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1. परिचय

मृदा (Soil) पृथ्वी की सतह की वह ऊपरी ढीली परत है, जिसमें खनिज कण, कार्बनिक पदार्थ, जल, वायु तथा जीव सम्मिलित होते हैं। मृदा का निर्माण चट्टानों के अपक्षय से होता है। मृदा जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह वनस्पति का आधार है तथा कृषि के लिए अनिवार्य है। मृदा का निर्माण मूल चट्टान, जलवायु, वनस्पति, स्थलाकृति तथा समय के प्रभाव से होता है। इस अध्याय में हम मृदा निर्माण की प्रक्रिया, मृदा के प्रकार तथा मृदा संरक्षण का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

भारत में विभिन्न प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं, जो जलवायु, चट्टानों और वनस्पति के भिन्न-भिन्न होने के कारण हैं। मृदा का अध्ययन कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है। भारत में मृदाओं को वर्गीकृत करने की अनेक पद्धतियाँ हैं।

2. मृदा निर्माण की प्रक्रिया (Soil Formation)

मृदा का निर्माण चट्टानों के अपक्षय से होता है। अपक्षय की प्रक्रियाओं (भौतिक, रासायनिक, जैविक) से चट्टानें टूटकर छोटे कणों में बदल जाती हैं। मृदा निर्माण में निम्नलिखित कारकों का योगदान होता है: 1. मूल चट्टान (Parent Rock) – मृदा का निर्माण जिस चट्टान से होता है, वह मृदा के खनिज संघटन को निर्धारित करती है। 2. जलवायु – जलवायु मृदा निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण कारक है। तापमान तथा वर्षा अपक्षय की दर को निर्धारित करते हैं। 3. वनस्पति – वनस्पति मृदा में कार्बनिक पदार्थ (ह्यूमस) प्रदान करती है। 4. स्थलाकृति – ढाल और ऊंचाई मृदा के निर्माण को प्रभावित करती है। 5. समय – मृदा के विकास के लिए लंबा समय आवश्यक होता है। 6. जैव कारक – सूक्ष्म जीव, केंचुए तथा अन्य जीव मृदा में कार्बनिक पदार्थ मिलाकर उसकी उर्वरता बढ़ाते हैं।

मृदा परतें (Soil Profile)

मृदा की अनुप्रस्थ काट को 'मृदा परतें' (Soil Profile) कहते हैं। इसमें विभिन्न क्षितिज (horizons) होते हैं: 1. A-क्षितिज (O क्षितिज) – सबसे ऊपरी परत, जिसमें कार्बनिक पदार्थ अधिक होते हैं। 2. B-क्षितिज – मध्यम परत, जिसमें खनिज तथा नीचे बहकर आए पदार्थ जमा होते हैं। 3. C-क्षितिज – नीचे की परत, जिसमें अपक्षयित चट्टानों के टुकड़े होते हैं। 4. D-क्षितिज (आधार चट्टान) – सबसे नीचे की कठोर चट्टान।

3. भारत की प्रमुख मृदाएँ (Major Soils of India)

भारत में मृदाओं का वर्गीकरण उनकी उत्पत्ति, संरचना तथा वितरण के आधार पर किया जाता है। भारत की प्रमुख मृदाएँ निम्नलिखित हैं:

जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)

जलोढ़ मृदा भारत की सबसे महत्वपूर्ण तथा सबसे व्यापक मृदा है। यह उत्तरी मैदान (सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान) में पाई जाती है। इसका निर्माण नदियों द्वारा ढोए गए अवसादों के जमाव से हुआ है। जलोढ़ मृदा में पोटाश और चूना पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है, परंतु नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी होती है। जलोढ़ मृदा अत्यंत उपजाऊ है। इसे दो भागों में बांटा गया है – नवीन जलोढ़ (खादर) तथा प्राचीन जलोढ़ (भांगर)। जलोढ़ मृदा गेहूं, धान, गन्ना तथा दलहन की खेती के लिए उपयुक्त है।

काली मृदा (Black Soil)

काली मृदा को 'रेगुर' या 'कपासी मृदा' भी कहते हैं। यह दक्कन के पठार (महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश) में पाई जाती है। इसका निर्माण ज्वालामुखीय लावा (बेसाल्ट) के अपक्षय से हुआ है। काली मृदा में नमी धारण करने की क्षमता सबसे अधिक होती है। इसमें चूना, मैग्नीशियम, लोहा तथा एल्युमिनियम पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। काली मृदा कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त है, इसलिए इसे 'कपासी मृदा' कहते हैं। यह मृदा गीली होने पर चिपचिपी तथा सूखने पर दरारों वाली हो जाती है।

लाल और पीली मृदा (Red and Yellow Soil)

लाल मृदा पूर्वी भारत (ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश के कुछ भाग) में पाई जाती है। इसका लाल रंग लोहे के ऑक्साइड की अधिकता के कारण होता है। पीली मृदा उन क्षेत्रों में मिलती है जहां जलोढ़ मृदा निम्न स्तर पर पाई जाती है। लाल मृदा में लोहे की मात्रा अधिक होती है तथा इसमें उर्वरता कम होती है।

लैटेराइट मृदा (Laterite Soil)

लैटेराइट मृदा उच्च तापमान तथा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है, जहां निक्षालन (leaching) की प्रक्रिया होती है। इसका निर्माण उच्च वर्षा के कारण सिलिका के बह जाने से होता है। यह मृदा अम्लीय प्रकृति की होती है तथा उर्वरता कम होती है। लैटेराइट मृदा में लोहा तथा एल्युमिनियम की अधिकता होती है। यह मृदा केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु के उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। इस मृदा में चाय तथा काजू की खेती होती है।

शुष्क मृदा (Arid Soil)

शुष्क मृदा राजस्थान, गुजरात तथा कर्नाटक के शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका रंग लाल से भूरा होता है। इसमें रेत की मात्रा अधिक तथा जल धारण क्षमता कम होती है। इस मृदा में नमक की मात्रा अधिक होती है, जिसके कारण इसकी उर्वरता कम होती है। सिंचाई की उपलब्धता होने पर यह मृदा उपजाऊ हो सकती है।

लवणीय तथा क्षारीय मृदा (Saline and Alkaline Soil)

ये मृदाएँ उन क्षेत्रों में पाई जाती हैं जहां वर्षा कम होती है तथा वाष्पीकरण अधिक होता है। इनमें सोडियम, कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के लवण अधिक मात्रा में होते हैं। ये मृदाएँ कृषि के लिए उपयुक्त नहीं होतीं। उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा पंजाब के कुछ क्षेत्रों में ये मृदाएँ पाई जाती हैं। इन्हें 'रेह' या 'उसर' मृदा भी कहते हैं।

कंकरीली और मुरम मृदा (Gravelly and Murram Soil)

यह मृदा पठारी क्षेत्रों में पाई जाती है, जिसमें कंकर तथा मुरम (हार्ड पैन) होते हैं। यह उर्वरता की दृष्टि से कमजोर मृदा है।

पीट मृदा (Peaty Soil)

पीट मृदा जल-भराव वाले क्षेत्रों में पाई जाती है, जहां कार्बनिक पदार्थों का संचय होता है। यह केरल के कुट्टनाड क्षेत्र तथा अलकनंदा घाटी में पाई जाती है। इस मृदा में जैविक कार्बन की मात्रा अधिक होती है।

4. मृदा क्षरण (Soil Erosion)

मृदा क्षरण वह प्रक्रिया है जिसमें मृदा के ऊपरी उपजाऊ भाग का जल, पवन या हिमनद द्वारा क्षरण होता है। मृदा क्षरण के कारण मृदा की उर्वरता घट जाती है। मृदा क्षरण के प्रमुख कारण हैं: 1. वनों की कटाई – वनों के कटने से मृदा अस्थिर हो जाती है और बह जाती है। 2. अति चराई – पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से घास का आवरण समाप्त हो जाता है। 3. असंतुलित कृषि – उचित कृषि विधियों के बिना खेती करने से मृदा क्षरण होता है। 4. तीव्र ढाल – तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों में जल के बहाव से मृदा बह जाती है।

मृदा क्षरण के प्रकार

  1. जल अपरदन (Water Erosion) – वर्षा की बूंदों, प्रवाहित जल तथा नदियों द्वारा मृदा का क्षरण। इसमें शीट अपरदन, रिल अपरदन तथा गली अपरदन (gully erosion) शामिल हैं। गली अपरदन से 'बाढ़र' (रावी) बनती हैं।
  2. पवन अपरदन (Wind Erosion) – शुष्क क्षेत्रों में पवन द्वारा मृदा का उड़ना। राजस्थान में पवन अपरदन अधिक होता है।

5. मृदा संरक्षण (Soil Conservation)

मृदा संरक्षण के निम्नलिखित उपाय किए जाते हैं: 1. वृक्षारोपण (Afforestation) – वन लगाने से मृदा स्थिर रहती है। 2. पट्टीदार कृषि (Strip Cropping) – फसलों को पट्टियों में उगाकर मृदा को स्थिर रखना। 3. मेखलाकरण या समोच्च कृषि (Contour Farming) – ढाल के साथ क्षैतिज रूप में खेती करना। 4. सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming) – पर्वतीय ढालों पर सीढ़ियाँ बनाकर खेती। 5. बांध तथा अवरोधक – जल के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए बांध बनाना। 6. हवा के अवरोधक (Wind Breaks) – पेड़ों की पंक्तियाँ लगाकर पवन से मृदा को बचाना। 7. रासायनिक एवं जैविक उर्वरकों का संतुलित प्रयोग।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

मृदा क्षेत्र मुख्य विशेषता
जलोढ़ मृदा उत्तरी मैदान सबसे उपजाऊ, पोटाश-चूना पर्याप्त
काली मृदा दक्कन का पठार नमी धारण क्षमता सबसे अधिक
लैटेराइट मृदा उच्च वर्षा क्षेत्र अम्लीय, लोहा-एल्युमिनियम अधिक
शुष्क मृदा राजस्थान रेत अधिक, उर्वरता कम
क्षरण प्रकार कारण परिणाम
जल अपरदन वर्षा, नदियाँ गली अपरदन, बाढ़र
पवन अपरदन शुष्क पवन मृदा का उड़ना

माइंड मैप

graph TD A["मृदा"] --> B["निर्माण कारक"] A --> C["मृदा के प्रकार"] A --> D["मृदा क्षरण"] A --> E["संरक्षण"] B --> B1["मूल चट्टान, जलवायु, वनस्पति"] C --> C1["जलोढ़, काली, लैटेराइट"] C --> C2["लाल, शुष्क, लवणीय"] D --> D1["जल अपरदन, पवन अपरदन"] E --> E1["वृक्षारोपण, सीढ़ीदार खेती"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

भारत की प्रमुख मृदाएँ जलोढ़ मृदा उत्तरी मैदान सबसे उपजाऊ काली मृदा दक्कन का पठार कपासी मृदा लाल मृदा पूर्वी भारत लोहा अधिक लैटेराइट मृदा उच्च वर्षा क्षेत्र अम्लीय, निक्षालन शुष्क मृदा राजस्थान रेत अधिक लवणीय मृदा रेह/उसर मृदा लवण अधिक मृदा निर्माण कारक मूल चट्टान, जलवायु, वनस्पति, स्थलाकृति, समय काली मृदा ज्वालामुखीय लावा (बेसाल्ट) के अपक्षय से बनी है स्वर्ण नियम जलोढ़ मृदा भारत की सबसे व्यापक और सबसे उपजाऊ मृदा है।
मृदा क्षरण और संरक्षण मृदा क्षरण के कारण संरक्षण के उपाय वनों की कटाई अति चराई, असंतुलित कृषि तीव्र ढाल, जल और पवन गली अपरदन से बाढ़र वृक्षारोपण सीढ़ीदार खेती, समोच्च कृषि पट्टीदार कृषि, हवा के अवरोधक बांध और अवरोधक मृदा परतें (Soil Profile) A-क्षितिज (कार्बनिक) | B-क्षितिज (खनिज) | C-क्षितिज (अपक्षयित) | D (आधार चट्टान) स्वर्ण नियम सीढ़ीदार खेती पर्वतीय ढालों पर मृदा क्षरण रोकने का प्रभावी उपाय है।

सामान्य गलतियाँ

  1. काली मृदा का निर्माण अवसादी चट्टानों के अपक्षय से बताना गलत है; इसका निर्माण ज्वालामुखीय लावा (बेसाल्ट) के अपक्षय से हुआ है।
  2. जलोढ़ मृदा में नाइट्रोजन और फास्फोरस पर्याप्त होते हैं, यह गलत है; जलोढ़ मृदा में पोटाश और चूना पर्याप्त होते हैं, परंतु नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी होती है।
  3. लैटेराइट मृदा को क्षारीय मृदा बताना गलत है; लैटेराइट मृदा अम्लीय प्रकृति की होती है।
  4. खादर और भांगर को उलट देना सामान्य गलती है; खादर नवीन जलोढ़ है, जबकि भांगर प्राचीन जलोढ़ है।
  5. मृदा क्षरण में केवल पवन का कारण होता है, यह गलत है; जल अपरदन भी मुख्य कारण है, जिससे गली अपरदन होता है।
  6. सीढ़ीदार खेती को मैदानी क्षेत्रों की कृषि विधि बताना गलत है; यह पर्वतीय ढालों पर की जाती है।
  7. शुष्क मृदा को सबसे उपजाऊ मृदा बताना गलत है; जलोढ़ मृदा सबसे उपजाऊ है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. प्रत्येक मृदा के क्षेत्र, निर्माण और विशेषताएँ लिखें।
  2. जलोढ़ मृदा को सबसे व्यापक और उपजाऊ मृदा बताएं।
  3. काली मृदा को 'कपासी मृदा' कहने का कारण लिखें।
  4. मृदा निर्माण के कारकों (मूल चट्टान, जलवायु, वनस्पति) का उल्लेख करें।
  5. मृदा क्षरण के कारण तथा प्रकार (जल, पवन) लिखें।
  6. संरक्षण के उपायों (वृक्षारोपण, सीढ़ीदार खेती, समोच्च कृषि) का उल्लेख करें।
  7. मृदा परतों (A, B, C, D क्षितिज) के नाम लिखें।

निष्कर्ष

मृदा पृथ्वी की सतह की उपजाऊ परत है, जो चट्टानों के अपक्षय से बनती है। मृदा निर्माण में मूल चट्टान, जलवायु, वनस्पति, स्थलाकृति और समय का योगदान होता है। भारत में विभिन्न प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं – जलोढ़, काली, लाल, लैटेराइट, शुष्क, लवणीय और पीट मृदा। जलोढ़ मृदा सबसे व्यापक और उपजाऊ है, जो उत्तरी मैदान में पाई जाती है। काली मृदा (रेगुर) कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त है। लैटेराइट मृदा उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में अम्लीय मृदा के रूप में पाई जाती है। मृदा क्षरण जल और पवन के कारण होता है, जिससे मृदा की उर्वरता घटती है। वृक्षारोपण, सीढ़ीदार खेती, समोच्च कृषि तथा पट्टीदार कृषि मृदा संरक्षण के प्रमुख उपाय हैं। मृदा संरक्षण कृषि उत्पादन और पर्यावरणीय संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है।