'मियाँ नसीरुद्दीन' प्रसिद्ध लेखिका कृष्णा सोबती की एक बेहद संवेदनशील कहानी है। यह कहानी कश्मीर के एक काष्ठ-शिल्पकार (लकड़ी पर नक्काशी करने वाले कारीगर) मियाँ नसीरुद्दीन की कला, उसकी श्रम-साधना और उसके आत्म-सम्मान की कथा है। मियाँ नसीरुद्दीन अखरोट (वॉलनट) की लकड़ी पर ऐसी बारीक नक्काशी करता है कि लकड़ी जीवंत हो उठती है। वह केवल एक कारीगर नहीं, बल्कि एक सच्चा कलाकार है, जो अपनी कला में पूरे समर्पण से रचता है।
कहानी में मियाँ नसीरुद्दीन को कश्मीर के संत बाबा नुंद रेशी (बाबा रेशी) की दरगाह के लिए लकड़ी की एक भव्य चाँदनी बनाने का कार्य मिलता है। यह चाँदनी उसके जीवन की सबसे बड़ी रचना है। वह अपने अंतिम क्षणों तक उसी में लगा रहता है, उसके पूरा होने की प्रतीक्षा करता है। उसकी कला का महत्व उसके समाज के लोग समझ नहीं पाते, परंतु विदेशी पर्यटक अगा साहब उसकी कला के सच्चे पारखी बनकर सामने आते हैं।
कहानी के माध्यम से कृष्णा सोबती ने भारतीय कारीगरों की दुर्दशा और उनकी उपेक्षा को उजागर किया है। यह कहानी हमें बताती है कि हमारे देश के कलाकार और शिल्पकार जो अद्भुत रचनाएँ बनाते हैं, उन्हें वह सम्मान नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं। कला के इस गाँवी, सादे और नम्र साधक की गाथा पढ़ते हुए पाठक के मन में उसके प्रति गहरा सम्मान और दया दोनों पैदा होते हैं।
कृष्णा सोबती (1925-2019) हिंदी कथा-साहित्य की एक प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनका जन्म गुजरात में हुआ था, परंतु उनकी रचनाओं का बड़ा हिस्सा कश्मीर की भूमि, वहाँ की संस्कृति और वहाँ के लोगों से जुड़ा है। 'मियाँ नसीरुद्दीन', 'ए लड़की', 'ज़िंदगीनामा', 'दिलो-दानिश', 'समय सर्गराह', 'हम हशमत' उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया है।
कृष्णा सोबती की भाषा और शैली अत्यंत विशिष्ट है। वे कश्मीरी और पंजाबी भाषाओं के शब्दों को हिंदी में इस सहजता से मिलाती हैं कि कथ्य और अधिक जीवंत हो उठता है। उनकी लेखनी में संवेदना की गहराई, पात्रों के प्रति अपार सहानुभूति और सामाजिक चेतना स्पष्ट दिखाई देती है। वे सामान्य मनुष्यों की कथा को असामान्य गहराई से लिखती हैं।
'मियाँ नसीरुद्दीन' कहानी में उन्होंने शिल्प और कला के संबंध को दार्शनिक गहराई से उठाया है। उनकी दृष्टि में कलाकार अपनी रचना के समक्ष गौण हो जाता है; जो बचता है वह केवल रचना है। कहानी का अंत उसी गहन भावना को छूता है जहाँ कलाकार और उसकी रचना एक हो जाते हैं।
कहानी के केन्द्र में कश्मीर के श्रीनगर/गाँव में रहने वाला काष्ठ-शिल्पकार मियाँ नसीरुद्दीन है। वह अखरोट की लकड़ी पर बेहद बारीक नक्काशी करता है। उसकी नक्काशी में फूल-बूटे, जालियाँ और ऐसी सजावट होती है कि लकड़ी किसी आभूषण का रूप ले लेती है। मियाँ का जीवन अत्यंत सादा है; वह अपने काम से प्रेम करता है और उसके बदले न धन की चाह रखता है, न नाम की।
कहानी का मुख्य प्रसंग यह है कि मियाँ नसीरुद्दीन को बाबा नुंद रेशी (बाबा रेशी) की दरगाह के लिए लकड़ी की चाँदनी बनाने का आदेश मिलता है। यह चाँदनी एक दुर्लभ कलाकृति है — कई मंज़िलों वाली, कई कद्दौरियों (गुंबदनुमा आकृतियों) वाली, जिसमें सैकड़ों फूल नक्काशी से उकेरे गए हैं। मियाँ इस कार्य में अपना सर्वस्व लगा देता है। इसी बीच वहाँ विदेश से आया अगा साहब उसकी कला देखकर मुग्ध हो जाता है और उस काम की बड़ी प्रशंसा करता है।
मियाँ नसीरुद्दीन के अपने बेटे की मानसिकता आधुनिक है; वह इस पुरानी कला को बेकार मानता है। बेटे की यह उपेक्षा मियाँ को गहरा आघात पहुँचाती है। फिर भी मियाँ अपनी रचना में लगा रहता है, क्योंकि उसकी दृष्टि में यह उसकी आत्मा का विस्तार है। वह चाहता है कि उसकी चाँदनी पूरी हो और लोग उसे देखें। कहानी के अंत में मियाँ नसीरुद्दीन की मृत्यु हो जाती है, परंतु उसकी बनाई चाँदनी — उसकी सबसे बड़ी रचना — उसकी कला को अमर कर देती है।
कहानी का मूलभाव है — कलाकार और उसकी कला का संबंध एवं उसकी उपेक्षा। कृष्णा सोबती दिखाती हैं कि जो कलाकार अपनी रचना में अपना सर्वस्व लगा देता है, वह रचना उसकी अमरता बन जाती है, भले ही समाज उसे सम्मान न दे। कलाकार धन या यश के लिए नहीं, अपने भीतर के आवेग को मूर्त रूप देने के लिए सृजन करता है।
कहानी का दूसरा संदेश है — परंपरागत शिल्प-कला का संरक्षण। आधुनिकता के अंधेपन में हम अपने उन कारीगरों को भूल रहे हैं जिनके हाथों से अद्भुत वस्तुएँ जन्म लेती हैं। बेटे का व्यवहार इसी आधुनिक उपेक्षा का प्रतीक है। कहानी कहती है कि कला का मूल्य उसके बाज़ार-भाव से नहीं, उसके निर्माण में लगे समर्पण से आंका जाना चाहिए।
तीसरा संदेश है — आत्म-सम्मान और साधना। मियाँ नसीरुद्दीन अपनी कला पर गर्व करता है, वह उसका आत्म-सम्मान उसकी कला ही है। कहानी का अंत यह संदेश देता है कि सच्चा कलाकार अपनी रचना के साथ अमर हो जाता है; मृत्यु उसकी कला को समाप्त नहीं करती।
| पात्र | परिचय | विशेषता |
|---|---|---|
| मियाँ नसीरुद्दीन | कश्मीरी काष्ठ-शिल्पकार | कला-समर्पण, आत्म-सम्मान, सादगी |
| अगा साहब | विदेशी कला-पारखी | कला का सच्चा मूल्यांकन |
| बेटा | मियाँ का पुत्र | आधुनिकता से प्रभावित, कला की उपेक्षा |
| चाँदनी | मियाँ की रचना | कला की अमरता का प्रतीक |
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| विधा | कहानी (कथेतर गद्य) |
| केन्द्रीय विषय | कलाकार की उपेक्षा और कला की अमरता |
| प्रतीक | चाँदनी, अखरोट की लकड़ी |
| संदेश | कला का सम्मान आवश्यक है; रचना कलाकार को अमर बनाती है |
| भाषा | सहज हिंदी में कश्मीरी-पंजाबी शब्दों का मिश्रण |
| भाव-भूमि | करुणा, सम्मान, कला-प्रेम |
'मियाँ नसीरुद्दीन' केवल एक कहानी नहीं, बल्कि भारतीय कारीगर-समुदाय के प्रति एक गहरी श्रद्धांजलि है। कृष्णा सोबती ने इस कहानी में सिद्ध किया है कि कला कभी मरती नहीं; जब समाज कलाकार को भूल जाता है, तब भी उसकी रचना उसकी गवाही देती है। मियाँ नसीरुद्दीन की सादगी, उसकी साधना और उसका आत्म-सम्मान हमें सिखाता है कि व्यक्ति धन से नहीं, अपने कर्म और सृजन से महान बनता है। यह कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि जिन हाथों ने देश की अमूल्य कलाओं को जन्म दिया है, उनके प्रति हमारा कर्तव्य उनका सम्मान और संरक्षण है।