ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) भौतिकी की वह शाखा है जो ऊष्मा और कार्य के बीच संबंध तथा ऊर्जा के रूपांतरणों का अध्ययन करती है। यह विषय ऊष्मा इंजन, रेफ्रिजरेटर, बिजली संयंत्र आदि के सिद्धांतों को समझाने के लिए आवश्यक है। ऊष्मागतिकी के अध्ययन के लिए हमें निकाय (System), परिवेश (Surroundings) और सीमा (Boundary) की संकल्पनाओं को समझना आवश्यक है।
ऊष्मागतिकी में ऊर्जा की अवस्थाओं का अध्ययन किया जाता है। किसी निकाय की अवस्था उसके अवस्था चरों (State Variables) जैसे दाब P, आयतन V, ताप T और आंतरिक ऊर्जा U द्वारा निर्धारित होती है।
ऊष्मा और कार्य ऊर्जा के दो रूप हैं जो अवस्था बदलने पर निकाय की सीमा से गुजरते हैं। ये अवस्था फलन (state function) नहीं बल्कि पथ फलन (path function) होते हैं। निकाय द्वारा किया गया कार्य: $$W = \int P dV$$
यदि दो निकाय A और B, तीसरे निकाय C के साथ क्रमशः तापीय साम्य में हैं, तो A और B भी एक-दूसरे के साथ तापीय साम्य में होंगे। इस नियम से ताप की संकल्पना स्थापित होती है और थर्मामीटर कार्य करता है।
प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण का कथन है। निकाय को दी गई ऊष्मा, उसकी आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि और निकाय द्वारा किए गए कार्य के योग के बराबर होती है: $$\Delta Q = \Delta U + W$$ यहाँ: - $\Delta Q$ = निकाय को दी गई ऊष्मा - $\Delta U$ = आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन - $W$ = निकाय द्वारा किया गया कार्य
निकाय के सभी अणुओं की कुल गतिज और स्थितिज ऊर्जा को आंतरिक ऊर्जा कहते हैं। आंतरिक ऊर्जा अवस्था फलन है। चक्रीय प्रक्रम में आंतरिक ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता ($\Delta U = 0$), अतः $\Delta Q = W$।
ताप स्थिर रहता है ($\Delta T = 0$, $\Delta U = 0$)। अतः $Q = W$। समतापी प्रक्रम में किया गया कार्य: $$W = nRT\ln\frac{V_2}{V_1} = 2.303 \ nRT \log\frac{V_2}{V_1}$$
ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता ($Q = 0$)। अतः $\Delta U = -W$। रुद्धोष्म प्रक्रम के लिए: $$PV^\gamma = \text{स्थिरांक}$$
दाब स्थिर रहता है। कार्य $W = P\Delta V$।
आयतन स्थिर रहता है। कार्य $W = 0$, अतः $Q = \Delta U$।
द्वितीय नियम के अनुसार, ऊष्मा स्वतः (spontaneously) ठंडे निकाय से गर्म निकाय की ओर प्रवाहित नहीं हो सकती। इस नियम के दो प्रसिद्ध कथन हैं:
ऊष्मा इंजन ऊष्मा को कार्य में परिवर्तित करता है। इसकी दक्षता: $$\eta = \frac{W}{Q_1} = 1 - \frac{Q_2}{Q_1}$$ जहाँ $Q_1$ गर्म स्रोत से ली गई ऊष्मा और $Q_2$ ठंडे स्रोत को दी गई ऊष्मा है।
आदर्श ऊष्मा इंजन जिसकी अधिकतम दक्षता: $$\eta = 1 - \frac{T_2}{T_1}$$
प्रशीतक का निष्पादन गुणांक: $$\beta = \frac{Q_2}{W} = \frac{Q_2}{Q_1 - Q_2}$$
ऊष्मा इंजन ने औद्योगिक क्रांति को संभव बनाया। भाप इंजन, आंतरिक दहन इंजन, गैस टरबाइन और जेट इंजन सभी ऊष्मा इंजन के उदाहरण हैं। इन इंजनों में ईंधन के दहन से प्राप्त ऊष्मा का केवल एक भाग ही यांत्रिक कार्य में बदलता है। शेष ऊष्मा ठंडे स्रोत को प्रदान की जाती है। द्वितीय नियम के कारण ऊष्मा इंजन की दक्षता 100% कभी नहीं हो सकती। आधुनिक ताप विद्युत संयंत्रों की दक्षता भी लगभग 40 से 50 प्रतिशत तक ही होती है। शेष ऊर्जा परिवेश में ऊष्मा के रूप में नष्ट होती है।
प्रशीतक और एयर कंडीशनर द्वितीय नियम का उपयोग करते हुए बाह्य कार्य करके ऊष्मा को ठंडे स्रोत से गर्म स्रोत की ओर स्थानांतरित करते हैं। रेफ्रिजरेटर में कार्यकारी गैस (प्रशीतक) को संपीडित करके उसमें दाब और ताप बढ़ाया जाता है, फिर उसका प्रसार करवाकर ताप कम किया जाता है। इस प्रक्रम में भोजन से ऊष्मा लेकर रेफ्रिजरेटर भोजन को ठंडा रखता है। प्रशीतक का निष्पादन गुणांक दर्शाता है कि एकांक कार्य से कितनी ऊष्मा को ठंडे स्रोत से निकाला गया।
ऊष्मा पंप का उपयोग ठंडे क्षेत्रों में भवनों को गर्म करने के लिए होता है। ऊष्मा पंप प्रशीतक के ही विपरीत कार्य करता है, जिसमें ठंडे बाहरी वातावरण से ऊष्मा लेकर उसे भवन के अंदर स्थानांतरित किया जाता है। इस प्रकार ऊष्मागतिकी के नियम न केवल सैद्धांतिक महत्व रखते हैं, बल्कि ऊर्जा रूपांतरण से जुड़ी सभी प्रौद्योगिकियों का आधार हैं। ऊष्मा इंजन और प्रशीतक के सिद्धांतों की समझ के बिना आधुनिक उद्योग, परिवहन और जीवन सुविधाओं का विकास संभव नहीं था।
| प्रक्रम | स्थिर राशि | कार्य | विशेषता |
|---|---|---|---|
| समतापी | ताप T | $W = nRT\ln(V_2/V_1)$ | ΔU = 0 |
| रुद्धोष्म | ऊष्मा Q = 0 | ΔU = -W | PV^γ = स्थिर |
| समदाबी | दाब P | W = PΔV | Q = ΔU + PΔV |
| समआयतनिक | आयतन V | W = 0 | Q = ΔU |
| नियम | कथन | महत्व |
|---|---|---|
| शून्यवाँ | तापीय साम्य की सकर्मकता | ताप की संकल्पना |
| प्रथम | ΔQ = ΔU + W | ऊर्जा संरक्षण |
| द्वितीय | ऊष्मा स्वतः ठंडे से गर्म की ओर नहीं | दिशा निर्धारण |
ऊष्मागतिकी ऊर्जा रूपांतरण की दिशा और सीमाओं को समझाने वाली भौतिकी की शाखा है। शून्यवाँ नियम ताप की संकल्पना देता है, प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण को ऊष्मा और कार्य के संदर्भ में व्यक्त करता है, और द्वितीय नियम ऊर्जा रूपांतरण की दिशा निर्धारित करता है। समतापी, रुद्धोष्म, समदाबी और समआयतनिक प्रक्रमों का विश्लेषण ऊष्मागतिकीय गणनाओं का आधार है। ऊष्मा इंजन और प्रशीतक ऊष्मागतिकी के व्यावहारिक अनुप्रयोग हैं। कार्नो इंजन की अवधारणा आदर्श दक्षता की सीमा को निर्धारित करती है। यह अध्याय अगले अध्याय 'अणुगति सिद्धांत' के लिए आधार तैयार करता है।