इस अध्याय में हम कार्य, ऊर्जा और शक्ति की संकल्पनाओं का अध्ययन करेंगे। कार्य और ऊर्जा की संकल्पना भौतिकी में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इनके द्वारा विभिन्न प्रतीत होने वाली परिघटनाओं को एक ही सिद्धांत के अंतर्गत समझा जा सकता है। भौतिकी में कार्य का अर्थ दैनिक जीवन के कार्य से भिन्न होता है। भौतिकी में कार्य तभी होता है जब बल द्वारा विस्थापन उत्पन्न हो।
ऊर्जा कार्य करने की क्षमता है। जब भी कोई कार्य किया जाता है, तो एक रूप से ऊर्जा दूसरे रूप में परिवर्तित होती है। शक्ति कार्य करने की दर है। ये तीनों राशियाँ यांत्रिकी की मूलभूत राशियाँ हैं।
जब किसी वस्तु पर बल $F$ लगाया जाता है और वस्तु का विस्थापन $d$ होता है, तो बल द्वारा किया गया कार्य: $$W = F \cdot d = Fd\cos\theta$$ यहाँ $\theta$ बल और विस्थापन के बीच का कोण है।
कार्य की विशेष स्थितियाँ: - यदि $\theta = 0°$ (बल विस्थापन की दिशा में), तो $W = Fd$ (अधिकतम कार्य)। - यदि $\theta = 90°$, तो $W = 0$ (अभिकेंद्री बल द्वारा किया गया कार्य शून्य)। - यदि $\theta = 180°$, तो $W = -Fd$ (ऋणात्मक कार्य, जैसे घर्षण द्वारा कार्य)।
कार्य का SI मात्रक जूल (J) है, जो $N \cdot m$ के बराबर है। कार्य एक अदिश राशि है।
ऊर्जा कार्य करने की क्षमता है। इसका SI मात्रक भी जूल (J) है। ऊर्जा के विभिन्न रूप हैं: गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा, तापीय ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा, आदि। यांत्रिकी में हम मुख्यतः गतिज और स्थितिज ऊर्जा का अध्ययन करते हैं।
किसी गतिशील वस्तु के पास गति के कारण जो ऊर्जा होती है, उसे गतिज ऊर्जा कहते हैं: $$KE = \frac{1}{2}mv^2$$
किसी वस्तु की स्थिति या विन्यास के कारण उसके पास जो ऊर्जा होती है, उसे स्थितिज ऊर्जा कहते हैं। पृथ्वी की सतह से ऊँचाई h पर स्थित वस्तु की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा: $$PE = mgh$$
स्प्रिंग में संचित स्थितिज ऊर्जा (प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा): $$PE = \frac{1}{2}kx^2$$
कार्य-ऊर्जा प्रमेय के अनुसार, किसी वस्तु पर किया गया कुल कार्य उसकी गतिज ऊर्जा में हुए परिवर्तन के बराबर होता है: $$W = \Delta KE = KE_f - KE_i = \frac{1}{2}mv^2 - \frac{1}{2}mu^2$$
यदि किसी निकाय पर केवल संरक्षी बल कार्य करते हैं, तो उसकी कुल यांत्रिक ऊर्जा (गतिज + स्थितिज) स्थिर रहती है: $$KE_i + PE_i = KE_f + PE_f$$
शक्ति कार्य करने की दर है: $$P = \frac{W}{t}$$ शक्ति का SI मात्रक वाट (W) है, जो J/s के बराबर है। $$1 \text{ अश्वशक्ति} = 746 \text{ W}$$
टक्कर तीन प्रकार की होती है:
इसमें गतिज ऊर्जा और संवेग दोनों संरक्षित रहते हैं। दो समान द्रव्यमान की वस्तुओं के बीच प्रत्यास्थ टक्कर में वे वेगों का आदान-प्रदान करती हैं।
इसमें केवल संवेग संरक्षित रहता है, गतिज ऊर्जा संरक्षित नहीं रहती। ऊर्जा का कुछ भाग ऊष्मा या ध्वनि में बदल जाता है।
इसमें टक्कर के बाद दोनों वस्तुएँ एक साथ चिपक जाती हैं और समान वेग से गति करती हैं।
ऊर्जा विभिन्न रूपों में विद्यमान होती है। यांत्रिक ऊर्जा के अतिरिक्त तापीय ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा, प्रकाश ऊर्जा, ध्वनि ऊर्जा तथा नाभिकीय ऊर्जा जैसे अनेक रूप हैं। ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट, केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित की जा सकती है। ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम भी इसी सिद्धांत को व्यक्त करता है।
ऊर्जा संरक्षण के कई व्यावहारिक उदाहरण हैं। जल विद्युत संयंत्र में जल की स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में, फिर टरबाइन की घूर्णन गति में और अंततः विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित होती है। पवन चक्की में वायु की गतिज ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में बदलती है। रासायनिक बैटरी में रासायनिक ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित होती है। जब हम रबर की गेंद को दीवार से टकराते हैं, तो उसकी गतिज ऊर्जा क्षण भर के लिए प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा में बदलती है और फिर पुनः गतिज ऊर्जा में। इन सभी परिवर्तनों में कुल ऊर्जा स्थिर रहती है।
जीवों में ऊर्जा का महत्व भी अनिवार्य है। भोजन में संचित रासायनिक ऊर्जा शरीर में जैव रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा मुक्त होती है। इसी ऊर्जा से हम कार्य करते हैं, शरीर की ऊष्मा उत्पन्न होती है और विभिन्न जैविक प्रक्रियाएँ चलती हैं। जीवों की ऊर्जा क्षमता का मापन भी कैलोरी में होता है। खाद्य पदार्थों का ऊर्जा मान उनमें उपस्थित प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा की मात्रा पर निर्भर करता है। इस प्रकार कार्य, ऊर्जा और शक्ति की संकल्पनाएँ न केवल भौतिकी बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त हैं।
| राशि | सूत्र | SI मात्रक |
|---|---|---|
| कार्य | $W = Fd\cos\theta$ | जूल (J) |
| गतिज ऊर्जा | $KE = \frac{1}{2}mv^2$ | जूल (J) |
| स्थितिज ऊर्जा | $PE = mgh$ | जूल (J) |
| स्प्रिंग स्थितिज ऊर्जा | $PE = \frac{1}{2}kx^2$ | जूल (J) |
| शक्ति | $P = W/t$ | वाट (W) |
| गुण | संरक्षी बल | असंरक्षी बल |
|---|---|---|
| कार्य का पथ से संबंध | पथ पर निर्भर नहीं | पथ पर निर्भर |
| बंद पथ पर कार्य | शून्य | शून्य नहीं |
| ऊर्जा संरक्षण | यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित | ऊर्जा ऊष्मा में बदलती है |
| उदाहरण | गुरुत्वीय, स्प्रिंग बल | घर्षण, वायु प्रतिरोध |
कार्य, ऊर्जा और शक्ति यांत्रिकी की महत्वपूर्ण संकल्पनाएँ हैं। कार्य-ऊर्जा प्रमेय बल और गति को ऊर्जा से जोड़ता है। गतिज और स्थितिज ऊर्जा के परस्पर रूपांतरण और यांत्रिक ऊर्जा के संरक्षण के सिद्धांत अनेक जटिल समस्याओं को सरल बनाते हैं। संरक्षी और असंरक्षी बलों की समझ ऊर्जा संरक्षण के उपयोग की सीमा निर्धारित करती है। टक्करों का अध्ययन संवेग और ऊर्जा संरक्षण के संयुक्त अनुप्रयोग का उदाहरण है। ये संकल्पनाएँ ऊष्मा गतिकी और अन्य क्षेत्रों में भी अत्यंत उपयोगी हैं।