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1. परिचय

जलवायु किसी क्षेत्र की दीर्घकालिक मौसमी स्थितियों का औसत होती है, जबकि मौसम किसी विशेष समय और स्थान की अल्पकालिक वायुमंडलीय स्थिति है। जलवायु का अध्ययन विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के वर्गीकरण, उनकी विशेषताओं तथा जलवायु में होने वाले परिवर्तनों के अध्ययन से किया जाता है। विश्व में विभिन्न प्रकार की जलवायु पाई जाती है – उष्णकटिबंधीय, शीतोष्ण, ध्रुवीय, शुष्क तथा आर्द्र। इन जलवायु क्षेत्रों का वर्गीकरण वैज्ञानिकों ने तापमान, वर्षा और वनस्पति के आधार पर किया है। इस अध्याय में हम विश्व की प्रमुख जलवायुओं तथा जलवायु परिवर्तन के कारणों और प्रभावों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

जलवायु किसी क्षेत्र की वह दीर्घकालिक स्थिति है जो कम से कम 30 वर्षों के मौसम संबंधी आंकड़ों के औसत से निर्धारित होती है। जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्व हैं – तापमान, वर्षा, पवन, आर्द्रता, वायुदाब तथा सूर्यातप। जलवायु के अध्ययन से ही विभिन्न क्षेत्रों में कृषि, वनस्पति और मानव जीवन की स्थिति को समझा जाता है।

2. जलवायु के तत्व और नियंत्रण कारक

जलवायु के मुख्य तत्व हैं – तापमान, वर्षा, पवन, आर्द्रता और वायुदाब। जलवायु को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं: 1. अक्षांश – अक्षांश के आधार पर सूर्यातप की मात्रा भिन्न होती है। निम्न अक्षांशों (भूमध्य रेखा के निकट) में तापमान अधिक होता है, जबकि उच्च अक्षांशों (ध्रुवों के निकट) में कम। 2. ऊंचाई – ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है। 3. स्थल-जल वितरण – महासागरों का जलवायु पर संयमित (moderating) प्रभाव पड़ता है, जबकि महाद्वीपों के आंतरिक भागों में जलवायु अधिक चरम होती है। 4. समुद्र तल से दूरी (महाद्वीपीयता) – समुद्र से दूर स्थित क्षेत्रों में तापमान की रेंज अधिक होती है। 5. वायु धाराएँ तथा समुद्री धाराएँ – गर्म और ठंडी धाराएँ तटीय जलवायु को प्रभावित करती हैं। 6. वनस्पति – वनस्पति आवरण स्थानीय जलवायु को नियंत्रित करता है।

3. विश्व की प्रमुख जलवायु क्षेत्र

विश्व में विभिन्न जलवायु क्षेत्र पाए जाते हैं, जिन्हें तापमान और वर्षा के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। प्रमुख जलवायु क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Tropical Humid Climate)

यह जलवायु विषुवत रेखा के दोनों ओर लगभग 0 से 15 डिग्री अक्षांशों तक पाई जाती है। इसकी विशेषताएँ हैं – वर्ष भर उच्च तापमान (लगभग 27 डिग्री सेल्सियस), प्रचुर वर्षा (प्रतिवर्ष 200 सेंटीमीटर से अधिक) तथा उच्च आर्द्रता। यहां सघन वर्षावन पाए जाते हैं, जिन्हें 'अमेज़न वर्षावन' कहते हैं। अफ्रीका का कांगो बेसिन तथा दक्षिण अमेरिका का अमेज़न बेसिन इस जलवायु क्षेत्र में आते हैं।

उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु (Tropical Monsoon Climate)

यह जलवायु दक्षिण एशिया में पाई जाती है, जहां मौसमी पवनों (मानसून) से अधिकांश वर्षा होती है। इसकी विशेषताएँ हैं – तीन ऋतुएँ (गर्म शुष्क ग्रीष्म, वर्षा ऋतु, शीत ऋतु), मौसमी पवनों का उलटफेर तथा तापमान में स्पष्ट अंतर। भारत, बांग्लादेश, म्यांमार इस जलवायु क्षेत्र में आते हैं।

उष्णकटिबंधीय शुष्क जलवायु (Tropical Dry Climate)

यह जलवायु उपोष्ण उच्च दाब क्षेत्रों में पाई जाती है, जहां वर्षा बहुत कम होती है। इसकी विशेषताएँ हैं – अत्यधिक गर्म ग्रीष्म, कम वर्षा तथा बड़ा दैनिक तापमान अंतर। विश्व के प्रमुख मरुस्थल (सहारा, अरब, थार) इसी जलवायु क्षेत्र में स्थित हैं।

शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Temperate Humid Climate)

यह जलवायु मध्य अक्षांशों (30 से 45 डिग्री) में पाई जाती है। इसकी विशेषताएँ हैं – चार स्पष्ट ऋतुएँ, मध्यम तापमान तथा पर्याप्त वर्षा। यहां पर्णपाती वन पाए जाते हैं। भूमध्यसागरीय जलवायु (गर्म शुष्क ग्रीष्म और मध्यम आर्द्र शीत ऋतु) भी इसी वर्ग का प्रकार है।

शीतोष्ण महाद्वीपीय जलवायु (Temperate Continental Climate)

यह जलवायु मध्य अक्षांशों के महाद्वीपीय आंतरिक भागों में पाई जाती है। इसकी विशेषताएँ हैं – ठंडी सर्दियाँ, गर्म ग्रीष्म, तापमान की बड़ी वार्षिक रेंज तथा मध्यम वर्षा। यहां घास के मैदान (स्टेपी, प्रेयरी) पाए जाते हैं।

ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate)

यह जलवायु ध्रुवों के निकट उच्च अक्षांशों में पाई जाती है। इसकी विशेषताएँ हैं – अत्यधिक ठंड, वर्ष भर हिम तथा अत्यल्प वर्षा। यहां टुंड्रा वनस्पति (काई, लाइकेन) पाई जाती है। ग्रीनलैंड तथा उत्तरी कनाडा इसी जलवायु क्षेत्र में आते हैं।

उच्च पर्वतीय जलवायु (Highland Climate)

ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में ऊंचाई के साथ जलवायु बदलती रहती है। पर्वतों की तलहटी में आर्द्र जलवायु होती है, जबकि ऊपर की ओर तापमान घटता जाता है तथा सबसे ऊँचे भागों पर हिमनद पाए जाते हैं।

4. जलवायु वर्गीकरण (Classification of Climate)

वैज्ञानिकों ने जलवायु को वर्गीकृत करने के लिए अनेक योजनाएँ प्रस्तुत की हैं। इनमें सर्वाधिक प्रचलित निम्नलिखित हैं: 1. कोपेन का वर्गीकरण (Koppen's Classification) – जर्मन-रूसी जलवायु विज्ञानी व्लादिमीर कोपेन ने तापमान और वर्षा के आधार पर जलवायु का वर्गीकरण किया। उन्होंने वनस्पति को जलवायु का सूचक माना। कोपेन ने जलवायु को अक्षरों द्वारा दर्शाया। मुख्य वर्ग हैं – A (उष्ण आर्द्र), B (शुष्क), C (शीतोष्ण आर्द्र), D (ठंडी वनवाली), E (हिमी जलवायु) और H (उच्च भूमि)। कोपेन के वर्गीकरण के अनुसार भारत का अधिकांश भाग उष्ण मानसूनी जलवायु (Amw) में आता है। 2. थार्नथवेट का वर्गीकरण – थार्नथवेट ने वर्षा की दक्षता (precipitation effectiveness) के आधार पर जलवायु का वर्गीकरण किया। 3. ट्रेवर्था का वर्गीकरण – ट्रेवर्था ने कोपेन के वर्गीकरण में सुधार करके अक्षांशों के आधार पर वर्गीकरण किया।

5. जलवायु परिवर्तन (Climate Change)

जलवायु परिवर्तन का अर्थ है किसी क्षेत्र या संपूर्ण पृथ्वी की जलवायु में दीर्घकालिक परिवर्तन। पृथ्वी की जलवायु हमेशा से बदलती रही है, परंतु औद्योगिक क्रांति (1750 के बाद) से वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में तेजी से वृद्धि हुई है, जिससे वैश्विक तापन हो रहा है। वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता पूर्व-औद्योगिक स्तर (लगभग 280 ppm) से बढ़कर वर्तमान में 420 ppm से अधिक हो गई है। जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप वैश्विक तापमान में वृद्धि, हिमनदों का पिघलना, समुद्र जल स्तर में वृद्धि तथा चरम मौसमी घटनाओं (बाढ़, सूखा, चक्रवात) में वृद्धि हो रही है।

जलवायु परिवर्तन के कारण

जलवायु परिवर्तन के कारणों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है: 1. प्राकृतिक कारण – ज्वालामुखी विस्फोट, सूर्य की गतिविधियों में परिवर्तन, पृथ्वी की कक्षा में परिवर्तन (मिलांकोविच सिद्धांत) तथा प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रक्रिया। 2. मानवजनित कारण – जीवाश्म ईंधनों (कोयला, पेट्रोलियम) का दहन, वनों की कटाई, औद्योगीकरण, कृषि विधियाँ (उर्वरक, पशुपालन से मीथेन उत्सर्जन) तथा भूमि उपयोग में परिवर्तन।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

जलवायु परिवर्तन के निम्नलिखित प्रभाव हैं: 1. वैश्विक तापमान में वृद्धि – पिछले 100 वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। 2. हिमनदों का पिघलना – हिमालय, आल्प्स तथा अंटार्कटिका के हिमनद पिघल रहे हैं। 3. समुद्र जल स्तर में वृद्धि – समुद्र जल स्तर बढ़ने से तटीय क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। 4. चरम मौसमी घटनाओं में वृद्धि – बाढ़, सूखा, चक्रवात, ताप लहरें बढ़ रही हैं। 5. जैव विविधता पर प्रभाव – जलवायु परिवर्तन से जीवों के आवास प्रभावित हो रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपाय

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। 'क्योटो प्रोटोकॉल' (1997) और 'पेरिस समझौता' (2015) इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। पेरिस समझौते का लक्ष्य वैश्विक तापन को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है। अक्षय ऊर्जा (सौर, पवन) का प्रयोग, वन संरक्षण तथा हरित प्रौद्योगिकी जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रमुख उपाय हैं।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

जलवायु क्षेत्र विशेषताएँ उदाहरण
उष्णकटिबंधीय आर्द्र उच्च तापमान, प्रचुर वर्षा अमेज़न, कांगो बेसिन
उष्णकटिबंधीय मानसूनी मौसमी पवनों से वर्षा भारत, बांग्लादेश
उष्णकटिबंधीय शुष्क कम वर्षा, अधिक तापमान सहारा, थार
शीतोष्ण आर्द्र चार ऋतुएँ, मध्यम तापमान पश्चिमी यूरोप
ध्रुवीय अत्यधिक ठंड, टुंड्रा ग्रीनलैंड
जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुतकर्ता आधार
कोपेन का वर्गीकरण व्लादिमीर कोपेन तापमान और वर्षा
थार्नथवेट का वर्गीकरण थार्नथवेट वर्षा की दक्षता
ट्रेवर्था का वर्गीकरण ट्रेवर्था अक्षांश

माइंड मैप

graph TD A["विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन"] --> B["जलवायु क्षेत्र"] A --> C["जलवायु वर्गीकरण"] A --> D["जलवायु परिवर्तन"] B --> B1["उष्णकटिबंधीय, शीतोष्ण, ध्रुवीय"] C --> C1["कोपेन, थार्नथवेट, ट्रेवर्था"] D --> D1["कारण"] D --> D2["प्रभाव"] D --> D3["उपाय"] D1 --> D1a["प्राकृतिक, मानवजनित"] D3 --> D3a["क्योटो, पेरिस समझौता"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

विश्व के प्रमुख जलवायु क्षेत्र उष्णकटिबंधीय आर्द्र 0-15° अक्षांश, वर्षावन उष्णकटिबंधीय मानसूनी दक्षिण एशिया, मानसून उष्णकटिबंधीय शुष्क मरुस्थल, कम वर्षा शीतोष्ण आर्द्र मध्य अक्षांश, चार ऋतुएँ ध्रुवीय अत्यधिक ठंड, टुंड्रा उच्च पर्वतीय ऊंचाई के साथ जलवायु परिवर्तन जलवायु नियंत्रण कारक अक्षांश, ऊंचाई, स्थल-जल वितरण, महाद्वीपीयता स्वर्ण नियम जलवायु क्षेत्र अक्षांश के साथ बदलते हैं – विषुवत से ध्रुवों तक।
जलवायु परिवर्तन: कारण, प्रभाव, उपाय प्राकृतिक कारण ज्वालामुखी, सूर्य की गतिविधियाँ मानवजनित कारण जीवाश्म ईंधन, वनों की कटाई मुख्य गैस कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) प्रभाव वैश्विक तापन ~1.1°C, हिमनदों का पिघलना समुद्र जल स्तर में वृद्धि, चरम मौसमी घटनाएँ जैव विविधता पर दबाव उपाय क्योटो प्रोटोकॉल (1997), पेरिस समझौता (2015) अक्षय ऊर्जा, वन संरक्षण स्वर्ण नियम औद्योगिक क्रांति के बाद CO2 की मात्रा में तेजी से वृद्धि हुई है।

सामान्य गलतियाँ

  1. मौसम और जलवायु को एक ही अर्थ में प्रयोग करना गलत है; मौसम अल्पकालिक है, जबकि जलवायु दीर्घकालिक (कम से कम 30 वर्ष) औसत है।
  2. मरुस्थल को उष्णकटिबंधीय आर्द्र क्षेत्र में स्थित बताना गलत है; मरुस्थल उपोष्ण उच्च दाब क्षेत्रों में स्थित हैं।
  3. कोपेन के वर्गीकरण में वर्ग 'A' को शीतोष्ण जलवायु बताना गलत है; 'A' उष्ण आर्द्र जलवायु को दर्शाता है।
  4. जलवायु परिवर्तन केवल मानवजनित कारणों से होता है, यह गलत है; ज्वालामुखी और सूर्य की गतिविधियाँ जैसे प्राकृतिक कारण भी हैं।
  5. पेरिस समझौते के लक्ष्य को गलत बताना आम है; इसका लक्ष्य वैश्विक तापन को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है।
  6. वैश्विक तापमान में वृद्धि केवल CO2 से होती है, यह मानना अधूरा है; मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड भी ग्रीनहाउस गैसें हैं।
  7. ध्रुवीय जलवायु में वर्षावन पाए जाते हैं, यह गलत है; ध्रुवीय क्षेत्रों में टुंड्रा वनस्पति पाई जाती है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. मौसम और जलवायु के अंतर को स्पष्ट करें – समयावधि पर ध्यान दें।
  2. विश्व की प्रमुख जलवायुओं के साथ उनके क्षेत्रों (अमेज़न, भारत, सहारा) के उदाहरण लिखें।
  3. कोपेन के वर्गीकरण में मुख्य वर्गों (A, B, C, D, E, H) के अक्षर और अर्थ लिखें।
  4. जलवायु परिवर्तन के कारणों को प्राकृतिक और मानवजनित में विभाजित करके लिखें।
  5. जलवायु परिवर्तन के प्रभावों में वैश्विक तापन, हिमनदों का पिघलना और समुद्र स्तर में वृद्धि का उल्लेख करें।
  6. क्योटो प्रोटोकॉल (1997) और पेरिस समझौते (2015) की तिथियाँ याद रखें।
  7. जलवायु को नियंत्रित करने वाले कारकों की सूची तैयार करें।

निष्कर्ष

विश्व की जलवायु अक्षांश, ऊंचाई, स्थल-जल वितरण तथा अन्य कारकों से नियंत्रित होती है। विश्व में उष्णकटिबंधीय आर्द्र, मानसूनी, शुष्क, शीतोष्ण आर्द्र, महाद्वीपीय, ध्रुवीय तथा उच्च पर्वतीय जैसी अनेक जलवायुएँ पाई जाती हैं। कोपेन, थार्नथवेट और ट्रेवर्था ने जलवायु का वैज्ञानिक वर्गीकरण किया है। जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे गंभीर वैश्विक समस्या है, जो प्राकृतिक तथा मानवजनित दोनों कारणों से हो रही है। औद्योगिक क्रांति के बाद ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में वृद्धि से वैश्विक तापन बढ़ा है, जिससे हिमनद पिघल रहे हैं और समुद्र स्तर बढ़ रहा है। क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रयास जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किए जा रहे हैं। जलवायु का ज्ञान कृषि, आर्थिक नियोजन तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक है।