मृदा (Soil) पृथ्वी की सतह की वह ऊपरी ढीली परत है, जिसमें खनिज कण, कार्बनिक पदार्थ, जल, वायु तथा जीव सम्मिलित होते हैं। मृदा का निर्माण चट्टानों के अपक्षय से होता है। मृदा जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह वनस्पति का आधार है तथा कृषि के लिए अनिवार्य है। मृदा का निर्माण मूल चट्टान, जलवायु, वनस्पति, स्थलाकृति तथा समय के प्रभाव से होता है। इस अध्याय में हम मृदा निर्माण की प्रक्रिया, मृदा के प्रकार तथा मृदा संरक्षण का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
भारत में विभिन्न प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं, जो जलवायु, चट्टानों और वनस्पति के भिन्न-भिन्न होने के कारण हैं। मृदा का अध्ययन कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है। भारत में मृदाओं को वर्गीकृत करने की अनेक पद्धतियाँ हैं।
मृदा का निर्माण चट्टानों के अपक्षय से होता है। अपक्षय की प्रक्रियाओं (भौतिक, रासायनिक, जैविक) से चट्टानें टूटकर छोटे कणों में बदल जाती हैं। मृदा निर्माण में निम्नलिखित कारकों का योगदान होता है: 1. मूल चट्टान (Parent Rock) – मृदा का निर्माण जिस चट्टान से होता है, वह मृदा के खनिज संघटन को निर्धारित करती है। 2. जलवायु – जलवायु मृदा निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण कारक है। तापमान तथा वर्षा अपक्षय की दर को निर्धारित करते हैं। 3. वनस्पति – वनस्पति मृदा में कार्बनिक पदार्थ (ह्यूमस) प्रदान करती है। 4. स्थलाकृति – ढाल और ऊंचाई मृदा के निर्माण को प्रभावित करती है। 5. समय – मृदा के विकास के लिए लंबा समय आवश्यक होता है। 6. जैव कारक – सूक्ष्म जीव, केंचुए तथा अन्य जीव मृदा में कार्बनिक पदार्थ मिलाकर उसकी उर्वरता बढ़ाते हैं।
मृदा की अनुप्रस्थ काट को 'मृदा परतें' (Soil Profile) कहते हैं। इसमें विभिन्न क्षितिज (horizons) होते हैं: 1. A-क्षितिज (O क्षितिज) – सबसे ऊपरी परत, जिसमें कार्बनिक पदार्थ अधिक होते हैं। 2. B-क्षितिज – मध्यम परत, जिसमें खनिज तथा नीचे बहकर आए पदार्थ जमा होते हैं। 3. C-क्षितिज – नीचे की परत, जिसमें अपक्षयित चट्टानों के टुकड़े होते हैं। 4. D-क्षितिज (आधार चट्टान) – सबसे नीचे की कठोर चट्टान।
भारत में मृदाओं का वर्गीकरण उनकी उत्पत्ति, संरचना तथा वितरण के आधार पर किया जाता है। भारत की प्रमुख मृदाएँ निम्नलिखित हैं:
जलोढ़ मृदा भारत की सबसे महत्वपूर्ण तथा सबसे व्यापक मृदा है। यह उत्तरी मैदान (सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान) में पाई जाती है। इसका निर्माण नदियों द्वारा ढोए गए अवसादों के जमाव से हुआ है। जलोढ़ मृदा में पोटाश और चूना पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है, परंतु नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी होती है। जलोढ़ मृदा अत्यंत उपजाऊ है। इसे दो भागों में बांटा गया है – नवीन जलोढ़ (खादर) तथा प्राचीन जलोढ़ (भांगर)। जलोढ़ मृदा गेहूं, धान, गन्ना तथा दलहन की खेती के लिए उपयुक्त है।
काली मृदा को 'रेगुर' या 'कपासी मृदा' भी कहते हैं। यह दक्कन के पठार (महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश) में पाई जाती है। इसका निर्माण ज्वालामुखीय लावा (बेसाल्ट) के अपक्षय से हुआ है। काली मृदा में नमी धारण करने की क्षमता सबसे अधिक होती है। इसमें चूना, मैग्नीशियम, लोहा तथा एल्युमिनियम पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। काली मृदा कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त है, इसलिए इसे 'कपासी मृदा' कहते हैं। यह मृदा गीली होने पर चिपचिपी तथा सूखने पर दरारों वाली हो जाती है।
लाल मृदा पूर्वी भारत (ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश के कुछ भाग) में पाई जाती है। इसका लाल रंग लोहे के ऑक्साइड की अधिकता के कारण होता है। पीली मृदा उन क्षेत्रों में मिलती है जहां जलोढ़ मृदा निम्न स्तर पर पाई जाती है। लाल मृदा में लोहे की मात्रा अधिक होती है तथा इसमें उर्वरता कम होती है।
लैटेराइट मृदा उच्च तापमान तथा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है, जहां निक्षालन (leaching) की प्रक्रिया होती है। इसका निर्माण उच्च वर्षा के कारण सिलिका के बह जाने से होता है। यह मृदा अम्लीय प्रकृति की होती है तथा उर्वरता कम होती है। लैटेराइट मृदा में लोहा तथा एल्युमिनियम की अधिकता होती है। यह मृदा केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु के उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। इस मृदा में चाय तथा काजू की खेती होती है।
शुष्क मृदा राजस्थान, गुजरात तथा कर्नाटक के शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका रंग लाल से भूरा होता है। इसमें रेत की मात्रा अधिक तथा जल धारण क्षमता कम होती है। इस मृदा में नमक की मात्रा अधिक होती है, जिसके कारण इसकी उर्वरता कम होती है। सिंचाई की उपलब्धता होने पर यह मृदा उपजाऊ हो सकती है।
ये मृदाएँ उन क्षेत्रों में पाई जाती हैं जहां वर्षा कम होती है तथा वाष्पीकरण अधिक होता है। इनमें सोडियम, कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के लवण अधिक मात्रा में होते हैं। ये मृदाएँ कृषि के लिए उपयुक्त नहीं होतीं। उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा पंजाब के कुछ क्षेत्रों में ये मृदाएँ पाई जाती हैं। इन्हें 'रेह' या 'उसर' मृदा भी कहते हैं।
यह मृदा पठारी क्षेत्रों में पाई जाती है, जिसमें कंकर तथा मुरम (हार्ड पैन) होते हैं। यह उर्वरता की दृष्टि से कमजोर मृदा है।
पीट मृदा जल-भराव वाले क्षेत्रों में पाई जाती है, जहां कार्बनिक पदार्थों का संचय होता है। यह केरल के कुट्टनाड क्षेत्र तथा अलकनंदा घाटी में पाई जाती है। इस मृदा में जैविक कार्बन की मात्रा अधिक होती है।
मृदा क्षरण वह प्रक्रिया है जिसमें मृदा के ऊपरी उपजाऊ भाग का जल, पवन या हिमनद द्वारा क्षरण होता है। मृदा क्षरण के कारण मृदा की उर्वरता घट जाती है। मृदा क्षरण के प्रमुख कारण हैं: 1. वनों की कटाई – वनों के कटने से मृदा अस्थिर हो जाती है और बह जाती है। 2. अति चराई – पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से घास का आवरण समाप्त हो जाता है। 3. असंतुलित कृषि – उचित कृषि विधियों के बिना खेती करने से मृदा क्षरण होता है। 4. तीव्र ढाल – तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों में जल के बहाव से मृदा बह जाती है।
मृदा संरक्षण के निम्नलिखित उपाय किए जाते हैं: 1. वृक्षारोपण (Afforestation) – वन लगाने से मृदा स्थिर रहती है। 2. पट्टीदार कृषि (Strip Cropping) – फसलों को पट्टियों में उगाकर मृदा को स्थिर रखना। 3. मेखलाकरण या समोच्च कृषि (Contour Farming) – ढाल के साथ क्षैतिज रूप में खेती करना। 4. सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming) – पर्वतीय ढालों पर सीढ़ियाँ बनाकर खेती। 5. बांध तथा अवरोधक – जल के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए बांध बनाना। 6. हवा के अवरोधक (Wind Breaks) – पेड़ों की पंक्तियाँ लगाकर पवन से मृदा को बचाना। 7. रासायनिक एवं जैविक उर्वरकों का संतुलित प्रयोग।
| मृदा | क्षेत्र | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| जलोढ़ मृदा | उत्तरी मैदान | सबसे उपजाऊ, पोटाश-चूना पर्याप्त |
| काली मृदा | दक्कन का पठार | नमी धारण क्षमता सबसे अधिक |
| लैटेराइट मृदा | उच्च वर्षा क्षेत्र | अम्लीय, लोहा-एल्युमिनियम अधिक |
| शुष्क मृदा | राजस्थान | रेत अधिक, उर्वरता कम |
| क्षरण प्रकार | कारण | परिणाम |
|---|---|---|
| जल अपरदन | वर्षा, नदियाँ | गली अपरदन, बाढ़र |
| पवन अपरदन | शुष्क पवन | मृदा का उड़ना |
मृदा पृथ्वी की सतह की उपजाऊ परत है, जो चट्टानों के अपक्षय से बनती है। मृदा निर्माण में मूल चट्टान, जलवायु, वनस्पति, स्थलाकृति और समय का योगदान होता है। भारत में विभिन्न प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं – जलोढ़, काली, लाल, लैटेराइट, शुष्क, लवणीय और पीट मृदा। जलोढ़ मृदा सबसे व्यापक और उपजाऊ है, जो उत्तरी मैदान में पाई जाती है। काली मृदा (रेगुर) कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त है। लैटेराइट मृदा उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में अम्लीय मृदा के रूप में पाई जाती है। मृदा क्षरण जल और पवन के कारण होता है, जिससे मृदा की उर्वरता घटती है। वृक्षारोपण, सीढ़ीदार खेती, समोच्च कृषि तथा पट्टीदार कृषि मृदा संरक्षण के प्रमुख उपाय हैं। मृदा संरक्षण कृषि उत्पादन और पर्यावरणीय संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है।