पृथ्वी पर जीवन और मौसम की सारी प्रक्रियाएँ ऊर्जा पर निर्भर करती हैं। ऊर्जा का मुख्य स्रोत सूर्य है। सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा को 'सौर विकिरण' (Solar Radiation) कहते हैं। सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा में वे सारी तरंगें शामिल होती हैं जो विद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम में आती हैं। पृथ्वी पर पहुंचने वाली सौर ऊर्जा वायुमंडल से होकर गुजरती है, जिसमें इसका कुछ भाग अवशोषित, परावर्तित तथा प्रकीर्णित हो जाता है। पृथ्वी की सतह पर पहुंचने वाली ऊर्जा को 'भूपृष्ठीय विकिरण' से संतुलित किया जाता है। इसी संतुलन को 'ऊष्मा संतुलन' (Heat Balance) कहते हैं। तापमान इसी ऊर्जा के संतुलन का परिणाम है। इस अध्याय में हम सौर विकिरण, पृथ्वी की ऊष्मा संतुलन प्रणाली तथा तापमान के वितरण का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
सूर्य एक विशाल ऊर्जा भंडार है जो प्रति सेकंड अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित करता है। परंतु पृथ्वी तक पहुंचने वाली ऊर्जा का केवल एक अल्पांश ही प्राप्त होता है। सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी लगभग 15 करोड़ किलोमीटर है। पृथ्वी के वायुमंडल के बाह्य सीमा पर प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा को 'सौर स्थिरांक' (Solar Constant) कहते हैं, जिसका मान लगभग 1.36 किलोवाट प्रति वर्ग मीटर या 2 कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रति मिनट है।
सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा को सौर विकिरण कहते हैं। यह विकिरण विद्युतचुंबकीय तरंगों के रूप में अंतरिक्ष में गमन करता है। सौर विकिरण में पराबैंगनी किरणें, दृश्य प्रकाश तथा अवरक्त किरणें शामिल हैं। सूर्य का सतही तापमान लगभग 6000 डिग्री सेल्सियस है। सौर विकिरण अल्प तरंगदैर्ध्य वाला होता है, इसलिए इसे 'अल्प तरंग विकिरण' (Shortwave Radiation) भी कहते हैं। पृथ्वी की सतह से जो विकिरण बाहर जाता है, वह दीर्घ तरंगदैर्ध्य वाला होता है, क्योंकि पृथ्वी का तापमान सूर्य की तुलना में बहुत कम होता है। सूर्य की ऊर्जा का केवल लगभग 51% भाग ही पृथ्वी की सतह तक पहुंच पाता है।
सौर विकिरण की मात्रा विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न होती है। भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें साल भर लगभग लंबवत पड़ती हैं, इसलिए वहां सूर्यातप अधिक होता है। ध्रुवों की ओर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं, जिससे उनका क्षेत्रफल बड़ा हो जाता है और ताप प्रति इकाई क्षेत्रफल कम हो जाता है। इसलिए ध्रुवों पर तापमान कम होता है। सौर विकिरण की मात्रा को प्रभावित करने वाले कारक हैं – सूर्य की किरणों का कोण, दिन की अवधि, वायुमंडल की मोटाई तथा वायुमंडल में उपस्थित अवरोधक तत्व।
पृथ्वी और वायुमंडल अपनी ऊष्मा का संतुलन बनाए रखते हैं। वार्षिक औसतन पृथ्वी और वायुमंडल जितनी ऊर्जा प्राप्त करते हैं, उतनी ही ऊर्जा अंतरिक्ष में वापस भेज देते हैं। इस संतुलन को 'ऊष्मा संतुलन' कहते हैं। वायुमंडल के बाह्य सीमा पर प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा का वितरण निम्नलिखित प्रकार से होता है:
पृथ्वी की सतह द्वारा अवशोषित ऊर्जा को 'भूपृष्ठीय विकिरण' (Terrestrial Radiation) के रूप में वापस उत्सर्जित किया जाता है। यह दीर्घ तरंग विकिरण होता है। वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और ओजोन इस दीर्घ तरंग विकिरण को अवशोषित कर लेते हैं। इस प्रक्रिया को 'ग्रीनहाउस प्रभाव' (Greenhouse Effect) कहते हैं। ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण ही पृथ्वी का तापमान जीवन के लिए उपयुक्त बना रहता है। यदि यह प्रभाव न हो, तो पृथ्वी का औसत तापमान बहुत कम (-18 डिग्री सेल्सियस) हो जाता।
ग्रीनहाउस प्रभाव के लिए उत्तरदायी गैसों को 'ग्रीनहाउस गैसें' कहते हैं। इनमें जलवाष्प (सबसे प्रमुख), कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और ओजोन शामिल हैं। कार्बन डाइऑक्साइड का ग्रीनहाउस प्रभाव में योगदान महत्वपूर्ण है। औद्योगिक क्रांति के बाद ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में वृद्धि से पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है, जिसे 'वैश्विक तापन' (Global Warming) कहते हैं।
सूर्य से प्राप्त होने वाली वह ऊर्जा जो पृथ्वी की सतह तक पहुंचती है, उसे 'सूर्यातप' (Insolation) कहते हैं। सूर्यातप का मापन प्रति इकाई क्षेत्रफल पर प्राप्त ऊर्जा के रूप में किया जाता है। सूर्यातप की मात्रा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं:
पृथ्वी की सतह में जल और स्थल की ऊष्मा ग्रहण करने की क्षमता भिन्न-भिन्न होती है। स्थल की अपेक्षा जल धीमी गति से गर्म होता है और धीमी गति से ठंडा होता है। इसका कारण यह है कि जल की विशिष्ट ऊष्मा स्थल की तुलना में अधिक होती है। इसी कारण महासागरों की जलवायु तथा महाद्वीपों की जलवायु में अंतर होता है। महाद्वीपों पर तापमान की वार्षिक रेंज अधिक होती है, जबकि महासागरों के निकट तापमान की वार्षिक रेंज कम होती है।
वायुमंडल में ऊष्मा के वितरण को तापमान के रूप में मापा जाता है। तापमान वह अवस्था है जो किसी स्थान की ऊष्मा की मात्रा को दर्शाती है। तापमान का मापन थर्मामीटर से किया जाता है, जिसकी इकाई डिग्री सेल्सियस या फारेनहाइट होती है। किसी स्थान के तापमान को जानने के लिए दैनिक, मासिक तथा वार्षिक औसत तापमान का अध्ययन किया जाता है।
तापमान का वितरण भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर घटता जाता है। भूमध्य रेखा पर वार्षिक औसत तापमान लगभग 27 डिग्री सेल्सियस होता है, जबकि ध्रुवों पर लगभग -25 डिग्री सेल्सियस तक घट जाता है। तापमान के इस क्षैतिज वितरण को मानचित्र पर 'समताप रेखाओं' (Isotherms) द्वारा दर्शाया जाता है। समताप रेखाएँ वे रेखाएँ हैं जो समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ती हैं। समताप रेखाएँ सामान्यतः भूमध्य रेखा के समानांतर नहीं होती हैं, बल्कि महाद्वीपों और महासागरों के वितरण से प्रभावित होती हैं। उत्तरी गोलार्ध में महाद्वीपों की उपस्थिति के कारण समताप रेखाएँ अधिक विचलित (वक्र) होती हैं, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में महासागरों की अधिकता के कारण समताप रेखाएँ अधिक सीधी होती हैं।
तापमान ऊंचाई के साथ घटता है। क्षोभमंडल में प्रत्येक 165 मीटर की ऊंचाई पर तापमान लगभग 1 डिग्री सेल्सियस घटता है। ऊंचाई के साथ तापमान घटने की इस दर को 'तापमान पतन दर' (Lapse Rate) कहते हैं। ऊंचाई के साथ तापमान घटने का कारण है कि वायु का तापन मुख्य रूप से पृथ्वी की सतह से होने वाली गर्मी के कारण होता है, अतः सतह से दूर जाने पर तापमान घटता है।
किसी स्थान पर तापमान की अधिकतम और न्यूनतम सीमा के अंतर को 'तापमान की वार्षिक रेंज' कहते हैं। महाद्वीपों के आंतरिक भागों में वार्षिक रेंज अधिक होती है, जबकि महासागरों के निकट यह कम होती है। उत्तरी गोलार्ध में सबसे गर्म महीना जुलाई और सबसे ठंडा महीना जनवरी होता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में इसका उल्टा होता है।
| प्रक्रिया | सौर विकिरण का प्रतिशत |
|---|---|
| परावर्तन (एल्बिडो) | लगभग 35% |
| वायुमंडल द्वारा अवशोषण | लगभग 14% |
| प्रकीर्णन | लगभग 6% |
| भूपृष्ठीय अवशोषण | लगभग 45% |
| कारक | तापमान पर प्रभाव |
|---|---|
| अक्षांश | अक्षांश बढ़ने से तापमान घटता है |
| ऊंचाई | ऊंचाई बढ़ने से तापमान घटता है |
| स्थल-जल वितरण | महासागरों के निकट रेंज कम होती है |
| समुद्री धाराएँ | गर्म धारा ताप बढ़ाती है, ठंडी धारा घटाती है |
सूर्य पृथ्वी पर ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। सौर विकिरण अल्प तरंग विकिरण है, जो वायुमंडल से गुजरते समय परावर्तित, अवशोषित तथा प्रकीर्णित होता है। पृथ्वी की सतह को लगभग 45% ऊर्जा प्राप्त होती है, जिसे भूपृष्ठीय विकिरण के रूप में वापस उत्सर्जित किया जाता है। वायुमंडल की ग्रीनहाउस गैसें इस विकिरण को अवशोषित कर पृथ्वी को गर्म रखती हैं, जिसे ग्रीनहाउस प्रभाव कहते हैं। सूर्यातप की मात्रा किरणों के कोण, दिन की अवधि, पृथ्वी की सूर्य से दूरी, वायुमंडल की मोटाई और सतह की प्रकृति पर निर्भर करती है। तापमान का वितरण क्षैतिज रूप से (भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर) तथा ऊर्ध्वाधर रूप से (ऊंचाई के साथ) घटता है। समताप रेखाएँ तापमान के वितरण को दर्शाती हैं। इस अध्याय का ज्ञान वायुमंडलीय परिसंचरण, पवनें, वर्षा तथा जलवायु के अध्ययन के लिए आधारभूत है।