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1. परिचय

पिछले अध्याय में हमने एकविमीय गति का अध्ययन किया था, जिसमें वस्तु एक सीधी रेखा में गति करती है। परंतु अधिकांश वस्तुएँ द्विविमीय (समतल) में गति करती हैं। किसी प्रक्षेप्य की गति, वृत्तीय गति आदि समतल में गति के उदाहरण हैं। इस अध्याय में हम सदिशों की संकल्पना का उपयोग करके समतल में गति का अध्ययन करेंगे। सदिशों के बिना द्विविमीय गति का वर्णन संभव नहीं है।

समतल में गति के अध्ययन के लिए हम वस्तु की स्थिति को दो निर्देशांकों (x, y) द्वारा व्यक्त करते हैं। किसी क्षण पर वस्तु का स्थिति सदिश $r = x\hat{i} + y\hat{j}$ होता है।

2. सदिश (Vectors)

वे राशियाँ जिनमें परिमाण और दिशा दोनों होते हैं, सदिश राशियाँ कहलाती हैं। उदाहरण: विस्थापन, वेग, त्वरण, बल, संवेग। जिन राशियों में केवल परिमाण होता है, वे अदिश राशियाँ कहलाती हैं। उदाहरण: द्रव्यमान, समय, चाल, कार्य, ऊर्जा, दूरी।

सदिशों का योग (Vector Addition)

सदिशों का योग करने की दो विधियाँ हैं: - त्रिभुज नियम: दो सदिशों को क्रमानुसार जोड़कर उनके प्रथम के पुच्छ और अंतिम के शीर्ष को मिलाने से परिणामी सदिश प्राप्त होता है। - समांतर चतुर्भुज नियम: दो सदिशों को एक उभयनिष्ठ बिंदु से निरूपित करके समांतर चतुर्भुज पूर्ण करने पर विकर्ण परिणामी सदिश होता है।

दो सदिशों $a$ और $b$ के बीच कोण $\theta$ हो तो परिणामी: $$R = \sqrt{a^2 + b^2 + 2ab\cos\theta}$$ परिणामी की दिशा: $$\tan\phi = \frac{b\sin\theta}{a + b\cos\theta}$$

3. सदिशों का गुणन

अदिश गुणन (Scalar or Dot Product)

दो सदिशों का अदिश गुणननफल एक अदिश राशि होती है: $$a \cdot b = ab\cos\theta$$ - $a \cdot b = |a||b|\cos\theta$ - यदि $\theta = 90°$, तो $a \cdot b = 0$ - कार्य $W = F \cdot d = Fd\cos\theta$

सदिश गुणन (Vector or Cross Product)

दो सदिशों का सदिश गुणनफल एक सदिश राशि होती है: $$a \times b = ab\sin\theta \ \hat{n}$$ - यदि $\theta = 0°$ या $180°$, तो $a \times b = 0$ - बल आघूर्ण $\tau = r \times F$

4. सापेक्ष वेग (Relative Velocity)

यदि दो वस्तुएँ A और B वेगों $v_A$ और $v_B$ से गतिमान हैं, तो B के सापेक्ष A का वेग: $$v_{AB} = v_A - v_B$$ सापेक्ष वेग की संकल्पना से नदी पार करने, दो गाड़ियों के टकराने आदि की समस्याएँ हल की जाती हैं।

5. प्रक्षेप्य गति (Projectile Motion)

जब किसी वस्तु को प्रारंभिक वेग से क्षैतिज के साथ कुछ कोण बनाते हुए फेंका जाता है, तो वह प्रक्षेप्य कहलाती है और उसकी गति प्रक्षेप्य गति कहलाती है। प्रक्षेप्य का पथ परवलय होता है।

प्रारंभिक वेग $u$ और प्रक्षेपण कोण $\theta$ के लिए:

उड़ान काल (Time of Flight)

$$T = \frac{2u\sin\theta}{g}$$

अधिकतम ऊँचाई (Maximum Height)

$$H = \frac{u^2\sin^2\theta}{2g}$$

परास (Range)

$$R = \frac{u^2\sin2\theta}{g}$$

क्षैतिज परास अधिकतम

$\theta = 45°$ पर परास अधिकतम होता है: $$R_{max} = \frac{u^2}{g}$$

6. वृत्तीय गति (Circular Motion)

किसी वस्तु का वृत्तीय पथ पर समान चाल से घूमना एकसमान वृत्तीय गति कहलाता है। एकसमान वृत्तीय गति में वस्तु का वेग (दिशा) लगातार बदलता रहता है, इसलिए त्वरण होता है।

अभिकेंद्री त्वरण (Centripetal Acceleration)

$$a_c = \frac{v^2}{r} = \omega^2 r$$ यह त्वरण हमेशा वृत्त के केंद्र की ओर निर्देशित होता है।

कोणीय वेग (Angular Velocity)

$$\omega = \frac{d\theta}{dt}$$ $$v = \omega r$$

अभिकेंद्री बल (Centripetal Force)

$$F_c = \frac{mv^2}{r} = m\omega^2 r$$

7. सदिश विधियों का व्यावहारिक उपयोग

सदिशों की संकल्पना का उपयोग अनेक वास्तविक जीवन की समस्याओं को हल करने में होता है। नाव द्वारा नदी पार करने, हवा की दिशा और गति से प्रभावित विमान का उड़ान, तथा दो अलग-अलग दिशाओं में खींची गई रस्सियों के बलों का परिणामी ज्ञात करने में सदिश विधियाँ अपरिहार्य हैं। नाविक को नदी के बहाव की भरपाई के लिए नाव को तिरछी दिशा में चलाना पड़ता है, और विमानचालक को पार्श्विक वायु के लिए विमान की दिशा समायोजित करनी पड़ती है। इन सबमें सापेक्ष वेग और सदिश योग की संकल्पनाएँ काम आती हैं।

प्रक्षेप्य गति का उपयोग खेलों में भी स्पष्ट रूप से दिखता है। गोला फेंकना, भाला फेंकना, क्रिकेट में गेंद का हवा में जाना और बास्केटबॉल की गेंद का टोकरी में गिरना, सभी प्रक्षेप्य गति के उदाहरण हैं। खिलाड़ी अधिकतम परास के लिए 45° के कोण पर फेंकता है, हालाँकि हवा का प्रतिरोध और ऊँचाई में भिन्नता के कारण वास्तविक इष्टतम कोण भिन्न हो सकता है। ऊँची कूद और लंबी कूद में भी प्रक्षेप्य सिद्धांत निहित हैं।

वृत्तीय गति का ज्ञान वाहनों के मोड़ने, सड़कों के अभिकल्पन और अपकेंद्री मशीनों के सिद्धांत में प्रयुक्त होता है। सड़क के मोड़ पर वाहन को अभिकेंद्री बल की आवश्यकता होती है, जो घर्षण से प्राप्त होता है। अपकेंद्री मशीन अत्यधिक कोणीय वेग से घूमकर भारी कणों को बाहर की ओर फेंकती है और हल्के कणों को केंद्र की ओर छोड़ती है। इसी सिद्धांत पर दूध से क्रीम अलग करना और कपड़ों से जल निकालना संभव होता है। इस प्रकार समतल में गति की संकल्पनाएँ केवल परीक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी और खेलों का आधार हैं।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: अदिश और सदिश राशियों की तुलना

गुणधर्म अदिश राशि सदिश राशि
परिभाषा केवल परिमाण परिमाण और दिशा
योग नियम साधारण बीजगणित सदिश योग नियम
उदाहरण द्रव्यमान, ऊर्जा, समय वेग, बल, विस्थापन
विभाजन सरल घटकों में विभाजन

तालिका 2: प्रक्षेप्य गति के सूत्र

राशि सूत्र टिप्पणी
उड़ान काल (T) $T = \frac{2u\sin\theta}{g}$ $\theta = 90°$ पर अधिकतम
अधिकतम ऊँचाई (H) $H = \frac{u^2\sin^2\theta}{2g}$ $\theta = 90°$ पर अधिकतम
परास (R) $R = \frac{u^2\sin2\theta}{g}$ $\theta = 45°$ पर अधिकतम
अधिकतम परास $R_{max} = \frac{u^2}{g}$ $\theta = 45°$ पर

माइंड मैप

graph TD A["समतल में गति"] --> B["सदिश"] A --> C["सापेक्ष वेग"] A --> D["प्रक्षेप्य गति"] A --> E["वृत्तीय गति"] B --> B1["योग: त्रिभुज/समांतर चतुर्भुज नियम"] B --> B2["अदिश गुणन: a·b = ab cosθ"] B --> B3["सदिश गुणन: a×b = ab sinθ"] D --> D1["T = 2u sinθ / g"] D --> D2["H = u² sin²θ / 2g"] D --> D3["R = u² sin2θ / g"] E --> E1["a = v²/r = ω²r"] E --> E2["F = mv²/r"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: प्रक्षेप्य गति का पथ

प्रक्षेप्य गति: परवलयाकार पथ क्षैतिज (x) ऊर्ध्व (y) u cosθ (क्षैतिज वेग) परास R = u² sin2θ / g अधिकतम ऊँचाई H θ = 45° पर परास अधिकतम प्रक्षेपण कोण θ स्वर्ण नियम (Golden Rule) θ = 45° पर क्षैतिज परास अधिकतम (R = u²/g); पथ सदैव परवलय होता है।

आरेख 2: वृत्तीय गति में अभिकेंद्री त्वरण

एकसमान वृत्तीय गति केंद्र O त्रिज्या r वस्तु अभिकेंद्री त्वरण a = v²/r v (स्पर्श रेखीय वेग) वेग की दिशा लगातार बदलती है अतः चाल स्थिर होते हुए भी त्वरण विद्यमान है स्वर्ण नियम (Golden Rule) एकसमान वृत्तीय गति में चाल स्थिर परंतु वेग परिवर्ती होता है; त्वरण सदैव केंद्र की ओर होता है।

सामान्य गलतियाँ

  1. अदिश और सदिश गुणनफल में भ्रम होता है। $a \cdot b = ab\cos\theta$ अदिश है जबकि $a \times b = ab\sin\theta$ सदिश है।
  2. प्रक्षेप्य गति में क्षैतिज और ऊर्ध्व वेग की भूमिका में भ्रम होता है। क्षैतिज वेग $u\cos\theta$ स्थिर रहता है, ऊर्ध्व वेग $u\sin\theta$ पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव होता है।
  3. अधिकतम परास के लिए कोण 45° होता है, परंतु कई छात्र 90° लिख देते हैं। 90° पर परास शून्य होती है (ऊर्ध्व प्रक्षेपण)।
  4. उड़ान काल के लिए प्रयुक्त सूत्र में $\sin\theta$ और अधिकतम ऊँचाई में $\sin^2\theta$ का उपयोग भ्रमित कर सकता है।
  5. एकसमान वृत्तीय गति में छात्र सोचते हैं कि चाल स्थिर होने से त्वरण शून्य है, जबकि वेग की दिशा बदलने के कारण अभिकेंद्री त्वरण सदैव विद्यमान रहता है।
  6. सदिश योग में साधारण बीजगणितीय योग करना गलत है; कोण के अनुसार परिणामी $R = \sqrt{a^2 + b^2 + 2ab\cos\theta}$ होता है।
  7. सापेक्ष वेग के सूत्र में चिह्न की गलती होना सामान्य है। $v_{AB} = v_A - v_B$ होता है, B के सापेक्ष A का वेग।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. प्रक्षेप्य गति के तीन प्रमुख सूत्र याद रखें: $T = \frac{2u\sin\theta}{g}$, $H = \frac{u^2\sin^2\theta}{2g}$, $R = \frac{u^2\sin2\theta}{g}$।
  2. अधिकतम परास ($\theta = 45°$ पर $R = u^2/g$) और अधिकतम ऊँचाई ($\theta = 90°$ पर) वाले प्रश्न बहुत पूछे जाते हैं।
  3. एकसमान वृत्तीय गति में $a = v^2/r = \omega^2 r$ और $F = mv^2/r$ लिखना न भूलें; त्वरण सदैव केंद्र की ओर होता है।
  4. सदिश योग पर आधारित प्रश्नों में जब दोनों सदिश लंबवत हों ($\theta = 90°$), तो $R = \sqrt{a^2 + b^2}$ प्रयोग करें।
  5. बल आघूर्ण $\tau = r \times F$ सदिश गुणनफल है, जबकि कार्य $W = F \cdot d$ अदिश गुणनफल है। इनके प्रकार अलग-अलग पूछे जाते हैं।
  6. सापेक्ष वेग के प्रश्न में जब दो वस्तुएँ विपरीत दिशाओं में चल रही हों, तो सापेक्ष वेग = $v_A + v_B$ (जब चिह्न ध्यान में रखें)।
  7. कोणीय वेग $\omega$ का मात्रक rad/s और वेग $v = \omega r$ संबंध याद रखें।

निष्कर्ष

समतल में गति का अध्ययन भौतिकी के विभिन्न क्षेत्रों में उपयोगी है। सदिशों की संकल्पना द्विविमीय गति के विश्लेषण के लिए अनिवार्य है। प्रक्षेप्य गति का परवलयाकार पथ, उड़ान काल, अधिकतम ऊँचाई और परास के सूत्र कई संख्यात्मक समस्याओं को हल करने में सहायक हैं। वृत्तीय गति में अभिकेंद्री त्वरण और बल की संकल्पना घूर्णी गति तथा अगले अध्याय 'गति के नियम' के लिए आधार प्रदान करती है। इन संकल्पनाओं की गहरी समझ यांत्रिकी के समग्र ज्ञान के लिए आवश्यक है।