साझेदारी फर्म में किसी साझेदार के सेवानिवृत्त होने या मृत्यु हो जाने पर फर्म का पुनर्गठन होता है। सेवानिवृत्त या मृत साझेदार को उसकी पूँजी, लाभ का हिस्सा, ख्याति का हिस्सा, पुनर्मूल्यांकन में हुआ लाभ आदि का भुगतान किया जाता है। शेष साझेदारों का लाभ-विभाजन अनुपात बदल जाता है। इस अध्याय में सेवानिवृत्ति एवं मृत्यु दोनों स्थितियों में होने वाले लेखांकन समायोजनों का अध्ययन किया जाता है।
सेवानिवृत्ति के बाद शेष साझेदारों का नया अनुपात निम्न प्रकार ज्ञात किया जाता है:
स्थिति 1: जब शेष साझेदार सेवानिवृत्त साझेदार का पूरा हिस्सा अपने-अपने पुराने अनुपात में लेते हैं: $$ \text{नया हिस्सा} = \text{पुराना हिस्सा} + \frac{\text{सेवानिवृत्त साझेदार का हिस्सा} \times \text{अपना पुराना हिस्सा}}{\text{शेष साझेदारों का कुल पुराना हिस्सा}} $$
स्थिति 2: जब शेष साझेदार सेवानिवृत्त साझेदार का हिस्सा अपने मौजूदा अनुपात में (नए अनुपात में) लेते हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद शेष साझेदारों को जो अतिरिक्त हिस्सा मिलता है: $$ \text{लाभ अनुपात} = \text{नया अनुपात} - \text{पुराना अनुपात} $$
सेवानिवृत्ति के समय शेष साझेदारों को सेवानिवृत्त साझेदार के ख्याति हिस्से का भुगतान लाभ अनुपात में करना होता है। विधियाँ:
सेवानिवृत्त साझेदार का पूँजी खाता डेबिट (ख्याति का हिस्सा)
ख्याति खाता क्रेडिट
फिर ख्याति खाता बंद करने के लिए:
ख्याति खाता डेबिट
शेष साझेदारों के पूँजी खाते क्रेडिट (लाभ अनुपात में)
शेष साझेदारों के पूँजी खाते डेबिट (लाभ अनुपात में)
सेवानिवृत्त साझेदार का पूँजी खाता क्रेडिट
संपत्तियों एवं देयताओं का पुनर्मूल्यांकन किया जाता है और उसका लाभ/हानि पुराने अनुपात में सभी साझेदारों (सेवानिवृत्त सहित) में वितरित किया जाता है।
सामान्य संचय, भंडार, कर्मचारी कल्याण भंडार आदि पुराने अनुपात में सभी साझेदारों में वितरित किए जाते हैं, जिसमें सेवानिवृत्त साझेदार का हिस्सा भी शामिल होता है।
सेवानिवृत्त साझेदार को निम्नलिखित राशियाँ दी जाती हैं: 1. पूँजी खाते की जमा राशि (या शेष राशि) 2. चालू खाते की शेष राशि 3. ख्याति का हिस्सा 4. पुनर्मूल्यांकन से हुआ लाभ का हिस्सा 5. सामान्य संचय/भंडार का हिस्सा 6. उसके द्वारा फर्म को दिए गए ऋण की राशि
कुल देय राशि का भुगतान नकद करने पर:
सेवानिवृत्त साझेदार का पूँजी खाता डेबिट
बैंक/रोकड़ खाता क्रेडिट
यदि भुगतान किश्तों में होता है, तो ऋण खाता बनाया जाता है और ब्याज निर्धारित दर पर दिया जाता है।
साझेदार की मृत्यु पर उसके निधन की तारीख तक का लाभ ज्ञात करके उसके वारिसों को भुगतान किया जाता है। मृत साझेदार के खाते में उसके निधन तक का लाभ, ख्याति, पुनर्मूल्यांकन लाभ आदि शामिल किए जाते हैं।
मृत्यु तक का लाभ दो विधियों से ज्ञात किया जा सकता है:
$$ \text{मृत्यु तक का लाभ} = \text{पिछले वर्ष का लाभ} \times \frac{\text{मृत्यु तक के महीने}}{12} \times \text{मृत साझेदार का हिस्सा} $$
$$ \text{मृत्यु तक का लाभ} = \text{पिछले वर्ष की बिक्री से लाभ की दर} \times \text{मृत्यु तक की बिक्री} \times \text{हिस्सा} $$
मृत साझेदार के खाते में मृत्यु तक के लाभ, ख्याति के हिस्से आदि की जमा की जाती है। मृत्यु का भुगतान वारिसों को किया जाता है।
सेवानिवृत्त साझेदार के भुगतान को किश्तों में विभाजित करने पर उसकी शेष राशि पर ब्याज दिया जाता है। इस हेतु एक सेवानिवृत्त साझेदार का ऋण खाता बनाया जाता है:
सेवानिवृत्त साझेदार का पूँजी खाता डेबिट
सेवानिवृत्त साझेदार का ऋण खाता क्रेडिट
प्रत्येक वर्ष ब्याज की गणना शेष राशि पर की जाती है।
यदि कुछ राशि का तत्काल भुगतान किया जाता है, तो शेष राशि को ऋण खाते में स्थानांतरित किया जाता है और उस पर निर्धारित ब्याज दिया जाता है।
| बिंदु | प्रवेश | सेवानिवृत्ति |
|---|---|---|
| नया अनुपात | नए साझेदार का हिस्सा जोड़ा जाता है | शेष साझेदारों का पुनः निर्धारण |
| त्याग/लाभ अनुपात | त्याग = पुराना - नया | लाभ = नया - पुराना |
| ख्याति वितरण | त्याग अनुपात में | लाभ अनुपात में |
| पुनर्मूल्यांकन | पुराने अनुपात में | पुराने अनुपात में |
| संचय वितरण | पुराने अनुपात में | पुराने अनुपात में |
| विधि | सूत्र |
|---|---|
| समय अनुपात विधि | पिछले वर्ष का लाभ x (महीने/12) x हिस्सा |
| विक्रय अनुपात विधि | पिछले वर्ष की लाभ दर x मृत्यु तक की बिक्री x हिस्सा |
| मद | विवरण |
|---|---|
| पूँजी | पूँजी खाते की शेष राशि |
| चालू खाता | चालू खाते की शेष राशि |
| ख्याति | लाभ अनुपात में हिस्सा |
| पुनर्मूल्यांकन लाभ | पुराने अनुपात में हिस्सा |
| संचय/भंडार | पुराने अनुपात में हिस्सा |
सेवानिवृत्ति एवं मृत्यु पर साझेदारी फर्म के पुनर्गठन में लाभ अनुपात, ख्याति, पुनर्मूल्यांकन, संचय वितरण और देय राशि की गणना की अवधारणाएँ आती हैं। मृत्यु की स्थिति में मृत्यु तक के लाभ की गणना अतिरिक्त होती है। इन सभी अवधारणाओं का क्रमबद्ध अभ्यास परीक्षा में सफलता सुनिश्चित करता है।