वायुमंडल | ज्वालामुखी विस्फोट तथा जलवाष्प संघनन | नाइट्रोजन (78%) और ऑक्सीजन (21%) |
| जलमंडल | जलवाष्प के संघनन से वर्षा | प्राथमिक महासागरों का निर्माण |
| जैवमंडल | जीवन की उत्पत्ति | जलीय से स्थलीय जीवों का विकास |
पृथ्वी की उत्पत्ति और विकास का अध्ययन भूगोल की सबसे महत्वपूर्ण विषय-वस्तु है। प्राचीन काल से ही मानव इस प्रश्न में रुचि रखता आया है कि पृथ्वी कैसे बनी। कांट, लाप्लास, चैंबरलिन, जींस, जेफ्रीज़ और फ्रेड हॉयल जैसे वैज्ञानिकों के सिद्धांतों के माध्यम से इस प्रश्न के उत्तर खोजे गए। आधुनिक द्विग्रह परिकल्पना के अनुसार लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व एक गैस-धूल के बादल से सूर्य और ग्रहों का एक साथ निर्माण हुआ। इसके पश्चात पृथ्वी के ठंडा होने से स्थलमंडल का निर्माण हुआ, ज्वालामुखी गैसों से वायुमंडल का विकास हुआ, जलवाष्प के संघनन से जलमंडल बना और अंततः जैवमंडल में जीवन की उत्पत्ति हुई। पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष है, जो रेडियोमेट्रिक काल-निर्धारण से ज्ञात हुई। इस अध्याय का ज्ञान भूगोल के अन्य अध्यायों, विशेषकर पृथ्वी की आंतरिक संरचना और महाद्वीपीय विस्थापन को समझने की नींव रखता है।